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वायरलेस के लिए चोरी करती रही सरकार, मरते रहे बाघ

मध्य प्रदेश के वन विभाग और केंद्रीय दूरसंचार मंत्रलय के बीच चल रहा वायरलेस फ्रीक्वेंसी विवाद दस साल बाद सुलझ गया है।

भोपाल । बीते 10 साल में 170 बाघों की मौत के पीछे बड़ी वजह लापरवाही रही है। इसके बाद मध्य प्रदेश के वन विभाग और केंद्रीय दूरसंचार मंत्रलय के बीच चल रहा वायरलेस फ्रीक्वेंसी विवाद दस साल बाद सुलझ गया है, लेकिन विभाग को पुरानी देनदारी, जो 36 से बढ़कर 70 करोड़ रुपये हो गई, देनी ही पड़ेगी। दूरसंचार मंत्रलय ने इसी शर्त के साथ नया लाइसेंस दिया है। उधर, इतने सालों तक वन विभाग चोरी की फ्रीक्वेंसी से संरक्षित क्षेत्रों (टाइगर रिजर्व, अभयारण्य) में बाघों सहित अन्य वन्यप्राणियों की हिफाजत करता रहा। जबकि सामान्य वनमंडलों में हाल और भी बदतर था।

इन क्षेत्रों में वायरलेस का इस्तेमाल नहीं हो सका। हालांकि दावा तो यह भी है कि फ्रीक्वेंसी बंद हो जाने के बाद मप्र वन विभाग ने वायरलेस का विकल्प पीडीए मोबाइल को बनाया। प्रदेशभर में मैदानी कर्मचारियों को मोबाइल दिए गए। लेकिन, ये कारगर साबित नहीं हुए क्योंकि घने वन क्षेत्रों में किसी भी सेल्युलर कंपनी का नेटवर्क नहीं था।

लिहाजा, यह व्यवस्था भी जल्द ही हाशिए पर आ गई थी। साफ है कि बीते दस सालों तक मप्र वन विभाग का समूचा सुरक्षा व सूचना तंत्र बुरी तरह प्रभावित था और लगभग ठप था। इस बीच यहां 170 बाघों की मौत हुई, जिनमें से 41 शिकार के चलते मारे गए, लेकिन जिम्मेदार विभाग इन मौतों के लिए इस विवाद को जिम्मेदार नहीं मान रहे हैं। वन विभाग का कहना है कि दूरसंचार मंत्रलय से चोरी-छिपे वह संरक्षित क्षेत्रों में वायरलेस की मदद से बाघों की हिफाजत करता रहा।

दरअसल, वन्यप्राणियों और जंगलों की सुरक्षा के लिए वन विभाग ने वर्ष 1991 में दूरसंचार मंत्रलय से वायरलेस फ्रीक्वेंसी का लाइसेंस लिया था, लेकिन शुल्क नहीं चुकाया गया। वन विभाग के अफसरों का कहना था कि जंगल और वन्यप्राणियों की हिफाजत भी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय है, इसलिए दूरसंचार विभाग द्वारा शुल्क नहीं लिया जाना चाहिए, लेकिन दूरसंचार मंत्रलय का कहना था कि मप्र वन विभाग उपभोक्ता है, लिहाजा शुल्क देना होगा। इस विवाद के बीच वर्ष 2006 तक दूरसंचार विभाग फ्रीक्वेंसी देता रहा, लेकिन तब तक ब्याज समेत इसका शुल्क 36 करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया।

2006 में फ्रीक्वेंसी का लाइसेंस रद कर दिया गया। 2006 से लेकर अब तक मप्र वन विभाग का सुरक्षा-सूचना तंत्र बुरी तरह प्रभावित रहा है। इधर, बकाया भी बढ़कर 70 करोड़ रुपये हो गया। मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक जिम्मेदारों ने बताया कि इस विवाद को सुलझाने के लिए वनमंत्री और मुख्यमंत्री स्तर से प्रयास किए गए, लेकिन शुल्क माफ नहीं हुआ।

इस दौरान इस मामले में तत्कालीन केंद्रीय मंत्रियों जयराम रमेश, प्रकाश जावड़ेकर और स्व. अनिल माधव दवे ने भी अपने स्तर पर प्रयास किया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दो बार और मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कार्यभार संभालते ही दूरसंचार मंत्री को पत्र लिखकर विवाद सुलझाने को कहा था।

मामले में एक बार प्रधानमंत्री को भी पत्र लिखा गया। इसके अलावा केंद्रीय और राज्य के वन मंत्रियों की हर मीटिंग में वायरलेस फ्रीक्वेंसी मुद्दा बना रहा।

केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रलय, मप्र के अफसरों और दूरसंचार मंत्रलय के अफसरों के बीच सालों तक बैठकों का दौर चला, लेकिन कुछ हुआ नहीं।

मामला सुलझने के बाद मप्र वन विभाग को हाल ही में वायरलेस फ्रीक्वेंसी का नया लाइसेंस मिला है। विभाग अब 1500 सेट खरीदेगा, जो संरक्षित क्षेत्रों में दिए जाएंगे। दूसरे चरण में सामान्य वनमंडलों के लिए सेट खरीदे जाएंगे। विभाग की संरक्षण शाखा वायरलेस सेट चयन करने के लिए गठित कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर आगे कार्यवाही करेगी।

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