महागठबंधन को महामिलावट बता रहे थे मोदी, लेकिन NDA में हैं 2 दर्जन से ज्यादा दल

नई दिल्ली, स्टार सवेरा
चुनाव विश्लेषकों की मानें तो इसके पीछे की वजह है कि पिछले चुनावों में क्षेत्रीय दलों के वोट प्रतिशत में कोई कमी नहीं आई है. जबकि यदि राष्ट्रीय दल छोटे दलों से गठबंधन में चुनाव लड़ते हैं तो उनके जीत का स्ट्राइक रेट बढ़ जाता है.

आगामी लोकसभा चुनाव को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ‘मोदी वर्सेज ऑल’ मुकाबले के तौर पर प्रचारित कर रही है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी विपक्षी महागठबंधन को महामिलावट बता रहे हैं. लेकिन बीजेपी की अगुवाई में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) पर नजर डालें तो पता चलता है कि पिछले लोकसभा चुनाव के मुकाबले इस बार एनडीए का कुनबा बढ़ा है, जिसमें 2 दर्जन से ज्यादा दल शामिल हैं.

बीजेपी आगामी चुनाव 29 पार्टियों के गठबंधन के साथ लड़ने जा रही है. यह इशारा करता है कि मजबूत नेतृत्व होने के बावजूद बीजेपी को क्षेत्रीय दलों की कितनी जरूरत है. पार्टी ने 2014 का लोकसभा चुनाव 16 दलों के गठबंधन के साथ लड़ा था, जबकि अन्य छोटे दल चुनाव के बाद एनडीए का हिस्सा बने थे. जहां एक तरफ बीजेपी 2019 के महासमर को ‘मोदी वर्सेज ऑल’ के तौर पर प्रचारित कर रही है, तो वहीं पार्टी नेतृत्व इस शोर में खामोशी से महत्वपूर्ण राज्यों में गठबंधन बनाने में कामयाब होता नजर आ रहा है.

ऐसे में विपक्षी गठबंधन को महामिलावट कहने वाली बीजेपी के घटक दलों पर एक नजर डालना जरूरी हो जाता है. क्योंकि कहने को तो लोकसभा चुनाव राष्ट्र स्तर पर होता है, लेकिन बारीकी से देखें तो यह चुनाव देश के 29 राज्यों में अलग-अलग भी लड़ा जाता है. जिसमें मतदाताओं की प्राथमिकता और क्षेत्रीय दलों का प्रभाव खासा महत्व रखता है.

उत्तर प्रदेश

सीटों के लिहाज से देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश ने साल 2014 में बीजेपी को सत्ता दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. बीजेपी को अकेले 80 में 71 सीटों पर जीत हासिल हुई थी, जबकी एनडीए के खाते में 73 सीटें आईं थी. लेकिन 2019 के समीकरण बदले हुए हैं. जानकारों के मुताबिक एक दूसरे के धुर विरोधी सपा-बसपा के गठबंधन से बीजेपी को अपना प्रदर्शन दोहराने में मुश्किल आ सकती है. लिहाजा यूपी में बीजेपी अपने गठबंधन के घटक दलों को खोने का जोखिम नहीं उठाना चाहेगी.

राज्य में बीजेपी के साथ गठबंधन में केंद्रीय मंत्री अनुप्रिया पटेल की अपना दल के साथ ओम प्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी शामिल है. हालांकि राजभर ने राज्य सरकार के मंत्रिमंडल में एक मंत्रालय का पदभार छोड़ दिया है.

बिहार

उत्तर भारत के दूसरे महत्वपूर्ण राज्य बिहार में पिछले चुनाव में बीजेपी के साथ राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी शामिल थे. जबकि जेडी (यू) अलग चुनाव लड़ी थी. लेकिन इस बार एनडीए गठबंधन में जेडी (यू) शामिल है, जबकि आरएलएसपी विपक्षी गठबंधन में शामिल हो गई है. बिहार की सीटों का बीजेपी के लिए महत्व का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि पिछले चुनाव में 2 सीट जीतने वाली जेडी (यू) को गठबंधन में 17 सीटें दी गई हैं. बिहार में बीजेपी-जेडी (यू)-लोजपा गठबंधन में बिहार की 40 सीटों पर 17-17-6 का फॉर्मूला तैयार किया गया है.

महाराष्ट्र-गोवा

देश में सीटों के लिहाज से दूसरा सबसे बड़ा राज्य महाराष्ट्र है. बीजेपी को 2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम और उत्तर भारत से ही सबसे ज्यादा सीटें मिली थीं. लिहाजा बीजेपी के सामने इस बार भी इस प्रदर्शन को दोहराने की चुनौती है. यहां पिछले कुछ समय से नाराज चल रही शिवसेना को आखिरकार बीजेपी मनाने में कामयाब रही है. बीजेपी-शिवसेना गठबंधन में जो फॉर्मूला तय हुआ है उसके मुताबिक 25 सीटों पर बीजेपी और 23 सीटों पर शिवसेना चुनाव लड़ेगी.

इसके साथ ही महाराष्ट्र में एनडीए गठबंधन में केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले की आरपीआई के साथ राष्ट्रीय समाज पक्ष और विनायक मेटे की शिव संग्राम पार्टी भी शामिल है.

अगर गोवा की बात की जाए तो राज्य में बीजेपी की सरकार गोवा फॉरवर्ड पार्टी और महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के सहयोग से चल रही है. लोकसभा चुनाव में भी यह दल बीजेपी के साथ रहेंगे.

तमिलनाडु-पुड्डुचेरी

तमिलनाडु में जयललिता के निधन के बाद सत्ताधारी एआईएडीएमके में उपजे संकट को बीजेपी राज्य की राजनीति में प्रवेश के अवसर के तौर पर देख रही थी. हाल ही में बीजेपी में यूपीए के मुकाबले राज्य में गठबंधन बनाया है, जिसमें एआईएडीएमके, पीएमके, डीएमडीके, एन आर कांग्रेस, पुथिया तमलगम, और पुथिया नीधि काच्छी शामिल हैं.

इस लिहाज से देखा जाए तो अकेले तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में एनडीए के कुनबे में 6 दल शामिल हैं.

पूर्वोत्तर

आगामी लोकसभा चुनाव में पूर्वोत्तर का क्षेत्र बीजेपी के लिहाज से खासा महत्व रखता है. फिलहाल लोकसभा में कांग्रेस और उसके घटक दलों का पलड़ा भारी है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बीजेपी ने कांग्रेस और त्रिपुरा में वाम दलों का गढ़ ढहा दिया. आज की तारीख में पूर्वोत्तर के राज्यों में बीजेपी या उसके समर्थन से चलने वाली सरकारें सत्ता पर काबिज हैं.

पूर्वोत्तर में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में NDA की तर्ज पर नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (NEDA) का गठन किया गया है. हाल के समय में नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर असम गण परिषद, पिपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी ने NEDA के अलग होने का फैसला लिया. लेकिन बीजेपी के लिए राहत भरी खबर यह है कि अभी भी बहुत सारे दल गठबंधन के साथ खड़े हैं.

बीजेपी के साथ गठबंधन में मेघालय में कोनराड संगमा की नेशनल पिपुल्स पार्टी, अलम में बोडोलैंड पिपुल्स फ्रंट, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट, मिजो नेशनल फ्रंट, इंडीजीनस पिपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा, मणिपुर डेमोक्रेटिक पिपुल्स फ्रंट, गणशक्ति पार्टी और नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी शामिल हैं.

केरल

दक्षिण भारत में केरल वो राज्य है जहां पिछले कुछ सालों में बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने खासा जोर लगाया है. सबरीमाला मंदिर का मुद्दा भी बीजेपी को मदद पहुंचाने वाला रहा. जहां आस्था और संस्कृति के नाम पर भारतीय जनता पार्टी अपने विस्तार को स्वरूप देते दिख रही है. केरल में लोकसभा की 20 सीटें हैं जहां पिछले चुनाव में बीजेपी 18 सीटों पर लड़ी थी लेकिन कोई सीट नहीं जीत पाई. केरल में बीजेपी का सबसे बड़ा सहयोगी दल भारत धर्म जन सेना (BDJS) है. इसके अलावा केरल कांग्रेस (थॉमस) भी एनडीए गठबंधन का हिस्सा है.

इन आंकड़ों से साफ है कि भारतीय जनता पार्टी जहां देश स्तर पर चुनाव को मोदी वर्सेज ऑल बनाना चाहती है. तो वहीं राज्यों के समीकरण के हिसाब मजबूत गठबंधन के पक्ष में भी है. चुनाव विश्लेषकों की मानें तो इसके पीछे की वजह है कि पिछले चुनावों में क्षेत्रीय दलों के वोट प्रतिशत में कोई कमी नहीं आई है. जबकि यदि राष्ट्रीय दल छोटे दलों से गठबंधन में चुनाव लड़ते हैं तो उनके जीत का स्ट्राइक रेट बढ़ जाता है.

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