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सियासत की सीढि़यां चढ़ने का जरिया बनता रहा है रेलवे की जमीन पर अतिक्रमण करवाना

अतिक्रमण का यह अजगर पूरे देश में फैला है, लेकिन यहां बात हल्द्वानी की करता हूं। रेलवे की करोड़ों-अरबों की जमीन पर आज से ठीक 45 साल पहले यानी 1975 में अतिक्रमण शुरू हुआ। डंडे और उनके ऊपर बिछने वाली प्लास्टिक की तिरपालों से इसकी शुरुआत हुई। नजर सबकी थी। अफसरों की भी, नेताओं की भी और सत्ता के अलंबरदारों की भी, लेकिन नजराना पेश करने की खुली छूट दी गई। लिहाजा कुछ साल बाद डंडे ईंटों में बदल गए। तिरपालों की जगह सीमेंट की छत पड़ गई और खड़ी हो गई पक्की इमारतें।अफसर चुप रहे। क्योंकि उनको सत्ता ने बोलने नहीं दिया। सियासत अतिक्रमण को ताकती रही, ताकि इसके फलने-फूलने के बाद भविष्य के लिए वोट का एक मजबूत गढ़ तैयार हो जाए। यही हुआ भी।

अतिक्रमण ने हल्द्वानी से शुरुआत की। आगे बढ़ते हुए गौजाजाली से लालकुआं और किच्छा तक अपना कुनबा बसाया। अकेले हल्द्वानी से गौजाजाली तक 45 बरस में 50 हजार लोगों ने रेलवे की 29 एकड़ जमीन को अपना बना लिया और फिर इसके बदले में दिया वोट। अब वोट की ही बात करते हैं। असल मुद्दे की बात करते हैं। शुरुआत के सवाल का जवाब यही है कि जिन नेताओं ने इन अतिक्रमणकारियों को खुद की सियासी सीढ़ी बनाया, उन्होंने इनको न सिर्फ सरकारी भूमि पर जमे रहने का हक दिया, बल्कि इस दरियादिली के बदले वोट का अधिकार भी दिलाया। कैसे?

इस सवाल के पीछे बड़ा खेल है। रेलवे के हाथ बांधे गए, दूसरे विभागों के हाथ खोले गए। उनसे कहा गया कि इन्हें बिजली-पानी का कनेक्शन दो। इन्हें राशन कार्ड दो। इन्हें हर वो सुख-सुविधा दी जाए, जिसके हकदार ये नहीं हैं। क्योंकि इनसे हम हैं और हमसे सत्ता। जमीन सरकारी है, कहीं जा थोड़े रही है। वहीं रहेगी। कोई नहीं जानता कि रेलवे की जमीन को अपने पुरखों की जमीन समझने वाले ये लोग कहां से आ बसे। बस इतना पता है कि अब ये स्थायी निवासी हैं। वोट देते हैं। नगर निगम के चुनाव में। विधानसभा के चुनाव में। लोकसभा के चुनाव में। ऐसा नहीं है कि इस अतिक्रमण के वायरस का संक्रमण रोकने के लिए कोशिश नहीं की गई। हजार दफा कोशिशें हुई, मगर नेताजी के आगे भला किसी की क्या बिसात। वोट की खातिर वे कानून बदल डालते हैं।

वोट की खातिर वे नियमों की धज्जियां उड़ा सकते हैं। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने 2016 में हल्द्वानी में जड़ें फैला चुके अतिक्रमण को हटाने के आदेश दिए, मगर सत्ता के दबाव के आगे अफसर झुक गए और आखिर में यही अतिक्रमणकारी। माफ कीजिएगा, अतिक्रमण कर मतदाता बने चेहरे सत्ता की आड़ लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। फिर मामला वापस हाई कोर्ट आया और हाई कोर्ट ने रेलवे को 31 मार्च 2020 तक उनके समक्ष दायर अतिक्रमणकारियों के वादों को निस्तारित करने के आदेश दिए। रेलवे अब भी खामोश है। अदालत के आदेश के बावजूद। उसकी खमोशी के पीछे सत्ता है और सत्ता की छत्रछाया में अतिक्रमण। उम्मीद की जानी चाहिए कि न्यायपालिका के भरोसे रेलवे अतिक्रमण के वायरस को खत्म करेगा।

 

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