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देश के प्राचीन सिद्धपीठों में से एक है कालका जी मंदिर, जहां दर्शन से होती हैं मुरादें पूरी

कालकाजी में आदि शक्ति माता भगवती महाकाली के रूप में प्रकट हुई और उन्होंने असुरों का संहार किया। तब से यह मनोकामना सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध है।दूर-दूर से लोग दर्शन को आते हैं।

कालकाजी मंदिर अरावली पर्वत श्रृंखला के सूर्यकूट पर्वत पर स्थित है। यह देश के प्राचीन सिद्धपीठों में से एक है। नवरात्र के दौरान यहां रोजाना हजारों लोग माता के दर्शन करने के लिए आते हैं और उनकी मन्नत पूरी होती है।

मौजूद मंदिर की स्थापना बाबा बालक नाथ ने की थी। बाबा बालक नाथ के कहने पर अकबर शाह (1806 से 1837) ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया था। मान्यता है कि असुरों के सताने पर देवताओं ने यहां शिवा (शक्ति) की अराधना की थी। देवताओं के वरदान मांगने पर मां पार्वती ने कौशिकी देवी को प्रकट किया। देवी ने कई असुरों का संहार किया, लेकिन रक्तबीज का वध नहीं कर सकीं। तब माता पार्वती ने भृकुटिसे महाकाली को प्रकट किया और उन्होंने रक्तबीज का संहार किया। बताते हैं कि कौरवों से युद्ध से पहले भगवान कृष्ण ने पांडवों के साथ यहां भगवती की अराधना की थी।

मंदिर की विशेषता

मुख्य मंदिर में 12 द्वार हैं, जो 12 महीनों का संकेत देते हैं। हर द्वार के पास माता के अलग-अलग रूपों का चित्रण किया गया है। मंदिर की परिक्रमा में 36 द्वार मातृकाओं के संकेत हैं। मान्यता है कि ग्रहण में सभी ग्रह इनके अधीन होते हैं इसलिए ग्रहण के दौरान आमतौर पर बाकी मंदिर बंद होते हैं, जबकि कालकाजी मंदिर खुला रहता है।

कालकाजी मंदिर के नाम पर मेट्रो स्टेशन भी है। मेट्रो से आकर यहां आसानी से पहुंच सकते हैं। यह मेट्रो स्टेशन केंद्रीय सचिवालय से बदरपुर जाने वाली मेट्रो की वॉयलेट लाइन पर स्थित है, वहीं नोएडा व जनकपुरी इलाके से आने वाले भक्त मजेंटा लाइन की मेट्रो से भी यहां आ सकते हैं। यह एक्सचेंज मेट्रो स्टेशन है। यहां से बस और ऑटो भी मिलता है।

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