इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर मंगलवार को हाईकोर्ट में सुनवाई होगी। पिछली सुनवाई 20 जनवरी को हुई थी, जिसमें करीब डेढ़ घंटे तक लंबी बहस चली थी।
शासन ने घटना का कारण पुलिस चौकी के टॉयलेट को बताया था। इस पर कोर्ट ने सवाल उठाया कि क्या इससे पानी इतना दूषित हो सकता है? कहीं कोई केमिकल तो नहीं मिला। हालांकि, पूरी बहस के दौरान कोई ठोस कारण सामने नहीं आ सका था।
भागीरथपुरा में अब तक 28 मौतें हो चुकी हैं। आखिरी मौत कांग्रेस नेता राजाराम बोरासी की बताई गई थी। लेकिन, जैसे ही मौत की खबर सामने आई, स्वास्थ्य विभाग ने तत्काल उनकी मेडिकल रिपोर्ट जारी कर खंडन किया था।
जबकि परिजनों का दावा है कि मौत गंदे पानी की वजह से हुई है। परिजनों ने 24 जनवरी को अर्थी रखकर विरोध प्रदर्शन किया था। बोरासी की मौत पर जीतू पटवारी भी भागीरथपुरा पहुंचे थे।
दरअसल, स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन ने इससे पहले सुभद्राबाई, विद्या बाई, हेमंत गायकवाड़ और बद्री प्रसाद की मौतों को डायरिया से हुई मौत नहीं माना है।
पिछली सुनवाई में यह हुआ था
हाईकोर्ट में जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने पिछली सुनवाई में कहा था कि कई जगह सीवरेज और वाटर लाइन आपस में मिलती हैं, लेकिन क्या इससे पानी इतना अधिक दूषित हो सकता है कि लोगों की जान चली जाए। कहीं कोई केमिकल तो नहीं मिला, क्या कोई ठोस कारण सामने आया है।
इस पर शासकीय अधिवक्ता ने कहा था कि यह कुछ कारणों में से एक हो सकता है। बोरवेल का पानी भी दूषित पाया गया था, जो मैन लाइन में मिला। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने कहा था कि भागीरथपुरा कान्ह नदी के किनारे स्थित है। यहां से दूषित पानी बोरिंग में गया और फिर सीवरेज लाइन तथा नर्मदा लाइन में मिल गया, जिससे यह घटना हुई। कुल मिलाकर अब तक इस घटना का कोई ठोस कारण सामने नहीं आ सका है।
ठेकेदार ने काम ही नहीं किया
अधिवक्ता अजय बागड़िया ने पिछली सुनवाई में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की वर्ष 2017 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा था कि इसमें पहले ही स्पष्ट हो चुका था कि पूरे शहर में दूषित पानी की समस्या है, लेकिन अधिकारियों ने रिपोर्ट को दबाकर रखा और किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की। उन्होंने कहा कि हर रिपोर्ट में ई-कोलाई और फीकल कोलीफॉर्म बैक्टीरिया पाए गए, फिर भी कोई कदम नहीं उठाया गया।
उन्होंने यह भी बताया कि फरवरी 2023 में मालवा इंजीनियर को भागीरथपुरा का ठेका दिया था। ठेके की शर्तों के अनुसार एक साल में काम पूरा होना था और इससे दूषित पानी की समस्या खत्म होनी थी। लेकिन, ठेका मिलने के दो से ढाई साल बाद यह घटना सामने आ गई। ऐसे में सवाल है कि ठेकेदार ने क्या काम किया और निगम ने उस पर क्या कार्रवाई की। उनका कहना था कि पहले संबंधित इंजीनियर पर ही केस दर्ज होना चाहिए।