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Coronavirus के इलाज के लिए अमेरिका मध्य प्रदेश से खरीद रहा क्लोरोक्वीन, स्थानीय बाजारों से गायब हुई दवा

Coronavirus Treatment अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने मलेरिया के इलाज में काम आने दवा क्लोरोक्वीन का आयात मध्यप्रदेश से शुरू कर दिया है।

अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने मलेरिया के इलाज में काम आने दवा क्लोरोक्वीन का आयात मध्यप्रदेश से शुरू कर दिया है। मप्र में तीन इकाइयों के जरिए इस दवा का बड़े पैमाने पर निर्माण करने वाली कंपनी इप्का लेबोरेटरी को अमेरिका के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (यूएस-एफडीए) ने दवा मंगाने का ऑर्डर दिया है। कंपनी ने भी निर्यात पर सहमति देते हुए बीएसई और एनएसई को इसकी सूचना भेज दे दी है। प्रदेश में ही बन रही यह दवा स्थानीय बाजारों से गायब हो चुकी है। देश की जरूरतों को ताक पर रखकर विदेश में दवा भेजने का स्थानीय स्तर पर विरोध भी शुरू हो गया है।

इप्का लेबोरेटरी ने बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) को 21 मार्च को सूचना भेजी है कि 20 मार्च को अमेरिका एफडीए की ओर से उन्हें ई-मेल मिला है। कंपनी ने अपने पत्र में लिखा है कि विभिन्न रिसर्च, रिपो‌र्ट्स में ‘क्लोरोक्वीन फॉस्फेट’ व ‘हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन सल्फेट’ को कोराना के इलाज मददगार पाया गया है। अमेरिका में इस दवा के कच्चे माल और तैयार दवा की कमी के बाद यूएस एफडीए ने इसकी मांग की है।

कंपनी ने यह जानकारी दी है कि अन्य तमाम देशों से इस तरह की मांग आ रही है और दवा तमाम देशों को निर्यात भी की जा रही है। मलेरिया के इलाज की इस प्रचलित दवा का निर्माण करने वाली इप्का लैब सबसे बड़ी दवा कंपनी है। इप्का के तीन प्लांटों में इस दवा का उत्पादन हो रहा है। तीनों ही मप्र में हैं। रतलाम में स्थित प्लांट में कंपनी ‘हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन सल्फेट’ और ‘क्लोरोक्वीन फॉस्फेट’ का एक्टिव फॉर्मास्यूटिकल इंग्रेडिएंट यानी बेसिक ड्रग बना रही है।

इस बेसिक ड्रग को अन्य दवा निर्माता इकाइयां खरीदकर उससे क्लोरोक्वीन की टेबलेट या सीरप जैसे उत्पाद तैयार करती हैं। इसके अलावा इप्का पीथमपुर सेज में स्थित प्लांट और पिपरिया (सिलवासा) स्थित प्लांट में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन सल्फेट की टेबलेट व उपयोग के लिए दवा तैयार हो रही है। कंपनी पहले से यूरोप में इस दवा का निर्यात कर रही है।

करीब सप्‍ताह भर पहले ही कोरोना में इस दवा के असरदार होने की खबरें विश्व के अलग-अलग देशों से सामने आई थीं। इसके बाद से विदेश से इसकी मांग एकाएक बढ़ने लगी। नतीजा हुआ कि छोटी दवा कंपनियां जो अब एपीआई यानी बेसिक ड्रग लेकर उपयोग की दवा तैयार करती थीं, महंगे दामों पर भी उन्हें पर्याप्‍त मात्रा में कच्चा माल नहीं मिल रहा है।

इंदौर केमिस्ट एसोसिएशन के अध्‍यक्ष विनय बाकलीवाल ने कहा कि थोक बाजारों में क्लोरोक्वीन के फॉर्मूलेशन की किल्लत आ गई है। ज्यादातर काउंटरों पर अब माल नहीं बचा है। लिहाजा रिटेलर्स को भी उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। इस ओर सरकार व प्रशासन को ध्यान देने की जरूरत है।

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