कानपुर में अधिवक्ता अखिलेश दुबे के करीबी और सस्पेंडेड इंस्पेक्टर आशीष द्विवेदी को बर्खास्त कर दिया गया है। इंस्पेक्टर को महिला और उसकी बेटी को अवैध तरीके से हिरासत में रखने और प्रताड़ित करने का दोषी पाया गया। प्रताड़ना से परेशान होकर महिला ने सुसाइड कर लिया था। शनिवार देर रात संयुक्त पुलिस आयुक्त ने आशीष द्विवेदी को बर्खास्त कर दिया।
संयुक्त पुलिस आयुक्त अपराध एवं मुख्यालय, विनोद कुमार सिंह ने बताया-
निलंबित इंस्पेक्टर आशीष को पुलिस सेवा से बर्खास्त कर दिया गया है। उस पर अपने कर्तव्यों और दायित्वों का निर्वहन न करने का आरोप था, जो विभागीय जांच में सही पाया गया। इस घटना में शामिल रहे एसआई पर कार्रवाई चल रही है।
NRI सिटी के रहने वाले कारोबारी के घर से 17 अप्रैल 2022 को जेवर चोरी हो गए थे। उस समय नवाबगंज के थाना प्रभारी आशीष द्विवेदी और चौकी इंचार्ज रानू रमेश चंद्र थे। इन लोगों ने कारोबारी के यहां काम करने वाली किशोरी और उसकी मां को पूछताछ के लिए उठाया था। मां-बेटी को पूछताछ के बाद रात करीब दो बजे वन स्टॉप सेंटर ले गए। वहां दूसरे दिन महिला ने बाथरूम में फंदा लगाकर जान दे दी। विभागीय जांच में आशीष और रानू रमेश चंद्र दोषी पाए गए। इस पर आशीष और रानू रमेश को बर्खास्तगी का नोटिस दिया गया था। आशीष की ओर से जवाब नहीं आने पर उसे बर्खास्त कर दिया गया।
अखिलेश दुबे के साथ क्या कनेक्शन?
दरअसल, भाजपा नेता रवि सतीजा ने अखिलेश दुबे और उसके साथियों के खिलाफ अगस्त 2025 में FIR दर्ज कराई थी। उन्होंने अखिलेश दुबे पर 50 लाख रुपए की रंगदारी मांगने का आरोप लगाया था।
भाजपा नेता ने जब तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अखिल कुमार के पास पहुंचे थे तो जन शिकायत प्रकोष्ठ में तैनात इंस्पेक्टर आशीष द्विवेदी उन्हें अखिलेश दुबे के कार्यालय ले गया। वहां अखिलेश दुबे ने कहा कि एसआईटी के पास मामला नहीं पहुंचना चाहिए। वरना जीवन भर जेल में ही रहोगे। रवि सतीजा डर गए।
हालांकि, बाद में भाजपा नेता पुलिस कमिश्नर से मिले, लेकिन उन्हें आश्वासन दिया गया कि ऐसे मामलों में जांच होने दीजिए। इसके बाद जब एसआईटी ने जांच की तो अखिलेश दुबे समेत अन्य आरोपी दोषी निकले। एसआईटी ने अखिलेश व उसके सहयोगी लवी मिश्रा को गिरफ्तार कर जेल भेजा। इसके बाद इंस्पेक्टर आशीष द्विवेदी को बयान दर्ज कराने के लिए बुलाया था, लेकिन वह तब से गैर हाजिर हो गया।
एक ऐसा वकील, जिसने कभी कोर्ट में नहीं की बहस
अखिलेश दुबे एक ऐसा वकील है, जिसने कभी कोर्ट में खड़े होकर किसी केस में बहस नहीं की। उसके दरबार में खुद की कोर्ट लगती थी और दुबे ही फैसला सुनाता था। वह सिर्फ अपने दफ्तर में बैठकर पुलिस अफसरों के लिए उनकी जांचों की लिखा-पढ़ी करता था। बड़े-बड़े केस की लिखा-पढ़ी दुबे के दफ्तर में होती थी।
इसी का फायदा उठाकर वह लोगों के नाम निकालने और जोड़ने का काम करता था। इसी डर की वजह से बीते 3 दशक से उसकी कानपुर में बादशाहत कायम थी। कोई उससे मोर्चा लेने की स्थिति में नहीं था।
काले कारनामों को छिपाने के लिए शुरू किया था न्यूज चैनल
अखिलेश दुबे ने अपनी ताकत बढ़ाने के लिए सबसे पहले एक न्यूज चैनल शुरू किया था। इसके बाद वकीलों का सिंडीकेट बनाया। फिर इसमें कई पुलिस अफसरों को शामिल किया। कानपुर में स्कूल, गेस्ट हाउस, शॉपिंग मॉल और जमीनों के कारोबार में बड़े-बड़े बिल्डर उसके साथ जुड़ते चले गए।
दुबे का सिंडीकेट इतना मजबूत था कि उसकी बिल्डिंग पर केडीए से लेकर कोई भी विभाग आपत्ति नहीं करता था। कमिश्नर का दफ्तर हो या डीएम ऑफिस, केडीए, नगर निगम और पुलिस महकमे से लेकर हर विभाग में उसका मजबूत सिंडीकेट फैला था। उसके एक आदेश पर बड़े से बड़ा काम हो जाता था।
मेरठ से भागकर आया था कानपुर
अखिलेश दुबे मूलरूप से कन्नौज के गुरसहायगंज का रहने वाला है। उसके पिता सेंट्रल एक्साइज में कॉन्स्टेबल थे। मेरठ में तैनात थे। वहां रहने के दौरान अखिलेश दुबे की सुनील भाटी गैंग से भिड़ंत हो गई। इसके बाद वह भागकर कानपुर आ गया।
बात 1985 की है। अखिलेश दुबे किदवई नगर में किराए का कमरा लेकर रहने लगा। दीप सिनेमा के बाहर साइकिल स्टैंड चलाता था। इस दौरान मादक पदार्थ तस्कर मिश्री जायसवाल की पुड़िया (मादक पदार्थ) बेचने लगा। धीरे-धीरे आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हो गया।