चिराग ने दिए लंबी लड़ाई के संकेत, जानें क्‍या सियासी गुल खिलाएगी लोजपा में छिड़ी जंग

लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) में छिड़ी जंग में सांसद पशुपति कुमार पारस ने चार अन्य सांसदों को साथ जोड़कर जरूर चिराग पासवान को बड़ा झटका दे दिया है लेकिन पार्टी पर आधिकारिक पकड़ के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ सकती है। पार्टी अध्यक्ष चिराग पासवान ने खुद को ‘शेर का बच्चा’ बताकर साफ कर दिया कि वे हर स्तर पर लड़ाई को तैयार हैं।

चिट्ठियों के सहारे लड़ाई

चिराग ने मंगलवार को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर बताया कि लोजपा के संविधान के तहत संसदीय दल का नेता तय करने का अधिकार केवल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पास है। लिहाजा पारस को लोजपा संसदीय दल का नेता स्वीकार करने के फैसले पर वे पुनर्विचार करें। बताया जाता है कि चिराग ने चुनाव आयोग को भी पत्र लिखकर बताया है कि पार्टी संविधान के खिलाफ जाकर पार्टी तोड़ने की कोशिश हुई है।

कानून और सहानुभूति को बनाया हथियार

पिछले तीन-चार दिन से छिड़ी जंग के बीच बुधवार को चिराग मीडिया से रूबरू हुए। संविधान सम्मत रूप से लोजपा पर अधिकार को लेकर वे जहां दृढ़ दिखे, वहीं चाचा पारस पर व्यक्तिगत टिप्पणी को लेकर सतर्क। चिराग ने कानून और सहानुभूति को अपना हथियार बनाया है। चिराग ने कहा- मैं तब अनाथ नहीं हुआ था जब मेरे पिता दुनिया से विदा हुए, अब हुआ हूं जब चाचा ने छोड़ दिया।

काफी पहले शुरू हो गई थीं कोशिशें

सवालों के जवाब में चिराग ने परोक्ष रूप से जदयू पर आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी तोड़ने की कोशिशें बिहार चुनाव के वक्त ही शुरू हो गई थीं। जब मैं बीमार पड़ा तब इसका पूरा खाका तैयार हो गया।

किसकी होगी पार्टी

पिछले दो तीन दिनों में जिस तरह पारस खेमे और चिराग खेमे की ओर से एक दूसरे के खिलाफ व्यक्तिगत आचरण को लेकर आरोप उछाले जा रहे हैं, उससे यह तय है कि दोनों की राह अलग अलग हो गई है। पांच सांसद एक तरफ और चिराग दूसरी तरफ लेकिन पार्टी किसकी होगी यह तय होने में वक्त लगेगा।

लोकसभा अध्‍यक्ष को लिखा पत्र

लोकसभा अध्यक्ष के नाम पत्र में चिराग ने बतौर अध्यक्ष बताया है कि पार्टी संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत संसदीय बोर्ड ही संसदीय दल का नेता तय करता है। साथ ही यह भी सूचित किया कि पारस समेत अन्य चार सांसदों को पार्टी 13 जून को ही प्राथमिक सदस्यता से हटा चुकी है।

पार्टी से जु़ड़ा पद पार्टी ही तय करेगी

लोजपा के प्रधान महासचिव और रामविलास पासवान के विश्वस्त रहे अब्दुल खालिक ने बताया कि अगर पांच सांसद टूटते हैं तो वह पार्टी से अलग बैठ सकते हैं। लोकसभा अध्यक्ष चाहें तो उन्हें एक स्वतंत्र समूह का दर्जा दे सकते हैं। लेकिन पार्टी से जु़ड़ा पद तो पार्टी ही तय करेगी। पार्टी का फैसला संविधान के अनुसार ही हो सकता है।

चुनाव आयोग तक पहुंची जंग

उन्होंने एक अन्य सवाल के जवाब में कहा कि पार्टी संविधान के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष या प्रधान महासचिव को ही कार्यकारिणी की बैठक बुलाने का अधिकार है। जब कोई दूसरा बैठक नहीं बुला सकता तो फिर नया अध्यक्ष चुनने की बात कैसे कानूनी होगी। हमने चुनाव आयोग को सारी बातें बता दी हैं। कुछ नेता गलतफहमी में हैं तो रहें।

लंबी लड़ाई के संकेत

संदेश साफ है कि संसद की लड़ाई हार चुके चिराग, पार्टी की लड़ाई में पूरा दम लगाएंगे। हर कानूनी रास्ता अपनाया जाएगा और झटका देने वाले अपने चाचा और भाई समेत अन्य तीन सांसदों को ‘बंगला’ से बाहर ही रखने की कोशिश होगी। उल्लेखनीय है बंगला लोजपा का चुनाव चिह्न है।

दोनों तरफ से सहानुभूति का दांव

गौरतलब है कि दोनों तरफ से सहानुभूति का दांव भी चला जा रहा है। एक तरफ जहां पारस ने एक दिन पहले चिराग पर अपमान करने का आरोप लगाया, वहीं चिराग ने मार्च में लिखी गई चिट्ठी सार्वजनिक की जिसमें उन्होंने बताया था कि पारस न सिर्फ चिराग की प्रोन्नति से अवसादग्रस्त थे बल्कि रामचंद्र पासवान के पुत्र प्रिंस राज को बिहार का अध्यक्ष बनाए जाने से भी नाराज थे। बुधवार को चिराग ने कहा कि वह चाचा पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं लेकिन उन्होंने मुझे उकसाया। मैं और मेरी मां कल तक उनसे संपर्क करने की कोशिश करते रहे लेकिन वह नहीं मिले।