गर्मी से राहत पाने के साथ ही कुछ नए और अनोखे एक्सपीरियंस के लिए लाहौल-स्पीति का करें प्लान

मई-जून का महीना शुरू होते हैं हिल स्टेशन पर जाने वालों की तादाद एकदम से बढ़ जाती है। तो क्यों न ऐसी जगह का प्लान बनाएं जो गर्मी से राहत भी दिलाए और जहां लोगों की बहुत भीड़ भी न हो।

नई दिल्ली, स्टार सवेरा ।

गर्मी से राहत पाने के साथ ही कुछ नए और अनोखे एक्सपीरियंस के लिए लाहौल-स्पीति का करें प्लान
मई-जून का महीना शुरू होते हैं हिल स्टेशन पर जाने वालों की तादाद एकदम से बढ़ जाती है। तो क्यों न ऐसी जगह का प्लान बनाएं जो गर्मी से राहत भी दिलाए और जहां लोगों की बहुत भीड़ भी न हो।

मई-जून की तपती गर्मी में किसी ऐसी जगह जाना चाहते हैं जहां इससे राहत मिलने के साथ ही थोड़ी सैर भी हो जाए तो स्पीति इसके लिए है परफेक्ट डेस्टिनेशन। जहां अप्रैल-मई में ही नहीं साल के 6 माह बर्फ की मोटी चादर बिछी होती है। नज़ारा इतना खूबसूरत होता है जिसका अंदाजा आपको यहां आकर ही लगेगा। रोमांस, एडवेंचर के साथ ही ये जगह धर्म-आध्यात्म के लिहाज से भी है बेहतरीन। जानेंगे यहां आकर किन जगहों की सैर है पैसा वसूल।
10वीं सदी का त्रिलोकीनाथ मंदिर

यह मंदिर 10वीं शताब्दी में बनाया गया था। 2002 में मंदिर परिसर में पाए गए शिलालेख से इसका खुलासा हुआ था। जिला मुख्यालय केलंग से लगभग 45 किलोमीटर की दूरी पर है। त्रिलोकीनाथ मंदिर का प्राचीन नाम टुंडा विहार है। शिलालेख में इसका वर्णन किया गया है कि यह मंदिर दवनज राणा ने बनाया था, जो त्रिलोकीनाथ गांव के राणा ठाकुर शासकों के पूर्वजों के प्रिय हैं। उनकी मदद चंबा के राजा शैल वर्मन ने की थी। हिंदू व बौद्ध परंपराओं के अनुसार इस मंदिर में पूजा की जाती रही है।
नीलकंठ झील

यहां महिलाएं नहीं जातीं! यह झील पटन घाटी के नैनगार में स्थित है। नीलकंठ महादेव नाम के अनुरूप ही यह नीले रंग की छोटी-सी झील है। नीलकंठ झील 4500 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां दूर-दूर से सैलानी ट्रैकिंग के लिए आते हैं। नैनगार से यहां के लिए लगभग 12 किमी. पैदल सफर करना पड़ता है। इस झील से जुड़ा एक रोचक पक्ष यह है कि इसका दर्शन केवल पुरुष ही कर सकते हैं। महिलाओं को यहां आने की अनुमति नहीं है। महिलाओं को जाने की अनुमति क्यों नहीं है, इसको लेकर सही जानकारी किसी के पास नहीं है।

स्पीति घाटी में 14,100 फीट की ऊंचाई पर स्थित ऐतिहासिक चंद्रताल झील का अपना ही महत्व है। अगर आप मनाली से स्पीति जा रहे हों तो कुंजुम से पहले बातल के बाद सीधा संपर्क मार्ग से चंद्रताल का रुख कर सकते हैं। कुंजुम पहाड़ी के साथ सटी चंद्रताल झील अपने आप में अजूबा है। इसी झील से चंद्रा नदी का उदय होता है, जो आगे चलकर चिनाब नदी बनती है। झील का घेरा लगभग तीन किलोमीटर है। यहां आने के लिए जून 15 से अक्टूबर के प्रथम सप्ताह तक बेहतर समय माना जाता है।

आराध्य देव राजा घेपन मंदिर

लाहुल-स्पीति के राजा माने जाने वाले राजा घेपन का यह मंदिर मनाली-केलंग मार्ग में सिस्सू में स्थित है। केलंग जाने वाला हर पर्यटक यहां रुककर देवता के दर्शन करता है। देश-विदेश के सैलानी भी यहां सुख-समृद्धि की कामना से माथा टेकते है। मान्यता है कि हर तीसरे साल देवता राजा घेपन लाहुल घाटी की परिक्रमा पर निकलते हैं और ग्रामीणों को आशीर्वाद देते हैं।

समुद्र तल से 3050 मीटर की ऊंचाई पर स्थित ताबो मठ काजा से 40 किमी. दूरकाजा-किन्नौर मार्ग पर स्थित है। यह मठ हिमालय क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण मठ माना जाता है। इसका निर्माण 996 ई. में हुआ था।

गोम्पाओं और मठों की इस धरती में प्रकृति के विभिन्न रूप देखने को मिलते हैं। किब्बर गांव में पहुंचकर ऐसा लगता है कि आप बिल्कुल आसमान के करीब हों। काजा से 12 किलोमीटर संपर्क मार्ग से किब्बर तक पहुंचा जा सकता है।

स्पीति की पिन वैली हिमालय की बेहद खूबसूरत घाटियों में से एक है। ट्रैकिंग और पर्वतारोहण के शौकीन सैलानी अक्सर यहां आते हैं। यहां के जंगलों में बर्फीले तेंदुए और आईबैक्स पाए जाते है। कुल्लू के मणिकर्ण से सीधा ट्रेक पिन वैली में निकलता है। अधिकतर देश भर के ट्रेकर इस रूट के शौकीन हैं।
चीन सीमा के साथ सटा ग्यू गांव दुनिया के सैलानियों को आकर्षित कर रहा है। यहां 550 साल पुरानी ममी आज भी रहस्यमयी बनी हुई है। कहा जाता है कि 1993 में सड़क खुदाई में जब ममी मिली थी तो उसके सिर पर गैंती लगने से खून निकला था। ग्यू के ग्रामीणों ने इसे अमानत मानकर गांव में मंदिर बनाकर रखा है। मान्यता है ममी 550 साल पुरानी है। बिना किसी लेप के इतने साल से सुरक्षित ममी सभी को हैरान करती है।

एक ओर जहां दुनियाभर के लोग विलुप्त होते बर्फानी तेंदुओं को लेकर चिंतित है, वहीं स्पीति घाटी में इनका कुनबा बढऩे लगा है। वन विभाग द्वारा कराई गई गणना में इसका खुलासा हुआ है। स्पीति घाटी के ठंडे पठार इन तेंदुओं को खासे रास आए हैं। घाटी में बर्फानी तेंदुए के लिए भोजन भी पर्याप्त मिल जाता है। बर्फानी तेंदुए स्पीति घाटी के मुद, तोदनम, खर, गेते, टशीगंग, किब्बर, डेमुल, लांगचा, हिक्किम और कोमिक के इलाकों में देखे जाते हैं। वाइल्डलाइफ विंग, काजा के अनुसार, 35 बर्फानी तेंदुओं की गिनती विभाग ने की है। बर्फानी तेंदुए स्पीति के पिन वैली नेशनल पार्क, चंद्रताल, वाइड लाइफ सैंक्चुअरी और किब्बर वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी के 2000 वर्ग किलोमीटर के दायरे में पाए गए हैं। इनकी गणना कैमरा ट्रैप से की गई है। आज देशभर के वन्यप्राणी प्रेमी स्पीति में इनको देखने के लिए सर्दियों में भी रुख कर रहे हैं, जिससे पर्यटन को भी बढ़ावा मिल रहा है।

हिमाचल के कुल्लू जिले की पर्यटन नगरी मनाली से रोहतांग व कोकसर होते हुए लाहुल पहुंचा जा सकता है। मनाली से जिला मुख्यालय केलंग की दूरी 110 किमी. है। गर्मियों में शिमला से किन्नौर से होते हुए स्पीति घाटी व कुंजम दर्रे से होकर लाहुल पहुंचा जा सकता है। जम्मू से किश्तवाड़ व पांगी होते हुए भी लाहुल-स्पीति आया जा सकता है। लेह से मनाली आने वाले सैलानी लाहुल घाटी से होकर गुजरते हैं। यहां तक पहुंचने का साधन सिर्फ सड़कें ही हैं। सर्दी में सरकार हवाई उड़ानें संचालित करवाती है, लेकिन वे सैलानियों के लिए नहीं होतीं।

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