सिर्फ अमीरों के घरों में पाया जाता था यह खास मसाला, यूरोप के लिए था रहस्यमय

हम जिन मसालों का इस्तेमाल करते हैं उसी में एक चमत्कारी मसाला है दालचीनी जो एक खास पेड़ के छाल से बनती है। इसका पाउडर और तेल भी खासा काम आता है। औषधी के रूप में भी ये है लाभकारी।

नई दिल्ली, स्टार सवेरा ।

एक जमाना था कि दालचीनी यूरोप के लिए सबसे रहस्यमयी मसाला था। अरब सौदागर जब उन्हें लेकर यूरोप के तमाम देशों में पहुंचते थे तो दालचीनी के स्त्रोत के बारे में ऐसी-ऐसी कहानियां गढ़ते थे कि लगता था कि दालचीनी मसाला कम और रहस्य ज्यादा था। उस जमाने में दालचीनी अगर रईसों के वैभव का प्रतीक बन गई तो कुछ लड़ाइयों की भी गवाह बनी।

दालचीनी का मानव से रिश्ता

हजारों सालों से रहा है। 2000 ईसा पूर्व में इसके मिस्त्र में इस्तेमाल का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि यह दालचीनी चीन में होती थी और मिस्त्र जाती थी। तब इसका इस्तेमाल लेपन के काम में सुंगध के लिए होता था। यहां तक कि इसके बारे में बाइबल के ओल्ड टेस्टामेंट में आवश्यक तेल के रूप में हुआ है। माना जाता है कि दालचीनी की पैदावार प्राचीन समय में केवल दक्षिण भारत और श्रीलंका में होता था।

यहीं से अरब सौदागर इसे भर-भरकर यूरोप लेकर जाते थे। यह भी कहा जाता है कि जब रोमन सम्राट नीरो की दूसरी बीवी पोपाए सबीना का 65 ईस्वीं में देहांत हुआ तो उसने अंतिम संस्कार में अधिकतम दालचीनी जलाया।

दालचीनी रखने का मतलब रईस होना

अरब सौदागर यूरोप तक दालचीनी ले जाने के लिए जिस रास्ते का इस्तेमाल करते थे, उसमें वह सीमित मात्रा में इसे लेकर जा सकते थे, इसके चलते यह न केवल यूरोप में बहुत महंगी बिकती थी, बल्कि स्टेटस सिंबल भी बन गई। जब कोई मध्यवर्ग का शख्स तरक्की करके ऊपर के स्तर पर पहुंचता था, वहां वह अपने स्टेटस का प्रदर्शन करने के लिए दालचीनी जरूर खरीदता था। उस समय दालचीनी का इस्तेमाल खास लोगों द्वारा होता था। यह जाड़े के दिनों में मीट के प्रिजर्वेटिव के रूप में होता था। यूरोप में हालांकि इसका इस्तेमाल अच्छा खासा होने लगा था।

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