चुनाव आयोग बोला- सभी राज्यों की SIR प्रोसेस अलग:जिनके नाम कटे, उनकी शिकायतें नहीं मिलीं; सर्वे में केवल BLO शामिल, पुलिस नहीं

चुनाव आयोग ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन(SIR) प्रक्रिया में जिनके नाम कटे हैं, अभी तक किसी की तरफ से कोई शिकायत नहीं मिली है।

SIR की सुनवाई के दौरान आयोग ने कहा कि पश्चिम बंगाल जैसे किसी एक मामले के तथ्यों को उठाकर उन्हें किसी दूसरे राज्य की SIR प्रक्रिया पर लागू करना गलत होगा, क्योंकि हर जगह प्रक्रिया अलग रही है।

आयोग ने जबरदस्ती या अत्यधिक जांच के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि किसी भी स्तर पर पुलिस शामिल नहीं थी। केवल BLO ने ही घर घर जाकर प्रक्रिया पूरी की है।

राकेश द्विवेदी ने और क्या कहा…

  • SIR का आदेश एक सामान्य आदेश है, जो देशभर में लागू होता है, केवल असम इससे अलग है। SIR में सिद्धांतों और दस्तावेजों का पूरा ढांचा पहले से तय किया गया है।
  • मतदाता सूची की तैयारी और संशोधन से जुड़े कानूनी प्रावधान पहले से मौजूद हैं। संविधान के अनुच्छेद 324 से 326 और 1950 के कानून की धारा 19 मिलकर यह जिम्मेदारी तय करते हैं कि केवल भारतीय नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल किया जाए।
  • SIR इस धारणा पर आधारित नहीं है कि हर मतदाता से दस्तावेज मांगे जाएंगे। जिन मतदाताओं के नाम जून 2025 तक की पुरानी मतदाता सूचियों में दर्ज हैं, अगर वे अपने माता-पिता के नाम से पहले की सूची से लिंक स्थापित कर देते हैं तो उन्हें वैध माना जाएगा।
  • केवल उन्हीं मामलों में 11 तय दस्तावेज मांगे जाएंगे, जहां ऐसा कोई लिंक उपलब्ध नहीं है, इनमें आधार कार्ड भी शामिल है। जून 2025 तक सभी मतदाताओं को एन्यूमरेशन फॉर्म जारी किए गए, जिससे 2002 की मतदाता सूची को भी प्रामाणिकता मिली।
  • करीब 20 साल बाद SIR हुआ है, पहले की प्रक्रियाएं ज्यादातर खुद से की गई घोषणा पर आधारित थीं और उनमें विशेष जांच नहीं होती थी।

SIR पर पिछली मुख्य 5 सुनवाई

19 जनवरी: सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल के वोटर्स को नाम जुड़वाने का एक और मौका दिया

सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल के 1.25 करोड़ वोटर्स को अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वाने के लिए एक और मौका दिया। कहा कि वे 10 दिन में अपने डॉक्यूमेंट्स चुनाव आयोग को पेश करें। कोर्ट ने कहा चुनाव आयोग गड़बड़ी वाली वोटर लिस्ट ग्राम पंचायत भवन, ब्लॉक कार्यालय और वार्ड कार्यालय में सार्वजनिक तौर पर लगाए, ताकि लोगों को पता चल सके।

15 जनवरी: चुनाव आयोग ने कहा था- हम देश निकाला नहीं दे रहे

चुनाव आयोग ने SC में कहा था- SIR के तहत आयोग सिर्फ यह तय करता है कि कोई व्यक्ति वोटर लिस्ट में रहने के योग्य है या नहीं। इससे सिर्फ नागरिकता वेरिफाई की जाती है। SIR से किसी का डिपोर्टेशन (देश से बाहर निकालना) नहीं होता, क्योंकि देश से बाहर निकालने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।

6 जनवरी: चुनाव आयोग ने कहा- लिस्ट को सही रखना हमारा काम

चुनाव आयोग (EC) ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि उसे वोटर लिस्ट का स्पेशल इंटेसिव रिविजन (SIR) कराने का पूरा अधिकार है। आयोग ने यह भी बताया कि उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है कि कोई भी विदेशी नागरिक वोटर लिस्ट में शामिल न हो।

आयोग की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील ने कहा कि संविधान के अनुसार राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और जज जैसे सभी प्रमुख पदों पर नियुक्ति के लिए भारतीय नागरिक होना अनिवार्य शर्त है।

4 दिसंबर: सुप्रीम कोर्ट बोला- BLOs के काम के दबाव को कम करें

सुप्रीम कोर्ट ने 4 दिसंबर को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया कि वे SIR में लगे बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) के काम के दबाव को कम करने के लिए अतिरिक्त कर्मचारियों की नियुक्ति पर विचार करें।

सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्रि कझगम (TVK) की उस याचिका पर दिया, जिसमें मांग की गई थी कि समय पर काम ना कर पाने BLOs के खिलाफ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत कार्रवाई न की जाए।

26 नवंबर: चुनाव आयोग बोला- राजनीतिक पार्टियां डर का माहौल बना रहीं

सुप्रीम कोर्ट में 26 नवंबर को SIR के खिलाफ दायर तमिलनाडु, बंगाल और केरल की याचिका पर सुनवाई हुई थी। इस दौरान चुनाव आयोग ने कहा- SIR प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक दल जानबूझकर डर का माहौल बना रही हैं।

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