राजस्थान के रेगिस्तान की बंजर रेतीली भूमि पर पर उगने वाले एक पौधे से निकले रेशों से अब गर्म कपड़ों का निर्माण होगा।
आक के पौधे को आमतौर पर आक या कैलोट्रोपिस गिगेंटिया के नाम से भी जाना जाता है। इसी पौधे के डोडो (फल) से निकले रेशों से अब गर्म कपड़े बनाए जाएंगे।
इन कपड़ों की खासियत रहेगी कि यह लद्दाख जैसे बर्फीले इलाकों के माइनस टेम्प्रेचर में भी लोगों को गर्मी का अहसास देंगे। साथ ही रेगिस्तानी इलाकों में ग्रामीणों को आसानी से रोजगार भी मिल सकेगा।
बाड़मेर में डॉ. रूमा देवी फाउंडेशन ने आक के डोडों से निकले रेशों का कलेक्शन शुरू किया है। इसके बाद उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में लगे प्रोसेसिंग प्लांट में भेजा जा रहा है, जहां कॉटन और वूलन बेहद कम मात्रा में मिक्स कर गर्म कपड़े बनाए जा रहे हैं।
खास बात यह है कि आक के रेशों से बने कपड़े बहुत हल्के होते हैं, जिससे ऊंचाई पर बर्फीले इलाकों में तैनात सेना के जवान भी इन्हें आसानी से ले जा सकते हैं।
रिसर्च के बाद शुरू किया आक के रेशों का कलेक्शन डॉ. रूमा देवी ने बताया- राजस्थान में बड़ी संख्या में आक का पौधा होता है। आमतौर पर इसे उखाड़ कर फेंक दिया जाता है। केंद्र सरकार के उत्तर भारत वस्त्र अनुसंधान संघ की रिसर्च में सामने आया कि आक के पौधों पर लगे डोडों से निकले रेशों(रुई) से गर्म कपड़े बनाए जा सकते हैं।
हमनें भी इस पर स्टडी की, फिर इस दिशा में किसानों को जागरूक करने का फैसला लिया। अब ग्रामीणों से आक के डोडों की खरीद करते है। पहले किसी को विश्वास नहीं था कि इनसे पैसे भी कमाए जा सकते हैं। शुरुआत में पांच, फिर दस किलो आए। हमनें पेमेंट किया तो लोगों को विश्वास होने लगा। अब तो कई टन आक के रेशे हमारे पास आ चुके हैं।
खास बात यह है कि आक के पौधे से निकले रेशों से बने कपड़ों की क्वालिटी जम्मू-कश्मीर और लेह-लद्दाख के पश्मीना से भी बढ़िया होती है। इसका साल में एक बार सीजन होता है, जो करीब 3 महीने तक रहता है। गर्मी में अपने आप डोडे फट जाते हैं और उनसे रेशे बाहर आने लगते है, उन्हीं रेशों से निकले फाइबर से कपड़े बनाए जाते हैं।
गाजियाबाद, मुंबई के प्रोसेसिंग प्लांट में भेज रहे डॉ. रूमादेवी ने बताया- राजस्थान के बाड़मेर सहित कई इलाकों में ग्रामीण, खासतौर पर महिलाएं आक के फल तोड़कर इकट्ठा कर लेती हैं। इन्हें रूमा देवी फाउंडेशन के केंद्रों पर जमा किया जाता है। वहां से इन्हें प्लास्टिक के जालीदार कट्टों में भरकर गाजियाबाद(यूपी) और मुंबई(महाराष्ट्र) जैसे शहरों में प्रोसेसिंग के लिए भेजा जाता है। इससे ग्रामीणों को रोजगार भी मिल रहा है।
रेशे से बना रहे हल्के और गर्म कपड़े आक के डोडों में जो सफेद रेशा (फाइबर) निकलता है, वह बहुत हल्का और गर्म होता है। इस रेशे को मशीनों से अलग करके कपड़ा उद्योग में उपयोग किया जा रहा है। मामूली मात्रा में कॉटन और वूलन मिक्स किया जाता है, फिर इससे जैकेट, स्वेटर, शॉल और बैग जैसे प्रोडक्ट बनाए जा रहे हैं। खास बात यह है कि ये कपड़े बहुत हल्के होते हैं, जिससे ठंडे इलाकों, खासकर सेना के जवानों के लिए इन्हें पहनना और ले जाना आसान होता है।
20 रुपए प्रति किलो की दर से कर रहे खरीद फाउंडेशन की ओर से आक के डोडे ग्रामीणों से 20 रुपए प्रति किलो की दर से खरीदे जाते हैं। कोई किसान 1 क्विंटल डोडे बेचता है तो उसे लगभग 2000 रुपए का पेमेंट किया जाता है। कई लोग रोजाना डोडे इकट्ठा करके लाते हैं और अच्छी कमाई करते हैं। कुछ परिवारों ने तो इस काम से लाखों रुपए तक कमाए हैं। खास बात यह है कि इसमें खेती जैसी मेहनत या खर्च नहीं लगता।
माइनस 20 से 40 डिग्री तापमान में रहता है गर्म वस्त्र मंत्रालय भारत सरकार के उत्तर भारत वस्त्र अनुसंधान संघ के निदेशक डॉ. केके परमार ने बताया- आक के फल से निकले रेशों से बनाए कपड़े माइनस 20 से 40 डिग्री तापमान में भी शरीर को गर्म रखने में सक्षम हैं। इससे रेगिस्तानी इलाकों में लघु उद्योगों को नई पहचान मिली है। आक का पौधा पर्यावरण के अनुकूल भी है, जो सूखा सहन कर सकता है। इसके उगने से मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है। इसके डोडों से निकले रेशें से बने पौधे हल्के होते हैं, ऐसे में सेना के जवानों को राहत मिल सकती है।