सेहत, पर्यावरण के लिए इस तरह खतरा बन रहे हैं ‘सैनेटरी नैपकीन’

आज पूरा विश्व पर्यावरण दिवस (world environment day) मना रहा है.

नई दिल्ली, स्टार सवेरा ।

पर्यावरण के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए हर साल 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है. यूं तो पर्यावरण को क्षति पहुंचाने के लिए कई कारण जिम्मेदार हैं लेकिन क्या आप जानते हैं महिलाओं द्वारा महावारी के दौरान इस्तेमाल किए जाने वाले सैनिटरी पैड्स भी इस दौड़ में शामिल हैं.

सैनिटरी पैड्स भी पर्यावरण को दूषित करने का काम करते हैं. आइए आज विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर जानते हैं कैसे सैनिटरी नैपकिन और पर्यावरण से जुड़ी वो बातें जिन्हें ज्यादातर महिलाएं अनजान रहती हैं.

अक्सर महिलाएं सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल करते हुए इस बात से अनजान रहती हैं कि इनकी गिनती स्वंय नष्ट होने वाली चीजों में नहीं होती है. जिसकी वजह से ये पर्यावरण को स्वच्छ बनाए रखना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है.

कई बार फेंके गए पैड्स को आवारा कुत्ते फाड़कर और गंदगी फैला देते हैं. तो कई बार महिलाएं सैनिटरी पैड्स यूज करने के बाद उन्हें सीवेज लाइन्स में बहा देती हैं. जिसकी वजह से सैनिटरी पैड्स पानी सोख कर शहरों के ड्रेनेज सिस्टम को भी खराब कर देते हैं.

सैनिटरी पैड्स के इस्तेमाल के बाद उन्हें म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (कचरा) के रूप में खुले में फेंक दिया जाता है या फिर फ्लश के जरिए बहा दिए जाते हैं.भारत में हर महीने एक अरब से ज्यादा सैनिटरी पैड गैर निष्पादित हुए सीवर, कचरे के गड्ढों, मैदानों और जल स्रोतों में जमा हो जाते हैं. जिसकी वजह से बड़े पैमाने पर पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है.

सैनिटरी पैड की वजह से न सिर्फ पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है बल्कि लोगों की सेहत को भी नुकसान पहुंच रहा है. खुले में फैंके सैनिटरी नैपकिन कचरा उठाने वाले के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं. दरअसल इस्तेमाल हुए सैनिटरी नैपकिन्स में लगे खून से सूक्ष्म जीवाणु यानी माइक्रो ऑर्गनिज़्म्स फैलने लगते हैं जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं.

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