कठिनाइयों के बीच इन महिलाओं ने लोगों की जगाई उम्मीदें, रोजगार देकर दिखाई राह

जिंदगी की राहों में कभी मिलते हैं कुछ अनजाने से लोग, लेकिन जल्दी ही वे पहचाने से लगने लगते हैं। मुश्किल घड़ियों में इनका साथ देना ताउम्र याद रह जाता है। जब कहीं से कोई उम्मीद न हो तो सहायता के लिए आगे बढ़े हाथ किसी वरदान के समान प्रतीत होते हैं। बीते दिनों जब आशाएं टूट रही थीं तब कई महिलाओं ने आगे बढ़कर रास्ते निकाले और जरूरतमंदों के साथ खड़ी हुईं।

बुजुर्गों को घर पहुंचाई मदद : बेंगलुरु की माहिता नागराज को जब उनकी विदेश में रहने वाली एक दोस्त ने फोन किया कि उनके माता-पिता को जरूरी सामान और दवाइयों की जरूरत है तो वह सामान लेकर स्वयं गईं। जब उनके पास इस तरह की मदद की और गुहार आने लगीं तो माहिता ने खुद को इस काम के लिए सर्मिपत कर दिया और फेसबुक पर एक ग्रुप बना लिया। आज उनके साथ करीब 53,000 वॉलंटियर्स जुड़ चुके हैं, जो बुजुर्गों और जरूरतमंद लोगों की मदद कर रहे हैं।माहिता कहती हैं, मार्च में जब यूरोप में केस होने लगे थे तब हमारे स्कूल के वाट्सग्रुप के कुछ दोस्त बाहर थे। उसी दौरान डब्लूूएचओ ने बुजुर्ग लोगों के बाहर निकलने में काफी खतरा बताया। मेरे उन दोस्तों ने अपने माता-पिता को सामान पहुंचाने के लिए मुझसे कहा। मैंने ऐसा किया। फिर मैंने इसे फेसबुक पर डाला तो मेरे पास काफी रिक्वेस्ट्स आने लगीं और हम इन्हें पूरा करने लगे। माहिता कहती हैं कि अब हमेशा बुजुर्गों की मदद करती रहूंगी। हम घर में हैं तो भी ऑनलाइन कम्युनिटी के साथ मदद कर सकते हैं। जहां भी मदद की जरूरत होगी वहां हम रहेंगे। पहले माहिता सेल्फ एंप्लॉयड थीं और डिजिटल मार्केटिंग कर रही थीं। इस अनूठे अभियान के लिए माहिता को फोब्र्स इंडिया के कवर पेज पर भी स्थान मिला है

माहिता कहती हैं, मार्च में जब यूरोप में केस होने लगे थे तब हमारे स्कूल के वाट्सग्रुप के कुछ दोस्त बाहर थे। उसी दौरान डब्लूूएचओ ने बुजुर्ग लोगों के बाहर निकलने में काफी खतरा बताया। मेरे उन दोस्तों ने अपने माता-पिता को सामान पहुंचाने के लिए मुझसे कहा। मैंने ऐसा किया। फिर मैंने इसे फेसबुक पर डाला तो मेरे पास काफी रिक्वेस्ट्स आने लगीं और हम इन्हें पूरा करने लगे। माहिता कहती हैं कि अब हमेशा बुजुर्गों की मदद करती रहूंगी। हम घर में हैं तो भी ऑनलाइन कम्युनिटी के साथ मदद कर सकते हैं। जहां भी मदद की जरूरत होगी वहां हम रहेंगे। पहले माहिता सेल्फ एंप्लॉयड थीं और डिजिटल मार्केटिंग कर रही थीं। इस अनूठे अभियान के लिए माहिता को फोब्र्स इंडिया के कवर पेज पर भी स्थान मिला है।ई-रिक्शा से मदद : इंदौर में कुछ महिलाएं कोरोना वॉरियर्स को ई-रिक्शा से उनके घर से कार्यस्थल लाने और वापस घर छोड़ने की सुविधा प्रदान कर रही हैं। इस मुश्किल समय में सेवाएं प्रदान करने के लिए इन महिला चालकों को प्रशासन की ओर से सहायता दी जा रही है। हैदराबाद में एक सर्मिपत आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं शिवम्मा। महामारी से पहले वह गर्भवती महिलाओं को सलाह देती थीं, लेकिन कोरोना काल में जब लोगों ने संक्रमण के डर से उन्हें घर आने के लिए मना किया तो वह फोन से ही गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं का हाल लेती रहीं। शिवम्मा गर्भवती महिलाओं व स्तनपान कराने वाली महिलाओं की मदद करने और सलाह देने के लिए मजबूती के साथ डटी हैं।मास्क और बैग्स बने कमाई का जरिया : जूट के थैले बनाने वाली लखनऊ की एंटरप्रेन्योर अंजलि सिंह ने मास्क बनाने के काम में कई महिलाओं को जोड़ा और कहा कि इस मुश्किल समय में हमने एक-दूसरे को सपोर्ट किया है। अंजलि कहती हैं, शहर की करीब सौ महिलाएं इस समय हमसे जुड़ी हुई हैं। हमने इन्हें मास्क सिलने के काम पर लगाया और इसका काफी प्रोडक्शन चल रहा है। हमारी डिजाइनर, सैंपलर सेंटर से ही कटिंग कर उन्हें मास्क सिलने के लिए देती हैं और महिलाएं अपने घर से इन्हें सिलकर भेज रही हैं। हमने मशीनें उनको घर पर ही दे दी हैं। एक मास्क के उन्हें पांच रुपये तक मिल जाते हैं अगर एक दिन में 50 बना लिए तो उनकी 250 रुपये की कमाई हो जाती है। हमें कई संस्थानों से स्थानीय स्तर पर मास्क के ऑर्डर मिल रहे हैं। हम ई-रिक्शा से मदद : इंदौर में कुछ महिलाएं कोरोना वॉरियर्स को ई-रिक्शा से उनके घर से कार्यस्थल लाने और वापस घर छोड़ने की सुविधा प्रदान कर रही हैं। इस मुश्किल समय में सेवाएं प्रदान करने के लिए इन महिला चालकों को प्रशासन की ओर से सहायता दी जा रही है। हैदराबाद में एक सर्मिपत आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं शिवम्मा। महामारी से पहले वह गर्भवती महिलाओं को सलाह देती थीं, लेकिन कोरोना काल में जब लोगों ने संक्रमण के डर से उन्हें घर आने के लिए मना किया तो वह फोन से ही गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं का हाल लेती रहीं। शिवम्मा गर्भवती महिलाओं व स्तनपान कराने वाली महिलाओं की मदद करने और सलाह देने के लिए मजबूती के साथ डटी हैं।ऑर्डर ले रहे हैं और जरूरतमंद महिलाओं को काम दे रहे हैं। अब हमने जूट के थैले बनाने का काम भी शुरू कर दिया है।कश्मीर भेजा राशन : फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. रिदवाना सनम अपनी कंपनी की आय का 20 फीसद अपने फाउंडेशन के जरिए जरूरतमंदों की मदद में खर्च करती हैं। उनके साथ करीब 90 फीसद महिलाएं हैं। वह कहती हैं, मैंने जरूरतमंदों में खाना बांटने की पहल में भी अपना पूरा योगदान दिया है। मैं कश्मीर से हूं तो वहां गांदरबल में मैंने राशन वितरित करवाया।

केयरमोंगर्स का आइडिया सिर्फ मदद : केयरमोंगर्स इंडिया की संस्थापक माहिता नागराज ने बताया कि जब दूसरे शहरों से भी लोग मुझे मैसेज करने लगे कि हम अपने शहर में मदद कैसे कर सकते हैं तब मैंने फेसबुक पर केयरमोंगर्स इंडिया नाम का ग्रुप बनाया। मुझे लगा इस पर जरूरतमंद लोग और मदद के लिए तैयार वॉलेंटियर्स आ सकेंगे, लेकिन हुआ क्या कि वॉलंटियर्स ज्यादा आने लगे। फिर हमने सोचा जिन बुजुर्गों को मदद चाहिए होगी वे फेसबुक पर आने के बजाय फोन करने में ज्यादा सहूलियत महसूस करेंगे। इसलिए हमने ऑल इंडिया हेल्पलाइन नंबर शुरू किया। अब हमारे साथ करीब 53,000 सदस्य हैं और 3000 वॉलंटियर फेसबुक से बाहर के भी हैं। गोबर, मिट्टी व तुलसी के दीपक : वैष्णवी महिला शक्ति सेवा ट्रस्ट की राष्ट्रीय अध्यक्ष लीना भारद्वाज ने बताया कि दीपावली के पहले हमने गोबर, मिट्टी और तुलसी के बीज के साथ दीपक तैयार करवाए। प्रयोग के बाद इससे तुलसी के पौधे निकल आएंगे। हम महिलाओं से मास्क बनाने के अलावा फॉल, पीको आदि का काम भी करवा रहे हैं। इसके लिए हमने इन्हें मशीने दी हैं। हमारा मुख्य उद्देश्य है कि जो महिलाएं हमसे जुड़ी हैं उन्हें काम और पैसा मिलता रहे। मैं जरूरतमंद विधवाओं के लिए काम कर रही हूं और इनके बच्चों की पढ़ाई के लिए भी कोशिश कर रही हूं। हमारे साथ हर क्षेत्र के लोग जुड़े हैं।मदद से मिलती है खुशी : अभिनेत्री सहनूर ने बताया कि कोरोना महामारी के प्रकोप के बीच मैंने प्रवासी महिलाओं को करीब 30,000 सैनिटरी पैड बांटे। सैनिटरी पैड्स और फेस कवरिंग मास्क देने के लिए मैं इनके घरों में गई। इनकी हालत देखकर मेरा दिल बहुत दुखा। मैंने उन्हें सैनिटरी पैड देने की इसलिए सोची, क्योंकि प्रत्येक महिला को इसकी आवश्यकता होती है। सभी लोगों को जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।

मधुबनी पेंटिंग्स से मिली राह : सोशल एंटरप्रेन्योर श्रुति सिन्हा ने बताया कि मैं दिल्ली में शिक्षिका थी। लॉकडाउन के दौरान हमें नोटिस मिल गया था। इस पर मैंने कुछ अलग करने का मन बनाया और पटना आ गई। मुझे शुरू से ही मधुबनी पेंटिंग्स का शौक था। इसी शौक के साथ मैंने बहुत सारी महिलाओं को रोजगार देने का काम किया और उन्हें खुद से जोड़ा। कहीं जा नहीं सकते थे। इसलिए हमने नई तकनीक का सहारा लिया। हम उन्हें ऑनलाइन समझा देते थे। इन ग्रामीण महिलाओं के पति प्रवासी मजदूर थे। इन महिलाओं ने पैसे जोड़कर अपने पति की मदद की। जब थोड़ी छूट मिली तो मैंने होलसेल रेट पर कपड़े उठाए। मेरा उद्देश्य था कि कम लागत और कम लाभ पर लोगों को चीजें उपलब्ध करवाऊं। सबसे पहले मधुबनी पेंटिंग के मास्क बनवाए। अब चादर और साड़ी आदि बनवाने लगी हूं। मैंने कई ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया है। मेरे साथ काफी महिलाएं जुड़ी हैं जिनका घर इसी काम से चल रहा है। ही नहीं, बल्कि 14 देशों में मदद की है।छ नकदी भिजवाती हूं। इस वादे को मैंने कोरोना काल में भी पूरा किया है।