मसालों पर नहीं लोग किन हालात में भोजन तैयार करते हैं, खाने का स्वाद भी उसी पर निर्भर

बीते समय में लोगों का आग्रह होता था कि रसोई में स्नानादि के बाद ही जाया जाए। इसका कारण यही था कि मन शांत और शरीर पवित्र हो, तो भोजन भी अमृत जैसा होता है। भोजन में अपनेपन की एक गंध होती है, जिसे अक्सर हम उस समय महसूस करते हैं, जब हम किसी बेहद अपने के घर भोजन करते हैं। भोजन के पहले लोगों के हाव-भाव से ही पता चल जाता है कि भोजन कैसा बना होगा। कई बार ऐसा भी होता है कि भोजन पूरी तन्मयता से बनाया जाए, पर भोजन ग्रहण करने वाले की स्थिति ऐसी नहीं होती कि वह भी उसी अपनेपन के साथ भोजन ग्रहण करे। इसलिए दोनों में तादात्म्य होना आवश्यक है। इसके बिना भोजन के स्वाद की कल्पना नहीं की जा सकती। इसलिए जब भी भोजन करें, तो पहले उसे प्रणाम अवश्य करें।

आपका भोजन जहां से आया है, उस भंडार को और जिसने भोजन बनाया है, उसका धन्यवाद करें। यह तादात्म्य की पहली सीढ़ी है। इसके बाद भोजन हृदय से ग्रहण करें, एक-एक निवाला आपको तृप्त करता जाएगा और आप संतुष्टि की परमसीमा तक पहुंच जाएंगे। कुछ ही देर में आपको भोजन से संतुष्टि प्राप्त हो जाएगी। उसके बाद यह अवसर फिर मिले, इसी कामना के साथ आप भोजन समाप्त करेंगे, तो निश्चित ही आप स्वयं को सौभाग्यशाली मानेंगे।