राजस्थान हाईकोर्ट ने जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) में जोड़े गए 679 गांवों में निर्माण पर रोक लगा दी है। यह अंतरिम रोक कार्यवाहक न्यायाधीश एसपी शर्मा और जस्टिस बलजिंदर संधू की बेंच ने संजय जोशी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए लगाई। याचिका में जेडीए में शामिल किए गए गांवों में अवैध निर्माण की आशंका जताई गई है।
कोर्ट ने जेडीए के भू-विस्तार करने वाली 1 अक्टूबर 2025 की अधिसूचना पर सरकार और JDA से जवाब मांगा है। कोर्ट ने पूछा- किन आधारों पर इन गांवों को जेडीए में शामिल किया गया।
अधिसूचना से सरकार ने जयपुर शहर के दायरे को लगभग दोगुना कर दिया। इससे जयपुर शहर का दायरा 3 हजार वर्ग किलोमीटर से बढ़कर करीब 6 हजार वर्ग किलोमीटर हो गया है। सरकार का कहना है कि इससे शहर का विकास और बेहतर तरीके से हो सकेगा।
मास्टर प्लान में इन गांवों को शामिल करने का प्रावधान नहीं
याचिकाकर्ता की एडवोकेट जया मित्रा ने बताया- राज्य सरकार की एक अक्टूबर 2025 की अधिसूचना के तहत जेडीए के अधिकार क्षेत्र में 679 ग्रामीण और कृषि प्रधान गांवों को शामिल कर दिया गया। यह अधिसूचना तीन अक्टूबर, 2025 को राजपत्र में प्रकाशित हुई।
लेकिन यह विस्तार बिना किसी वैध मास्टर प्लान, जोनल डेवलपमेंट प्लान और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के किया गया है। मौजूदा मास्टर प्लान 2025 में इन गांवों को शामिल करने का कोई प्रावधान नहीं है। 2025 के बाद लागू होने वाला नया मास्टर प्लान 2047 भी अभी तक तैयार नहीं हुआ है।
इसके बावजूद सरकार ने सीधे 679 गांवों को जोड़कर प्रक्रिया की अनदेखी की है। याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह निर्णय न केवल मनमाना है बल्कि जेडीए एक्ट के प्रावधानों के भी विपरीत है।
बिना एक्सपर्ट की राय के लिया निर्णय
याचिका में कहा- यह विस्तार एक आंतरिक समिति की रिपोर्ट पर आधारित है। इसमें शुरुआत में 272 गांवों को शामिल करने का प्रस्ताव था। लेकिन बाद में इसे 100 किलोमीटर के दायरे के आधार पर बढ़ा दिया गया।
इस प्रक्रिया में न तो ग्राम पंचायतों से कोई सलाह ली गई और न ही किसी स्वतंत्र विशेषज्ञ या पर्यावरणीय अध्ययन को आधार बनाया गया।
इस फैसले से ग्राम पंचायतों की शक्तियां खत्म हो जाएंगी। लाखों ग्रामीण सीधे शहरी नियमों के दायरे में आ जाएंगे। इससे प्रशासनिक भ्रम और आर्थिक दबाव बढ़ेगा। सबसे बड़ा नुकसान गोचर भूमि, चरागाह और सामुदायिक संसाधनों के खात्मे का होगा।
सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों का दिया हवाला
याचिका में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व फैसलों, विशेषकर 2017 के एक महत्वपूर्ण निर्णय का हवाला दिया है। इसमें कहा है कि मास्टर प्लान में बदलाव या विस्तार से पहले पर्यावरणीय आकलन, जनसुनवाई और पारदर्शी प्रक्रिया जरूरी है।
लेकिन इस मामले में इन सभी आवश्यकताओं की अनदेखी की गई है। इस विस्तार से कृषि भूमि का नुकसान, भूजल स्तर में गिरावट, जंगलों और पर्यावरणीय क्षेत्रों पर दबाव तथा अनियंत्रित रियल एस्टेट गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।