मध्य प्रदेश की राजनीति के लोकप्रिय चेहरे कमल नाथ और दिग्विजय सिंह केंद्र बने कांग्रेस की कमजोरी

कमल नाथ और दिग्विजय सिंह, कांग्रेस के साथ ही मध्य प्रदेश की समग्र राजनीति के दो सबसे बड़े एवं लोकप्रिय चेहरे। दोनों लगभग हमउम्र। दोनों मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके। कांग्रेस की राष्ट्रीय राजनीति में भी दोनों का खासा प्रभाव। दोनों गांधी-नेहरू परिवार के विश्वासपात्र। इतनी समानताओं के बावजूद दोनों नेता सोच एवं कार्यशैली के स्तर पर किस हद तक एक-दूसरे से भिन्न हैं, इसका एक ताजा उदाहरण देखिए।

पिछले दिनों पंजाब में रैली करने सड़क मार्ग से बठिंडा से फिरोजपुर जाते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रास्ते में किसान नेताओं द्वारा जाम लगाए जाने की सनसनीखेज घटना पर जब पूरा देश प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लापरवाही पर चिंतित था, उस वक्त दिग्विजय सिंह ने ट्वीट करके क्या कहा, गौर करिए। ‘मोदी जी की पंजाब की नौटंकी अब जनता समझने लगी है। भीड़ आई नहीं, कुछ बहाना चाहिए था। सो बहाना बना लिया। जुमला जड़ दिया। प्रधानमंत्री जी पर हमला। बाल-बाल बचे। सुरक्षित गाड़ी में बैठे हुए उन्हें जान का खतरा था। सुरक्षित लौट आए.. का ड्रामा किया।’

देश के प्रधानमंत्री की सुरक्षा से जुड़े विवाद पर ऐसी तल्ख टिप्पणी इतने वरिष्ठ किसी अन्य नेता ने शायद ही की होगी। यहां तक कि सोनिया गांधी ने भी गरिमापूर्ण एवं संतुलित टिप्पणी की। कहा, इसकी पारदर्शी जांच कराई जाए। इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। अब इस प्रकरण पर कमल नाथ की प्रतिक्रिया देखिए जिसमें पार्टी की लाइन के साथ ही एक वरिष्ठ नेता का गंभीर एवं जिम्मेदाराना रवैया भी झलकता है। ‘प्रधानमंत्री की सुरक्षा, मोदी जी हों या कोई और, बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। प्रधानमंत्री की ही सुरक्षा न हो पाए तो पूरे विश्व में देश की बदनामी होती है। इसके क्या कारण रहे, इसकी गहराई में जाना होगा। इस मामले की जांच हो रही है। उसमें सब बातें सामने आ जाएंगी।’

फर्क साफ है। लगभग हर महत्वपूर्ण मामले में मध्य प्रदेश कांग्रेस के इन दोनों बड़े नेताओं का सोच एवं कार्यशैली का फर्क प्रदेश कांग्रेस की सबसे बड़ी कठिनाई है। इसका प्रभाव हर महत्वपूर्ण मौके पर दिखता है। कुछ दिनों पहले खंडवा लोकसभा सीट का उपचुनाव इसका उदाहरण है। कमल नाथ और दिग्विजय सिंह के बाद अरुण यादव को मध्य प्रदेश कांग्रेस का बड़ा नेता माना जाता है। उनके पिता स्व. सुभाष यादव भी बड़े नेता थे और प्रदेश के उप मुख्यमंत्री रहे। अरुण यादव भी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं। वह 2009 में खंडवा लोकसभा सीट से सांसद भी चुने गए थे। स्पष्ट है कि खंडवा उपचुनाव के लिए कांग्रेस को अरुण यादव से बेहतर उम्मीदवार शायद ही मिलता। वह चुनाव लड़ने के इच्छुक भी थे, पर नहीं लड़ पाए। पार्टी के भीतर की चर्चा पर विश्वास करें तो अरुण यादव की उम्मीदवारी के सवाल पर कमल नाथ और दिग्विजय सिंह एकमत नहीं थे। इससे अरुण यादव इतने आहत हुए कि उन्होंने खुद चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी। इसके बाद कांग्रेस को चुनाव हारना ही था। वही हुआ। खंडवा प्रकरण एक उदाहरण भर है अन्यथा मध्य प्रदेश कांग्रेस अपने दो सर्वोच्च नेताओं की अधिकतर मुद्दों पर मतभिन्नता एवं अलग-अलग कार्यशैली का खामियाजा कदम-कदम पर भुगतती है।

ऐसा नहीं कि शीर्षस्थ कांग्रेस नेतृत्व मध्य प्रदेश में पार्टी की इस समस्या से परिचित नहीं है। नेतृत्व ने कई बार यह प्रयास किया कि दोनों में कोई एक नेता मध्य प्रदेश का मोह छोड़कर राष्ट्रीय राजनीति का दामन थाम ले, पर राज्य की राजनीति में गहरी जड़ें रखने वाले दोनों नेताओं को यह किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं। कांग्रेस की यह दुश्वारी स्वाभाविक रूप से मध्य प्रदेश भाजपा के लिए बहुत सुविधाजनक है। पार्टी 2018 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव के बाद करीब 15 महीने की अवधि छोड़कर पिछले 18 वर्षो से सत्तासीन है तो इसकी एक वजह कांग्रेस का आंतरिक बिखराव भी है। मध्य प्रदेश ऐसा राज्य है जहां कोई क्षेत्रीय पार्टी प्रभावशाली नहीं है। ऐसे में चुनावी मुकाबले सीधे भाजपा और कांग्रेस के बीच सीमित रहते हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इसका लाभ मिला, जब लगातार तीन बार भाजपा को सत्ता सौंपने के बाद मतदाताओं का झुकाव कांग्रेस की ओर हो गया। कांग्रेस ने करीब 15 महीने सरकार चलाई, पर पार्टी की ऐसी ही आंतरिक उठापटक के चलते एक गुट ने बगावत कर दी और भाजपा के साथ मिलकर कमल नाथ सरकार गिरा दी। चुनाव हारने के बावजूद भाजपा को फिर सत्ता मिल गई। शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री के रूप में अपनी चौथी पारी खेल रहे हैं। वर्ष 2023 में उनका मुकाबला कांग्रेस से ही होगा, यद्यपि मुकाबला कितना दमदार होगा, यह इस पर भी निर्भर करेगा कि तब तक कांग्रेस अपनी इन दो धाराओं को कैसे नियंत्रित कर पाती है।