सिक्किम का याकतेन बना डिजिटल नोमेड गांव:घुमंतु लोग फ्री में बिजनेस सिखा रहे, खुद संगीत-आर्ट सीखते हैं

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के गांव बीर का डियर पार्क इंस्टीट्यूट आज डिजिटल नोमेड्स का पसंदीदा ठिकाना है। डियर पार्क के प्रोजेक्ट मैनेजर प्रवीन शाक्य ने बताया, हर साल यहां 500 से ज्यादा नोमेड्स ठहरते हैं। यहां उनके लिए फ्री आर्ट, म्यूजिक, मेडिटेशन कोर्स होते हैं।

ये नोमेड्स दिन में ऑनलाइन काम करते हैं। खाली समय में नए आर्ट्स सीखते हैं। बदले में वे स्थानीय युवाओं को स्किल्स सिखाते हैं।

याकतेन में कुछ समय पहले तक मोबाइल नेटवर्क भी मुश्किल से मिलता था। जनवरी 2025 में अर्पित बंसल और प्रेम प्रकाश ने जिला प्रशासन के साथ मिलकर गांव को डिजिटल नोमेड बनाना शुरू किया। इंफ्रास्ट्रक्चर- इंटरनेट दुरुस्त किया। नतीजतन 2025 में ये देश का पहला डिजिटल नोमेड गांव बन गया। डिजिटल नोमेड की मदद से इलाके में अब तक 17 से ज्यादा नए बिजनेस शुरू हो चुके हैं।

आईटी में काम करने वाले हर्षित और अविनाश एक महीने याकतेन में रहे। वहां वे क्रोशे बनाने वाली प्रमिला से मिले। उन्होंने उसके उत्पादों की अच्छी तस्वीरें लीं और उसके लिए वेबसाइट बनाई। अब प्रमिला के उत्पाद पूरे देश में बिक रहे हैं।

शहरों की भागदौड़ और तनाव भरी जिंदगी से दूर अब लोग काम के साथ सुकून भी तलाशने लगे हैं। यही वजह है कि प्रोफेशनल्स हिमाचल-सिक्किम जैसे राज्यों में प्रकृति के बीच रहकर काम करना पसंद कर रहे हैं। ऐसे लोगों को डिजिटल नोमेड (खानाबदोश) कहा जाता है यानी वे लोग जो किसी दफ्तर या शहर से बंधे नहीं हैं। इंटरनेट के जरिए कहीं से भी काम करते हैं।

2025 की स्टेट ऑफ डिजिटल नोमेड रिपोर्ट के मुताबिक देश में 17 लाख से ज्यादा डिजिटल नोमेड्स हैं। ग्लोबल डिजिटल नोमेड इंडेक्स-2025 में भारत 38वें स्थान पर है। इससे सिर्फ नोमेड्स की जीवनशैली ही नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी भी बदल रही है।

हिमाचल के बीर, सिक्किम के याकतेन जैसे गांव, जो कभी बेरोजगारी-पलायन से जूझते थे, अब वहां दुनिया भर से लोग आकर स्थानीय परिवारों के साथ रहते हैं, उन्हें नई स्किल्स सिखाते हैं। इनकी मदद से याकतेन के युवाओं ने बिजनेस शुरू किए। नोमेड्स हर 15 दिन में उनसे मिलकर सलाह देते हैं। पहले जो लोग महीने में 7-8 हजार रु. कमा पाते थे, अब 40-45 हजार तक कमा रहे हैं।

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