हिंदू धर्म में माता शीतला को रोगों से रक्षा करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है। विशेष रूप से चेचक और अन्य संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए माता शीतला की आराधना की जाती है। हर वर्ष चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को शीतला अष्टमी का व्रत और पूजा की जाती है।साल 2026 में शीतला अष्टमी 11 मार्च को मनाई जाएगी। इस दिन श्रद्धालु माता शीतला की पूजा करके परिवार की अच्छी सेहत और रोगों से सुरक्षा की कामना करते हैं। माता शीतला की प्रतिमा या चित्रों में उन्हें गधे पर सवार दिखाया जाता है। ऐसे में कई लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर माता शीतला का वाहन गधा ही क्यों माना गया है। आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
माता शीतला का वाहन गधा क्यों माना जाता है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गधा मेहनत, धैर्य और सहनशीलता का प्रतीक माना जाता है। यह पशु कठिन परिस्थितियों में भी लगातार काम करता रहता है और आसानी से हार नहीं मानता। माता शीतला रोगों से रक्षा करने वाली देवी मानी जाती हैं, इसलिए उनका वाहन गधा यह संदेश देता है कि बीमारी या कठिन समय में व्यक्ति को धैर्य और सहनशीलता बनाए रखनी चाहिए।
स्वच्छता और स्वास्थ्य का संदेश
माता शीतला का स्वरूप स्वास्थ्य, स्वच्छता और रोगों से बचाव का प्रतीक माना जाता है। उनके हाथों में झाड़ू, कलश और सूप जैसे प्रतीक दिखाई देते हैं। झाड़ू को साफ-सफाई का प्रतीक माना जाता है, जो यह संकेत देता है कि स्वच्छता बनाए रखने से कई बीमारियों से बचाव किया जा सकता है। माना जाता है कि गंदगी के कारण ही कई तरह के रोग फैलते हैं, इसलिए शीतला अष्टमी के दिन घर और आसपास की सफाई का विशेष ध्यान रखा जाता है।
माता शीतला से जुड़ी पौराणिक कथा
माता शीतला के गधे की सवारी से जुड़ी एक लोककथा भी प्रचलित है। मान्यता है कि एक बार माता शीतला एक गांव में पहुंचीं। वहां एक कुम्हार महिला ने बहुत श्रद्धा के साथ उनकी सेवा की। उस महिला के पास माता को बैठाने के लिए कोई साधन नहीं था, इसलिए उसने अपना गधा माता को अर्पित कर दिया। कहा जाता है कि उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता शीतला ने उसी गधे को अपना वाहन बना लिया।
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