बिहार के औरंगाबाद जिले में ऐतिहासिक धरोहर की सुरक्षा पर एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। दाउदनगर थाना क्षेत्र के शमशेर नगर गांव में स्थित 324 साल पुराने मुगलकालीन मकबरे में अज्ञात लोगों ने तोड़फोड़ की है। मकबरे के भीतर बनी कब्रों को खोदने और क्षतिग्रस्त करने की घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया है।
मकबरा मुगलकाल के सूबेदार शमशेर खान से जुड़ा माना जाता है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में दर्ज राष्ट्रीय स्मारक है। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर ली है और प्रशासन ने पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैं। स्थानीय लोगों और इतिहास प्रेमियों में इस घटना को लेकर नाराजगी है और स्मारकों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
गार्ड की नजर पड़ी, तब खुला राज
शमशेर नगर गांव के बाहरी इलाके में स्थित यह मुगलकालीन मकबरा लंबे समय से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है। यहां दो सुरक्षा गार्ड तैनात रहते हैं। बुधवार को नियमित ड्यूटी के दौरान गार्डों की नजर मकबरे के भीतर गई, जहां उन्हें कुछ असामान्य दिखाई दिया।
अंदर जाकर देखने पर पता चला कि मकबरे में बनी कब्रों के आसपास की मिट्टी उखड़ी हुई है और कुछ जगहों पर खुदाई के निशान मौजूद हैं।
गार्डों ने तुरंत इसकी सूचना दाउदनगर थाने की पुलिस को दी। सूचना मिलते ही पुलिस टीम मौके पर पहुंची और पूरे परिसर को घेर लिया गया। शुरुआती जांच में यह स्पष्ट हुआ कि यह सामान्य टूट-फूट नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई छेड़छाड़ है।
किन कब्रों को पहुंचा नुकसान, क्या थी मंशा
पुलिस और ASI से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, मकबरे के भीतर कुल तीन प्रमुख कब्र हैं। इनमें एक कब्र मुगलकालीन सूबेदार शमशेर खान की मानी जाती है, दूसरी उनकी पत्नी और तीसरी एक अन्य अज्ञात व्यक्ति की। इन्हीं कब्रों के पास खुदाई और तोड़फोड़ के निशान मिले हैं।
जांच अधिकारियों का मानना है कि असामाजिक तत्वों ने किसी अफवाह या लालच में यह हरकत की है। स्थानीय स्तर पर ऐसी कहानियां प्रचलित रहती हैं कि पुराने मकबरों में सोना या कीमती वस्तुएं दबी होती हैं। पुलिस इस एंगल से भी जांच कर रही है कि कहीं खजाने की तलाश में तो यह नुकसान नहीं किया गया।
घटना के समय मकबरे में कोई श्रद्धालु या स्थानीय व्यक्ति मौजूद नहीं था। माना जा रहा है कि रात के अंधेरे में इस वारदात को अंजाम दिया गया है। आसपास के ग्रामीणों से पूछताछ की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि रात में किसी संदिग्ध गतिविधि को किसी ने देखा या नहीं।
स्मारक सील, इलाके में बढ़ी निगरानी
घटना सामने आने के बाद प्रशासन ने एहतियातन मकबरे के सभी प्रवेश द्वारों को अस्थायी रूप से सील कर दिया है। मकसद यह है कि जांच पूरी होने तक कोई और नुकसान न हो और साक्ष्य सुरक्षित रहें।
पुलिस ने आसपास के रास्तों और गांव में निगरानी बढ़ा दी है। संभावित संदिग्धों की पहचान के लिए स्थानीय लोगों से पूछताछ जारी है। साथ ही, यह भी जांच की जा रही है कि हाल के दिनों में मकबरे के आसपास कौन-कौन लोग आते-जाते रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि लंबे समय से इस ऐतिहासिक स्थल की सुरक्षा व्यवस्था ठीक नहीं है। शाम के वक्त असामाजिक तत्वों का यहां जमावड़ा आम बात थी, लेकिन पहले कभी इतनी बड़ी घटना नहीं हुई थी। अब इस तोड़फोड़ ने पूरे इलाके को चौंका दिया है।
प्रशासन ने दिए जांच के आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला प्रशासन ने तुरंत जांच के आदेश दिए हैं। दाउदनगर थाना में अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। पुलिस को निर्देश दिया गया है कि वे हर एंगल से मामले की जांच करें।
प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारियों से भी विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई है। ASI यह आकलन करेगा कि मकबरे को कितना नुकसान पहुंचा है और इसकी मरम्मत व संरक्षण के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए।
जिला प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय संरक्षित स्मारकों को नुकसान पहुंचाना गंभीर अपराध है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। पुलिस सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन और स्थानीय खुफिया सूचनाओं के आधार पर जांच कर रही है।
अधिकारियों का कहना है कि यदि सुरक्षा में कोई लापरवाही पाई जाती है तो संबंधित जिम्मेदारों पर भी कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन इस बात पर भी विचार कर रहा है कि भविष्य में ऐसे ऐतिहासिक स्थलों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त बल या तकनीकी निगरानी की व्यवस्था की जाए।
मुगलकालीन मकबरे का इतिहास और महत्व
शमशेर नगर में स्थित यह मकबरा करीब 324 साल पुराना माना जाता है। इसका निर्माण 1701 के आसपास हुआ था। इतिहासकारों के अनुसार, शमशेर खान मुगलकाल में बिहार क्षेत्र के प्रभावशाली सूबेदारों में से एक थे। प्रशासनिक और सैन्य जिम्मेदारियों के साथ-साथ उन्होंने स्थापत्य कला में भी रुचि दिखाई।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, 17वीं शताब्दी में शमशेर खान अजीमाबाद (पटना) और शाहबाद के सूबेदार थे। 29 मार्च, 1712 को लाहौर के पास मुगल राजकुमार रफी-उ-शान की रक्षा करते हुए उनकी मृत्यु हो गई। उसी साल उन्हें मकबरे में दफनाया गया। ब्रिटिश इतिहासकार विलियम इरविन ने अपनी किताब ‘द लेटर मुगल्स’ (पेज 184) में शमशेर खान का विस्तृत वर्णन किया है।
यह मकबरा उत्तर अफगान स्थापत्य शैली का उदाहरण माना जाता है। इसकी बनावट में मोटी दीवारें, गुंबदनुमा संरचना और साधारण लेकिन प्रभावशाली नक्काशी देखने को मिलती है। समय के साथ इसकी चमक जरूर फीकी पड़ी है, लेकिन ऐतिहासिक महत्व आज भी बरकरार है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस मकबरे को राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित कर रखा है। इसका उद्देश्य इस धरोहर को संरक्षित रखना और आने वाली पीढ़ियों तक इसके इतिहास को पहुंचाना है।
स्थानीय इतिहासकारों का मानना है कि यह मकबरा सिर्फ एक कब्र नहीं, बल्कि मुगलकालीन शासन व्यवस्था और उस दौर की सामाजिक-सांस्कृतिक झलक भी दिखाता है। यही वजह है कि इस तरह की तोड़फोड़ को सिर्फ संपत्ति का नुकसान नहीं, बल्कि इतिहास पर हमला है।