दोस्त बदले, दुश्मन बदले, चेहरा सिर्फ एक- मुख्यमंत्री नीतीश कुमार:कभी पत्नी से मिलने आधी रात निकल पड़े थे नीतीश; पाकिस्तान ने बताया था अगला PM

नीतीश कुमार अब बिहार के साथ-साथ देश की सियासत के सबसे बड़े सिकंदर बन चुके हैं। उन्होंने गुरुवार को 10वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। यह नया रिकॉर्ड है। हालांकि, उनके 9वीं बार सीएम बनने का भी रिकॉर्ड कोई भी नहीं तोड़ पाया है।

एक ऐसा नेता जिसने आंदोलनकारी से लेकर लोकप्रिय मुख्यमंत्री तक का सफर तय किया। कभी केंद्र की राजनीति बदली तो कभी बिहार में कभी दोस्त बदले, दुश्मन बदले, विचार बदले, लेकिन एक चीज हमेशा कॉमन रही वो है- मुख्यमंत्री नीतीश कुमार…।

कभी 8 दिन की यात्रा पर पाकिस्तान पहुंचे थे नीतीश

किस्सा नवंबर 2012 का है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 8 दिन की सरकारी यात्रा पर पाकिस्तान पहुंचे। सिंध प्रांत के पूरे मंत्रिमंडल ने कराची एयरपोर्ट पर उनका स्वागत किया।

फिर वे पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और प्रधानमंत्री रजा परवेज अशरफ से मिले। क्रिकेटर से नेता बने इमरान खान ने भी नीतीश को अपने घर पर चाय की दावत दी।

इमरान PTI पार्टी बनाकर पाकिस्तान में चुनाव लड़ रहे थे। तब नीतीश और इमरान के लिए पंजाब और सिंध के गांवों की दीवारों पर उर्दू में नारे लिखे थे- ‘पाकिस्तान का होने वाला प्रधानमंत्री इमरान खान जिंदाबाद। हिंदुस्तान का होने वाला प्रधानमंत्री नीतीश कुमार जिंदाबाद।’

भारत में तो नीतीश कुमार के प्रधानमंत्री बनने की चाह किसी से भी छिपी नहीं थी, लेकिन इसका नजारा पाकिस्तान में भी देखने मिलेगा, ये किसी ने नहीं सोचा होगा।

नीतीश कुमार का जन्म 1 मार्च 1951 को पटना के बख्तियारपुर में हुआ। पिता कविराज राम लखन सिंह पेशे से आयुर्वेदिक वैद्य थे। मां परमेश्वरी देवी खेती और घर-परिवार संभालतीं। माता-पिता, नन्हे नीतीश को मुन्ना कहकर पुकारते।

पिता राम लखन से इलाज कराने के लिए मरीजों की भीड़ लगती। मुन्ना उनकी मदद करते। आयुर्वेदिक दवाइयों की पुड़िया बांध देते। पिता कांग्रेस के एक्टिव मेंबर भी थे। सो मुन्ना बचपन से ही राजनीति को देख-समझ रहे थे।

नीतीश के दोस्त उदय कांत अपनी किताब ‘नीतीश कुमार: अंतरंग दोस्तों की नजर से’ में बचपन के एक वाकये का जिक्र करते हैं। वे लिखते हैं, बारिश में गंगा नदी का पानी घाट के ऊपर तक आ जाता था। एक दिन बाढ़ का मटमैला पानी देखकर बच्चे तैरने का स्वांग करने लगे। मुन्ना भी पेट के बल घाट पर लेट गया। तभी उसकी ठुड्डी सीढ़ी से टकराई और गहरा घाव हो गया। मुन्ना खूब रोया। धीरे-धीरे जख्म तो भर गया, लेकिन आज भी उसका निशान मुन्ना की ठुड्डी पर दिख जाता है।

6 साल की उम्र में नीतीश बख्तियारपुर के गणेश हाई स्कूल में पढ़ने लगे। 10वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद परिवार ने उन्हें इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पटना भेज दिया। जून 1967 में उन्होंने बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग में दाखिला ले लिया, जिसे आज NIT पटना कहा जाता है। उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की।

सीनियर जर्नलिस्ट संतोष सिंह अपनी किताब ‘रूल्ड ऑर मिसरूल्ड’ में लिखते हैं, ‘नीतीश कुमार, डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवादी आंदोलन से प्रभावित थे। छात्र राजनीति में सक्रिय थे। जब पिता राम लखन को ये पता चला तो उन्होंने नीतीश को समझाया कि पहले तुम पढ़ाई पूरी कर लो। उसके बाद राजनीति या किसी भी पेशे के बारे में सोचना।’

इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स की यूनियन बनाई, पहले अध्यक्ष चुने गए

कॉलेज में नीतीश कुमार को अरुण सिन्हा, उदय कांत, नरेंद्र कुमार और कौशल मिश्र मिले। दोस्तों की इस टोली का नाम ‘रसमंजरिया पार्टी’ पड़ गया।

उदय कांत लिखते हैं- पटना में स्टूडेंट्स के कॉलेज आने-जाने के लिए कोई बस नहीं चलती थी। काफी दिक्कतें होती थीं। ऐसे में नीतीश ने तिकड़म भिड़ाई और सरकार पर दबाव बनाने का सोचा।

इसी बीच कुछ स्टूडेंट्स ने सरकारी बस रोक ली और पुलिस को चकमा देते हुए उसे कॉलेज में ले आए। कुछ साथियों ने उसे जलाने का फैसला किया। तभी नीतीश ने फिल्मी अंदाज में ऐलान किया कि ये सब मेरी लाश पर होगा। इसके बाद नीतीश आंदोलन की धुरी बन गया।

बवाल बढ़ता देख मुख्यमंत्री केदार पांडेय ने हमें मिलने बुलाया। नीतीश के नेतृत्व में कुछ स्टूडेंट्स उनसे मिले और उन्होंने हमारी मांग मान ली।

पूरे कॉलेज ने दुबले-पतले, नाजुक और शरीफ नीतीश को अपना नेता मान लिया। तब तक वे संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जुड़ चुके थे। 1972 में उन्होंने यूनियन बनाई। नाम रखा- बिहार अभियंत्रण महाविद्यालय स्टूडेंट्स यूनियन। नीतीश इसके पहले निर्विरोध अध्यक्ष चुने गए।’

जब नेवी ऑफिसर ने कहा- तुम पक्के नेता हो, फौज की नौकरी कैसे करोगे?

उदय कांत लिखते हैं, कॉलेज के तीसरे साल में एक बार नीतीश घर गया। वहां बाबूजी की ढलती सेहत, उनकी घटती आय और घर के बढ़ते खर्च देखकर काफी परेशान हुआ। पटना आकर उसने पैसे कमाने का फैसला किया।

उन दिनों कॉलेज में इंडियन नेवी की भर्ती परीक्षा हो रही थी। नीतीश ने परीक्षा दी और फाइनल इंटरव्यू के लिए सिलेक्ट हो गए। वे रुड़की गए। वहां पहले फिजिकल टेस्ट हुआ और फिर इंटरव्यू।

फिजिकल टेस्ट में नीतीश की हथेलियों में चोटें आईं। जैसे-तैसे उन्होंने टेस्ट पूरे किए। इसके बाद नेवी के अफसरों ने उनका इंटरव्यू लिया। इंटरव्यू खत्म होने के बाद जब नीतीश जाने लगे तो इंटरव्यू पैनल के चेयरमैन ने कहा, ‘नौजवान, वैसे तो तुम सही दिखते हो, लेकिन हो पक्के नेता! फौज की नौकरी कैसे करोगे?’

नीतीश ने उल्टा उन्हीं से सवाल कर दिया, ‘सर, आपने बिना बातचीत किए किस आधार पर मुझे नेता करार दिया?’

मुस्कुराते हुए चेयरमैन ने कहा, ‘बरखुरदार, तुम्हारी नेतागिरी का राज तुम्हारी आत्मविश्वास से भरी चाल खोल रही है।’

उदय कांत लिखते हैं, नीतीश का सिलेक्शन नहीं हुआ। वापस आकर वो कई दिनों तक सोचता रहा कि उसकी चाल देखकर कैसे कोई तय कर सकता है कि वह नेता है या बनेगा? शायद नीतीश कुछ उसी अंदाज से इंटरव्यू के लिए घुसा होगा, जैसे रावण के दरबार में अंगद घुसे थे।

गले में मछली का कांटा अटका तो नॉनवेज छोड़ा

सीनियर जर्नलिस्ट संतोष सिंह की किताब ‘रूल्ड ऑर मिसरूल्ड’ में नीतीश के दोस्त नरेंद्र कुमार बताते हैं, ‘कॉलेज के दिनों में हमारी चौकड़ी हर हफ्ते गांधी मैदान के पास वाले सिनेमा हॉल में फिल्म देखती। फिर चटनी-पकोड़े या साउथ इंडियन खाना खाते।

1980 के दशक में एक बार जब उनके गले में मछली का कांटा अटका, तब से उन्होंने नॉनवेज छोड़ दिया। उन्हें साउथ इंडियन और सात्विक खाना पसंद है। जैसे- चावल और दाल के साथ चोखा या आलू की भुजिया। वे हमेशा से शराब से दूर हैं।’

शादी में 22 हजार दहेज तय हुआ, तो अपने ही परिवार पर भड़क गए

1973 में नीतीश कॉलेज के आखिरी साल में थे। इसी साल उनके परिवार ने उनका रिश्ता नालंदा जिले के सेवदह गांव की मंजू कुमारी सिन्हा से तय कर दिया। उन्होंने मंजू से मिले बिना ही शादी के लिए हामी भर दी।

जब शादी के कार्ड बंटने लगे, तब नीतीश को पता चला कि शादी के लिए 22 हजार रुपए दहेज तय हुआ है। वे बहुत पहले ही शादी में दहेज न लेने की कसम खा चुके थे। यह बात उनके परिवार को भी पता थी। ऐसे में वे अपने परिवार पर काफी गुस्सा हुए।

शादी के नए कार्ड छपवाए गए, जिसमें लिखा था- ‘तिलक, दहेज एवं शोषण युक्त कुप्रथाओं से मुक्त’ और ‘पुष्प-माला एवं आशीर्वचन के अतिरिक्त किसी प्रकार के उपहार का आदान-प्रदान नहीं होगा।’

जेपी आंदोलन से जुड़े, जेल गए; कार्ल मार्क्स और संघ को पढ़ा

इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद नीतीश को रांची के बिजली विभाग में ट्रेनी इंजीनियर की नौकरी मिल गई, लेकिन वे यहां एक दिन नहीं टिके। उनके मन में राजनीति बस चुकी थी। सो वे पटना आ गए।

संतोष सिंह अपनी किताब ‘रूल्ड ऑर मिसरूल्ड’ में लिखते हैं, पटना आकर नीतीश जेपी आंदोलन से जुड़ गए। जब जेपी ने संचालन समिति बनाई, तो इसमें नीतीश को भी जगह मिली। जेपी नीतीश की काफी सराहना करते।

आंदोलन के दौरान RSS प्रचारक केएन गोविंदाचार्य की संगत में नीतीश ने संघ की किताबें पढ़ीं। कार्ल मार्क्स को भी पढ़ा, सिवाय दास कैपिटल के। नीतीश मानते हैं कि इसे समझना बहुत मुश्किल है।

1975 में इमरजेंसी लगने के बाद नीतीश एक गांव से दूसरे गांव छिपकर काम करने लगे। एक दिन वे गया में फल्गु नदी के किनारे खादी ग्रामोद्योग पहुंचे। जैसे ही मीटिंग शुरू हुई, तभी पुलिस ने छापा मारा। सब भागने लगे। इस भागदौड़ में नीतीश बच तो गए, लेकिन उनकी मूंगा जड़ी सोने की अंगूठी फल्गु नदी में गिर गई। ये अंगूठी उनकी दादी के झुमके से बनाई गई थी।

सालभर बाद 10 जून 1976 को भोजपुर जिले के दुबौली गांव में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। कुल 9 महीने तक उन्हें आरा, बक्सर और भागलपुर की जेल में रखा गया।

बेलछी नरसंहार के कारण हारे शुरुआती दो चुनाव

साल 1977 और तारीख 24 मई। पटना से 90 किलोमीटर दूर बेलछी गांव में 11 लोगों को मारकर जला दिया गया। इसमें 8 दलित और 3 सुनार थे। तब 31 लोगों पर केस दर्ज हुआ, जिनमें से ज्यादातर कुर्मी जाति के थे।

अगले ही महीने विधानसभा चुनाव हुए। जनता पार्टी ने 26 साल के नीतीश को नालंदा जिले की हरनौत सीट से उतार दिया। उनके साथी रहे भोला प्रसाद सिंह ने उन्हीं के सामने निर्दलीय पर्चा भर दिया।

चुनाव में बेलछी नरसंहार मुद्दा बना, क्योंकि हरनौत, बेलछी से महज 10 किलोमीटर दूर है। भोला हरनौत में कुर्मियों के दबदबे को समझते हुए अपनी रैलियों में आरोपियों को बेगुनाह बताने लगे। नारे लगे- ‘बम चले, चाहे गोला; जीतकर रहेगा भोला।’

नीतीश ने पीड़ितों का साथ दिया। इससे नाराज कुर्मी भोला के साथ हो लिए। नतीजे आए तो नीतीश 6 हजार वोटों से हार गए।

सीनियर जर्नलिस्ट सुरेंद्र किशोर के मुताबिक, चुनाव हारने के बाद एक दिन नीतीश मुझसे पटना के कॉफी हाउस में मिले। उन्होंने कहा कि सुरेंद्र जी! एक दिन तो मैं सत्ता में आऊंगा, चाहे जैसे भी हो, लेकिन ये तय है कि सत्ता में आने के बाद अच्छा काम ही करूंगा।

1980 में नीतीश ने दोबारा हरनौत सीट से चुनाव लड़ा। उनके सामने बेछली नरसंहार के आरोपी अरुण कुमार सिंह ने निर्दलीय पर्चा भर दिया। भोला और कुर्मी जाति ने उन्हें समर्थन दे दिया। इस बार भी नीतीश 5 हजार वोट से हार गए।

दो हार के बाद राजनीति छोड़ना चाहते थे नीतीश

सीनियर जर्नलिस्ट संकर्षण ठाकुर अपनी किताब ‘सिंगल मैन: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ नीतीश कुमार ऑफ बिहार’ में लिखते हैं- दो हार के बाद नीतीश चिड़चिड़े और सनकी हो चले थे। जब कभी घर आते तो खुद में या मित्रों में खोए रहते। जब कभी उनसे घर में सवाल किए जाते तो वो उल्टा-सीधा जवाब देते। पति-पत्नी के बीच बहस और कलह तक हो जाती।

उस वक्त नीतीश की पत्नी मंजू प्रेग्नेंट थीं। वो पिता के घर चली गईं। जल्द ही वे सरकारी टीचर बन गईं। इस बीच 20 जुलाई 1980 को इकलौते बेटे निशांत का जन्म हुआ। वे नाना-नानी की देखरेख में पले।

ये सब देख नीतीश को इतना धक्का लगा कि उन्होंने राजनीति छोड़कर सिविल कॉन्ट्रैक्टर बनने का फैसला कर लिया, लेकिन इस बीच वे समाजवादी नेता चंद्रशेखर से मिले। चंद्रशेखर ने उन्हें मदद और संरक्षण का वचन दिया। कुछ पैसे भी दिए। उन्हीं के कहने पर 1985 में नीतीश ने फिर से जोर लगाया और हरनौत से तीसरी बार चुनाव लड़ा।

तब नीतीश ने मंजू के सामने कसम खाई कि अगर वे इस बार हार गए तो राजनीति छोड़ कोई नौकरी या धंधा करेंगे और साथ रहेंगे। इस वादे पर मंजू ने उन्हें अपनी बचत के 20 हजार रुपए दे दिए। चंद्रशेखर और देवीलाल ने भी मदद की। नतीजे आए तो वे 22 हजार वोटों से जीत गए।

जीतकर वे बख्तियारपुर अपने घर पहुंचे। धूम-धाम से उनका स्वागत हुआ, लेकिन पत्नी मंजू नजर नहीं आई। तब मंजू अपने मायके सेवदह में थीं। बेचैन नीतीश ने आधी रात एक साथी से कहा- मोटरसाइकिल निकालो, हम मंजू से मिलने जाएंगे। तड़के नीतीश, मंजू के मायके पहुंचे। मंजू बहुत खुश हुईं।

विधायक बनने के बाद नीतीश को पटना में फ्लैट मिला। शादी के करीब 12 साल बाद नीतीश, मंजू और निशांत एक साथ परिवार की तरह रहने लगे।

जब नारा लगा- शेर ए बिहार कहलाते हो, बच्चा से टकराते हो

साल आया 1989 का। लोकसभा चुनाव हो रहे थे। चंद्रशेखर और देवीलाल ने नीतीश को बाढ़ लोकसभा सीट से जनता दल का टिकट दिलवा दिया। उनके सामने कांग्रेस और यादवों के कद्दावर नेता रामलखन सिंह यादव खड़े थे, जिन्हें शेर-ए-बिहार कहा जाता था।

चुनाव प्रचार के लिए देवीलाल ने नीतीश को एक जीप दी। एक एम्बेसडर कार उनके पास पहले से थी। उनके समर्थकों ने नारा लगाया, ‘शेर-ए-बिहार कहलाते हो और बच्चा से टकराते हो।’

नतीजे आए तो नीतीश ने रामलखन को 78 हजार वोटों से पटखनी दी। नीतीश अब पटना से दिल्ली पहुंच चुके थे। सालभर बाद वे वीपी सिंह सरकार में राज्यमंत्री बने और कृषि मंत्रालय का जिम्मा मिला।

1991 में फिर से लोकसभा चुनाव हुआ। नीतीश ने दूसरी बार बाढ़ सीट से जनता दल की ओर से पर्चा भरा। पौने दो लाख वोटों से जीतकर नीतीश कुमार दूसरी बार सांसद बने।

लालू से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई, ‌BJP से गठजोड़ किया

साल 1992 के आखिरी महीनों की बात है। लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री थे। उनके CM बनने में नीतीश ने बड़ी भूमिका निभाई थी, लेकिन धीरे-धीरे दोनों के बीच दूरियां बढ़ती गईं।

एक बार लालू दिल्ली के बिहार भवन में ठहरे हुए थे। नीतीश कुमार किसानों की कुछ मांगें लेकर उनसे मिलने पहुंचे। उनके साथ शिवानंद तिवारी, ब्रिशन पटेल और ललन सिंह थे। सभी लालू के कमरे में दाखिल हुए।

लेकिन कुछ ही मिनट बाद कमरे में बातचीत के बजाय गालीगलौज और मुक्केबाजी होने लगी। लालू जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। उन्होंने गुस्साते हुए ललन से कहा- ‘निकल बाहर, बाहर निकल, #$@।’

हल्ला-गुल्ला बिहार भवन के VIP गलियारे में गूंजने लगा। लालू ने अपने सिक्योरिटी गार्ड्स को आवाज दी- ‘पकड़ के फेंको बाहर, ले जाओ घसीट के।’

नीतीश अपने साथियों को लेकर वहां से चले गए और बड़बड़ाते रहे, ‘अब साथ चल पाना मुश्किल है।’ इसके बाद से नीतीश और लालू के रास्ते अलग हो गए। सीनियर जर्नलिस्ट संकर्षण ठाकुर ने अपनी किताब ‘द ब्रदर्स बिहारी’ में ये पूरा वाकया लिखा है।

14 अक्टूबर 1994 को नीतीश ने जॉर्ज फर्नांडिस के साथ मिलकर समता पार्टी बना ली। अगले साल हुए विधानसभा चुनाव में नीतीश पहली बार लालू के बिना खड़े हुए और जीते, लेकिन समता पार्टी सिर्फ 7 सीटें जीत पाई।

इसके बाद नीतीश ने BJP के साथ गठजोड़ कर लिया। 1999 में BJP के नेतृत्व वाली NDA की सरकार बनी। अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। नीतीश भी बाढ़ सीट से सांसद चुने गए और अटल सरकार में मंत्री बने। उन्हें रेल, कृषि जैसे मंत्रालयों का जिम्मा मिला।

पहली बार CM बने तो 7 दिन ही कुर्सी पर टिक पाए

फरवरी 2000, बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। RJD ने लालू यादव को गरीबों का मसीहा बताया, तो NDA ने जंगलराज का नेता। लालू को टक्कर देने के लिए NDA के अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडीस, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान जैसे तमाम बड़े नेताओं ने बिहार में कैम्प किया।

26 फरवरी को जब नतीजे आए तो RJD 123 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी। NDA ने 122 सीटें जीतीं। किसी को भी बहुमत नहीं मिला, क्योंकि 324 सीटों वाले बिहार में सरकार बनाने के लिए 163 सीटें जरूरी थीं।

अगले ही दिन NDA ने नीतीश कुमार को CM कैंडिडेट घोषित कर दिया। दिल्ली के आदेश पर राज्यपाल विनोद चंद्र पांडेय ने 3 मार्च 2000 को नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। दरअसल, अटल सरकार ने ही विनोद चंद्र पांडेय को राज्यपाल बनाया था।

अब नीतीश को विधानसभा सभा में बहुमत साबित करना था। उन्हें लग रहा था कि 10-10 कांग्रेसी और निर्दलीय विधायक टूटकर उनके साथ आ जाएंगे। इसके लिए नीतीश और NDA के कई नेता जोर लगाने लगे।

दूसरी ओर लालू ने भी बहुमत जुटाने के लिए सियासी दांव चले। कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों को लामबंद किया। खुद दिल्ली जाकर कांग्रेस आलाकमान को साधा।

राजनीतिक उठापटक के बावजूद NDA बहुमत से 16 कम 147 विधायक ही जुटा पाया। सरकार गिरने से पहले ही 10 मार्च को नीतीश ने इस्तीफा दे दिया। उसी दिन विधानसभा में उनसे लालू मिले। लालू ने उन्हें गले लगाकर कहा, ‘हम आपको मुख्यमंत्री बनाएंगे। आप मेरे छोटे भाई हैं। बस लंघी मारकर बनना गलत था।’ ये सुनकर नीतीश हंस पड़े, लेकिन उसमें शर्मिंदगी छिपी थी।

अगले दिन 11 मार्च 2000 को लालू की पत्नी राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। वहीं नीतीश वापस दिल्ली आ गए और वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री बन गए।

3 साल बाद 30 अक्टूबर 2003 को जनता दल, लोक शक्ति और समता पार्टी ने मिलकर जनता दल (यूनाइटेड) बनाया। शरद यादव JDU के अध्यक्ष बने और NDA में शामिल हो गए।

फर्नांडिस नहीं चाहते थे कि नीतीश CM बनें, जेटली ने समझाया

साल 2005 और महीना अक्टूबर का। बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। NDA ने नीतीश को CM फेस बनाया, लेकिन एक पेंच फंस गया। नीतीश की अपनी पार्टी JDU उनकी उम्मीदवारी के खिलाफ हो गई। जॉर्ज फर्नांडिस ने कहा कि नीतीश के नाम का ऐलान BJP ने किया होगा, JDU ने नहीं।

BJP के कद्दावर नेता अरुण जेटली, फर्नांडिस से मिलने पहुंचे। दोनों के बीच जमकर बहस हुई। जेटली ने उन्हें समझाया कि इससे NDA को नुकसान होगा। आखिर में फर्नांडिस मान गए।

अगली सुबह उन्होंने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर नीतीश के नाम का ऐलान कर दिया। हालांकि, फर्नांडिस ने नीतीश का खर्च रोक दिया। फिर BJP ने उनकी मदद की।

22 नवंबर 2005 को नतीजे आए तो NDA को बहुमत मिला। JDU ने 88 और BJP ने 55 सीटें जीतीं। दो दिन बाद 24 नवंबर को गांधी मैदान में नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

पत्नी की मौत पर फूट-फूट कर रोए नीतीश

2007 में CM नीतीश की पत्नी मंजू को निमोनिया हो गया। नीतीश उन्हें दिल्ली के मैक्स अस्पताल इलाज के लिए ले गए। यहां पूरे समय नीतीश, मंजू के साथ ही रहते थे। उनके पास बैठकर अफसोस करते कि काम के चलते पत्नी के साथ समय नहीं बिता पाए। तब मंजू कहतीं कि मेरे रिटायरमेंट के बाद हम सभी फिर साथ रहेंगे।

मंजू 2012 में रिटायर होने वाली थीं, लेकिन इससे पहले ही 14 मई 2007 को उनका निधन हो गया। सीनियर जर्नलिस्ट अरुण पांडे के मुताबिक, ‘अपनी पत्नी की मौत पर नीतीश कुमार फूट-फूटकर रोए थे।’

संकर्षण ठाकुर लिखते हैं, ‘नीतीश को जिंदगी भर इस बात का दु:ख सताएगा कि उनकी पत्नी मंजू 1, अणे मार्ग पर मौजूद मुख्यमंत्री आवास पर रहने कभी नहीं आईं।’

बाद में नीतीश ने मंजू के नाम पर पटना के कंकड़बाग में मंजू कुमारी स्मृति पार्क और स्मारक बनवाया। अब हर साल नीतीश, उनकी पुण्यतिथि पर इस स्मारक पर जाते हैं और फूल चढ़ाते हैं।

4 बार पलटी मारी, 9 बार CM की शपथ ली; 2025 में फिर से NDA का चेहरा

9 जून 2013 को BJP ने नरेंद्र मोदी को पीएम कैंडिडेट बनाया। इससे नाराज नीतीश ने BJP से 17 साल पुराना गठबंधन तोड़ दिया। उन्होंने कहा कि वे मिट्टी में मिल जाएंगे, लेकिन BJP के साथ वापस नहीं जाएंगे।

2014 का लोकसभा चुनाव JDU ने अकेले लड़ा, लेकिन बिहार में सिर्फ 2 सीटें जीत पाई। नीतीश ने जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद छोड़ दिया। फिर 2015 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने RJD और कांग्रेस से गठजोड़ कर लिया। नीतीश फिर से CM बने।

लेकिन ये गठजोड़ ज्यादा दिन नहीं चल पाया। 2017 में तेजस्वी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो नीतीश ने उनसे इस्तीफा मांगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। नीतीश ने खुद ही इस्तीफा दे दिया। बाद में वे BJP के साथ हो लिए और मुख्यमंत्री बन गए।

2020 का चुनाव नीतीश ने BJP के साथ जीता। वे CM बने, लेकिन सालभर बाद राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर का विरोध करते हुए नीतीश फिर से BJP से अलग हो गए। इसके बाद उन्होंने RJD के साथ सरकार बनाई और फिर से CM बने।

2024 के आम चुनाव में विपक्षी पार्टियों ने INDIA अलायंस बनाया। नीतीश ने इसमें अहम भूमिका निभाई, लेकिन जनवरी 2024 में वे INDIA से अलग हो गए। वे फिर से BJP के साथ चले गए। खुद CM बने।

इस बार चुनाव में एक बार फिर नीतीश मुख्यमंत्री की रेस में हैं। NDA उन्हें ही अपना नेता बता रही है। अगर नीतीश जीत जाते हैं, तो रिकॉर्ड 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे।

वहीं उनके बेटे निशांत के पॉलिटिकल डेब्यू की खबरें आए दिन छपती हैं। हालांकि, नीतीश ने फिलहाल उनकी एंट्री पर रोक लगा दी है।

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