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यह ‘हसीना’ और 16 करोड़ की आबादी का मुल्क कभी नहीं भूलेगी भारत का यह अहसान

Bangladesh PM Sheikh Hasina बताया जाता है कि तकरीबन छह साल (1975-1981) तक शेख हसीना को गुप्त तरीके से रखा गया था और इस दौरान उनकी सुरक्षा का खास ध्यान रखा जाता था।

नई दिल्ली , पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का चार दिवसीय दौर खत्म हो गया है। अपने दौरे के आखिरी दिन रविवार को बांग्लादेश में सत्तासीन अवामी लीग पार्टी की मुखिया शेख हसीना ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी से भी मुलाकात की। बता दें कि भारत और बांग्लादेश के बीच अटूट रिश्ता रहा है। वर्ष 1975-1981 के दौरान जब शेख हसीना निर्वासित जीवन गुजार रही थीं तो इंदिरा गांधी ने ही उन्हें भारत में शरण दी थी। शेख हसीना भारत और इंदिरा गांधी का अहसान ताउम्र नहीं भुला सकती हैं।

इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश के निर्माण में दिया था अहम योगदान

दरअसल, वर्ष- 1971 में सोनिया गांधी की सांस और भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 3 दिसंबर, 1971 को अमेरिका के विरोध के बावजूद भारतीय सेनाओं को ने पूर्वी पाकिस्तान में प्रवेश किया और फिर बांग्लादेश बनवाकर से सेना वापस लौटी। इस हिसाब से 1971 में बांग्लादेश का मुक्त युद्ध हुआ था। दरअसल, यह मुक्ति युद्ध वर्ष 1971 में 24 मार्च से 16 दिसंबर तक चला। इस संग्राम बहुत खून बहा, लेकिन आखिरकार इस जंग जीता बांग्लादेश और पाकिस्तान से अपनी स्वाधीनता हासिल कर ली। फिर 18 दिसंबर, 1971 को भारत को एक और पड़ोसी मुल्क मिला, नाम है ‘बांग्लादेश’।

पिता की हत्या ने हिला दिया था शेख हसीना को

बांग्लादेश बन जाने के बाद शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति बने। उन्हें शेख मुजीब के नाम से भी जाना जाता है। पाकिस्तान के खिलाफ स्वाधीनता की लड़ाई में मुजीब ही अगुआ थे। पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सशस्त्र संग्राम की अगुआई करते हुए बांग्लादेश को मुक्ति दिलाई। फिर 15 अगस्त, 1975 को बांग्लादेश में सैन्य तख्तापलट हुआ, जिसमें शेख मुजीर की हत्या कर दी गई। इस खबर ने शेख हसीना को हिलाकर रख दिया था।

छह साल तक गुप्‍त तरीके से रखने के दौरान रखा जाता था सुरक्षा का खास ख्‍यालवह काफी दिनों तक सदमे में रहीं। उनका दुर्भाग्य ही था कि वह अपने पिता का अंतिम दर्शन तक नहीं कर सकीं, क्योंकि बांग्लादेश के हालात बहुत खराब था। बता दें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और मुजीब-उर-रहमान के निजी संबंध थे और दोनों ही एक-दूसरे की बड़ी इज्जत करते थे। यही वजह था कि सैन्य तख्ता पलट में जब मुजीब की हत्या हुई और बांग्लादेश अशांत हो गया तो इंदिरा ने खुद आगे बढ़कर शेख हसीन को भारत में राजनीतिक शहर देने का ऑफर दिया। बताया जाता है कि तकरीबन छह साल (1975-1981) तक शेख हसीना को गुप्त तरीके से रखा गया था और इस दौरान उनकी सुरक्षा का खास ध्यान रखा जाता था।

शेख हसीना वर्षों तक रहीं दिल्ली में

बांग्लादेश में उथल-पुथल के दौरान शेख हसीना बांग्लादेश में सैन्य तख्तापलट के बाद जर्मनी से दिल्ली आईं। उन्हें इंदिरा गांधी ने ही भारत में राजनीतिक शरण दी। इसके बाद शेख हसीना 1981 तक दिल्ली में रहीं और फिर 1981 के बाद बांग्लादेश गई और फिर राजनीतिक संघर्ष कर बाद में वहां की प्रधानमंत्री भी बनीं। वहीं, दिल्ली में वह अपने पति डॉ. एमए वाजेब मियां के साथ रहीं। इस बीच वह कुछ समय तक 56 लाजपतनगर पार्ट-3 में भी रहीं।

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पत्नी थी शेख हसीना की करीबी सहेली

भारत में निर्वासित जीवन गुजारने के दौरान पूर्व राष्ट्रपति की पत्नी शुभ्रा मुखर्जी से शेख हसीना की अच्छीमित्रता थी। भाषाई स्तर पर भी एक जुड़ाव था। दोनों परिवारों का भी अक्सर मिलना-जुलना होता था। दोनों के रिश्ते ने दोनों देशों को भी जोड़ा। बात 2010 की है, जब शेख हसीना बतौर प्रधानमंत्री दिल्ली आईं तो समय निकालकर अपनी खास सहेली शुभ्रा से मिलीं। शुभ्रा का शेख हसीना से करीबी का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जब अगस्त, 2015 में शुभ्रा ने दुनिया को अलविदा कहा तो हसीना बेहद भावुक हो गईं। इतना ही नहीं, शेख हसीना ढाका से उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने के लिए आईं और नम आंखों से अपनी खास सहेली को विदाई दी। इस दौरान उनकी बेटी पुतुल भी उनके साथ थी।

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