Kisan Andolan: भड़कने लगी है आंदोलनकारियों के विरोध में सुलगी चिंगारी, टिकैत और चढूनी निशाने पर

Kisan andolan  तीनों कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे आंदोलन के नेताओं ने 27 सितंबर को भारत बंद का आह्वान कर अपनी शक्ति प्रदर्शित करने का प्रयास किया, लेकिन वह पौने दो प्रदेशों तक ही सीमित रहा। रेखांकित कर लें बंद का प्रभाव सिर्फ पौने दो प्रदेशों में रहा यह कोई और नहीं हरियाणा किसान मोर्चे के नेता कह रहे हैं। उनकी बात सत्य भी है। आंदोलन का असर केवल पंजाब और हरियाणा की सड़कों और रेलवे ट्रैक पर ही रहा। बाजार खुले रहे। कल कारखाने चलते रहे। लेकिन 27 सितंबर के बाद स्थितियां तेजी से बदलीं।

एक टीवी चैनल ने भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष नरेश टिकैत का स्टिंग किया, जिसमें वह कह रहे हैं कि गुड़ बनाने के लिए सिंगापुर की प्रस्तावित कंपनी को सस्ती दरों पर किसानों से भूमि का अनुबंध करा देंगे। सरकार द्वारा घोषित गन्ने के समर्थन मूल्य से कम पर किसानों से गन्ना दिला देंगे। इस स्टिंग के वायरल होने के बार नरेश टिकैत और राकेश टिकैत सामने नहीं आ रहे हैं। उधर पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह द्वारा मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद जो घटनाक्रम हुआ, उससे भी आंदोलनकारी नेताओं को तगड़ा झटका लगा है।

बतौर मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर का पूरा सपोर्ट आंदोलन को था। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व से खफा कैप्टन अमरिंदर ने देश के गृह मंत्री अमित शाह से भेंट क्या की, आंदोलनकारी नेताओं के चेहरे लटक गए। कैप्टन के मुख्यमंत्री न रहने पर आंदोलन पंजाब में प्रभावी रह पाएगा या नहीं इसमें संदेह। वैसे भी पंजाब के आंदोलनकारी हरियाणा में ही धरना दे रहे थे।

हरियाणा के आंदोलनकारी उनका समर्थन कर रहे थे। लेकिन अब हरियाणा के आंदोलनकारियों का एक बड़ा वर्ग यह समझ गया है कि राकेश टिकैत, गुरनाम सिंह चढ़ूनी और योगेंद्र यादव हरियाणा के किसानों के ठेकेदार बन गए हैं और आंदोलन का नेतृत्व कर रहा संयुक्त किसान मोर्चे को हरियाणा के किसानों के हितों की कोई चिंता नहीं है। सो, अब वह संयुक्त किसान मोर्चे के नेताओं का खुलकर विरोध करने लगा है।

नरेश टिकैत के स्टिंग आपरेशन के बाद टिकैत बंधु कोई जवाब नहीं दे पा रहे हैं। इसके बाद से हरियाणा के लोग यह कहने लगे हैं कि पांच वर्ष पहले उत्तर प्रदेश से यशपाल मलिक ने यहां आकर आग लगवा दी थी। अब वही राकेश टिकैत कर रहे हैं। वैसे भी राकेश टिकैत को आंदोलनकारियों का एक बड़ा वर्ग नापसंद करता है, क्योंकि वह इंडियन नेशनल लोकदल प्रमुख ओमप्रकाश चौटाला के करीबी हैं। इसे हरियाणा के नेता प्रतिपक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के समर्थक टिकैत को गंभीरता से नहीं लेते। गुरनाम चढ़ूनी पंजाब में चुनाव लड़ने की बात कहकर संयुक्त किसान मोर्चे में ही अलग-थलग पड़ चुके हैं। यद्यिप वह मन ही मन प्रसन्न हो सकते हैं कि हरियाणा में उनकी चौधर को चुनौती देने आए राकेश टिकैत एक्सपोज हो चुके हैं। योगेंद्र यादव का न कोई आधार था न है।

करनाल में प्रदर्शन कर चढ़ूनी ने खुद को साबित करने का प्रयास किया था, लेकिन प्रदेश सरकार ने बड़ी खूबसूरती से मामला सुलझा लिया। राकेश टिकैत ने मुजफ्फर नगर में रैली कर यह दिखाने का प्रयास किया था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान उनके साथ हैं, लेकिन रैली में बामुश्किल तीस हजार लोग ही पहुंचे। हालांकि सही संख्या इससे पांच छह हजार कम ही होगी, क्योंकि वहां जिस मैदान में रैली थी उसकी अनुमानित क्षमता ही तीस हजार से कम है। इसके विपरीत सिंतबर के तीसरे सप्ताह में टिकैत विरोधी किसानों ने मुजफ्फरनगर में रैली की, जिसमें टिकैत की रैली से सवा गुना अधि लोग पहुंचे।

खास बात यह रही कि इस रैली में लोग मुजफ्फरनगर और अगल बगल के जिलों के थे। दूसरी तरफ टिकैत की रैली में अधिकतर लोग पंजाब हरियाणा के थे। जो स्थानीय थे वे एक वर्ग विशेष और राजनीतिक दल से संबंधित थे। टिकैत की फ्लाप रैली, स्टिंग आपरेशन और अमरिंदर के इस्तीफे के बाद पंजाब के आंदोलन के नेताओं में हताशा को देखते हुए संयुक्त किसान मोर्चे के विरोधी हरियाणा किसान मोर्च ने भी सही समय पर चोट की है। हालांकि यह चोटा नहीं उनकी पीड़ा है जो अब मुखर हुई है।

अब तक आंदोलन के विरोध में दिल्ली सीमा पर स्थित गांवों के किसान ही आवाज उठा रहे थे, लेकिन अब आंदोलन में शरीक रहे हरियाणा किसान मोर्च के नेताओं को भी यह लगने लगा है कि संयुक्त किसान मोर्चे के नेता हरियाणा के लोगों को ठग रहे हैं। उन्हें न तो हरियाणा के किसानों की चिंता नहीं है।