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देश में ना आए सस्ते आयात की बाढ़ इसलिए भारत ने RCEP को कहा ना

आरसेप में बेसिक ड्यूटी 2014 के आधार पर तय किया गया है। जबकि भारत चाहता है कि ड्यूटी रेट के लिए वर्तमान वर्ष यानी 2019 को आधार वर्ष माना जाए।

नई दिल्ली, अगर भारत आरसेप का हिस्सा बनता, तो देश में सस्ते आयात की बाढ़ की आशंका थी। इसके अलावा भी आरसेप से बाहर रहने के पीछे भारत के पास कई अन्य अहम वजहें रही हैं। इनमें भारतीय उद्योग को संरक्षण देने के साथ-साथ अन्य देशों में भारतीय उत्पादों की पहुंच बढ़ाने जैसे मुद्दे बेहद प्रमुख थे। यही वजह है कि भारत ने रीजनल कांप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप यानी आरसेप के दरवाजे को अपने लिए पूरी तरह बंद नहीं किया है। अगर बाकी देश भारत की मांगों को स्वीकार करते हैं, तो फैसला बदला भी जा सकता है।

चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने मंगलवार को कहा भी है कि भारत को आरसेप में शामिल होने के लिए मनाने की कोशिशें जारी रहेंगी। आरसेप के लिए हुई वार्ता में सरकार का पूरा जोर इन देशों के साथ अपने व्यापार घाटे को संतुलित बनाने पर रहा। सरकार ने उन सभी मुद्दों को वार्ता के प्रत्येक स्तर पर उठाया जिनसे घरेलू उद्योग, किसान और पूरे देश के हित प्रभावित हो सकते थे।

केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक वार्ता के दौरान एक वक्त ऐसा आया जब बातचीत के एजेंडा के 70 विषय में से 50 भारत से संबंधित थे। भारत ने बातचीत में रूल्स ऑफ ओरिजन का मुद्दा काफी मजबूती से रखा। भारत का मानना है कि आरसेप के मसौदे में इसके लिए बनाए गए नियम बेहद कमजोर हैं। भारत की राय है कि आरसेप में नियमों को इस प्रकार बनाए जाने की जरूरत है जिससे एक देश का माल दूसरे देश के जरिये किसी तीसरे देश में न पहुंचे।

चीन के संबंध में इसी तरह की आशंका जताई जा रही है।ड्यूटी का बेस रेट भी इस क्षेत्रीय कारोबारी समझौते से भारत के मना करने की एक प्रमुख वजह रहा। भारत ने आपत्ति जताते हुए कहा कि वर्तमान में होने वाले समझौते में ‘बेस रेट ऑफ ड्यूटी’ भी वर्तमान समय के आधार पर ही तय की जानी चाहिए। आरसेप में बेसिक ड्यूटी 2014 के आधार पर तय किया गया है। जबकि भारत चाहता है कि ड्यूटी रेट के लिए वर्तमान वर्ष यानी 2019 को आधार वर्ष माना जाए। साथ ही किसी खास देश से खास प्रोडक्ट का आयात बढ़ने पर सेफगार्ड का मैकेनिज्म तैयार करना भारत कमी प्रमुख मांगों में एक है।

भारत चाहता है कि जरूरत से अधिक आयात होने पर यह मैकेनिज्म खुद सक्रिय हो जाए ताकि डंपिंग को रोका जा सके। इससे घरेलू उद्योगों को संरक्षण प्रदान किया जा सकेगा।गोयल का कहना है कि मोस्ट फेवर्ड नेशन के मुद्दे पर भी भारत को एतराज रहा। आरसेप देश चाहते हैं कि यदि किसी देश ने दूसरे किसी देश को एमएफएन का दर्जा दिया है तो उसका लाभ सभी सदस्य देशों को मिले।

अधिकारियों का मानना है कि इसका अर्थ यह होगा कि आरसेप सदस्य देशों के अलावा ऐसे देश की पहुंच भी हमारे बाजार तक हो जाएगी जिसे सदस्य देश एमएफएन का दर्जा देते हैं। इसके अतिरिक्त भारत डेयरी और कृषि उत्पादों को इस समझौते से पूरी तरह बाहर रखने के पक्ष में था। लेकिन इस बात पर भी सहमति नहीं बन पाई।

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