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सरसों का उत्पादन बढ़ाने के लिए आए योजना, बने SEBI जैसा रेगूलेटर

भारत ने अक्टूबर 2018 से नवंबर 2019 तक कई मिलियन टन खाद्य तेल का आयात किया है जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है।

आम बजट में अब एक महीने से भी कम समय रह गया है। इसी के साथ विभिन्न उद्योगों के प्रतिनिधि बजट से जुड़ी अपनी उम्मीदें बता रहे हैं। इसी कड़ी में पुरी मिल्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक विवेक पुरी ने सरसों तेल उद्योग की बजट से उम्मीदों के बारे में न्यूज एजेंसी आइएएनएस से बात की है। आइए जानते हैं कि पुरी के अनुसार आगामी बजट से इंडस्ट्री को क्या-क्या उम्मीदें हैं।

भारत दुनिया में खाद्य तेल के सबसे बड़े निर्यातक के रूप में उभर कर आया है। भारत ने अक्टूबर 2018 से नवंबर 2019 तक कई मिलियन टन खाद्य तेल का आयात किया है, जो कि अपने आप में एक रिकॉर्ड है। निर्यातित तेल पर देश की निर्भरता आने वाले समय में 60 से 65 फीसद के चेतावनी वाले स्तर तक जा सकती है।

भारत लगातार तेल घाटे वाला देश बना हुआ है। मांग व सप्लाई के बीच के गेप का दूर करने के लिए देश हर साल मिलियन टन खाद्य तेल का निर्यात करता है। इस वजह से भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल निर्यातक बन रहा है। भारत के घरेलू उत्पादन में बढ़ोत्तरी के बिना खाद्य तेल के क्षेत्र में भारत का आत्मनिर्भर बनाना चुनौती भरा है। यही कारण है इस समय इंडस्ट्री के लिए समर्पित होकर एक बड़े प्लान के साथ काम करने की आवश्यकता है।

हम बड़ी मात्रा में तिलहन का उत्पादन करने वाले देशों से सीख सकते हैं और उनकी अच्छी चीजों को अपना सकते हैं। इससे ना सिर्फ देश में तिलहन का उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि किसानों की आमदनी में भी इजाफा होगा। साल 2022 तक किसानों की आमदनी को दुगना करने के लक्ष्य को पूरा करने में तिलहनी फसलों की एक बड़ी भूमिका हो सकती है।

सरसों देश में सर्दियों में होने वाली एक महत्वपूर्ण तिलहनी फसल है। भारत सरकार को स्वदेशी खाद्य ऑयल क्षेत्र के लिए एक लाभकारी पॉलिसी लानी चाहिए, जो कि किसानों, उपभोक्ताओं और निर्माताओं के लिए समान रूप से हित में हो।

इसके अलावा इंडस्ट्री को SEBI जैसे एक रेगूलेटर की जरूरत है, जो कि दुरूपयोगों और धोखाधड़ी पर नजर रख सके। पिछले कुछ समय से पुरी ऑयल मिल्स लिमिटेड सरकार से मस्टर्ड ऑयल डेवलेपमेंट बोर्ड की स्थापना करने का सुझाव भी दे रही है।

भारत में कमोडिटी एक्सचेंजों की बात करें, तो यह किसानों की भलाई के लिए लाया गया था। लेकिन दुर्भाग्यवश अधिकांश किसान कमोडिटी एक्सचेंजों से ट्रांजेक्शन नहीं करते हैं। यह सट्टेबाजों के हाथों में चला गया है, जो कि बाजार को कृतिम रूप से प्रभावित करते हैं।

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