न कोई कीमती सामान और न ही जरूरी चीज, पढ़ें- रूसी हमलों के बीच बस अपना वायलिन उठाए डेनमार्क पहुंची चार युवतियों की दर्दनाक कहानी

रूस और यूक्रेन की जंग को 17 दिन हो गए हैं। रूस की यूक्रेन पर हो रही गोलाबारी के बीच अब तक 19 लाख से अधिक लोग अपना देश छोड़कर प्रड़ोसी देशों में शरण ले चुके हैं। इन लोगों की संख्‍या लगातार बढ़ती ही जा रही है। वहीं दूसरी तरफ शरणार्थियों की बढ़ती संख्‍या और उनसे निपटने के संसाधन अब धीरे-धीरे कम होने लगे हैं। ऐसे में पौलेंड ने कहा है कि वो अब और अधिक शरणार्थियों को अपने यहां पर नहीं ले सकता है। लोग लगातार अपना जरूरी और कीमती सामान लेकर यूक्रेन से भाग रहे हैं। लेकिन कुछ ऐसे भी जुनूनी हैं जिनके लिए न तो उनके कपड़ों का बैग जरूरी है और न ही दूसरे कीमती सामान।

डेनामार्क पहुंची चार युवतियां

जी हां हम बात कर रहे हैं यूक्रेन छोड़ डेनमार्क पहुंची चार ऐसी वायलनिस्‍ट्स की जो केवल अपने साथ अपने वायलिन लेकर वहां पहुंची हैं। उनके लिए यही सबसे कीमत सामान भी है। इनमें से एक नादिया सफीना है जो अपनी चार सहेलियों के साथ डेनमार्क के म्‍यूजिक स्‍कूल में पहुंची है। संगीत को लेकर इन सभी में एक समान जुनून है। वो शांति की तलाश डेनमार्क को चुना और बिना दूसरे कीमती सामान को लिए बिना ही डेनमार्क आ गईं।

केवल वायलिन लेकर पकड़ी डेनमार्क की राह

इनके पास जरूरी गर्म कपड़े तक नहीं थे। केवल साथ था तो उनका वायलिन। उनकी आंखों में नए भविष्‍य की उम्‍मीद और गुजरे हुए कल का दर्द साफतौर पर दिखाई दे रहा है। नादिया ने एएफपी को बताया कि उन सभी को केवल संगीत का जुनून है। सभी में टेलेंट है और कुछ कर दिखाने का जज्‍बा है। नादिया ने बताया कि वो किसी तरह से बचते बचाते डेनमार्क पहुंच तो कई लेकिन उउन सभी का दिल दर्द से भरा हुआ है। उन्‍होंने अपने सामने बमबारी से घरों को तबाह होने का भयानक मंजर देखा है।

म्‍यूजिक स्‍कूल पहुंची चार युवतियां

नादिया और उसकी चार सहेलिया स्‍केंडिनवायन सेला स्‍कूल में हैं और यहां पर उनकी तरह संगीत के जुनूनी लोगों का स्‍वागत कर रही हैं। इस स्‍कूल के डायरेक्‍टर जैकब शा ने बताया कि वो नादिया समेत हर उस इंसान की मदद कर रहे हैं जिनमें संगीत को लेकर जुनून है और कुछ कर दिखाने की इच्‍छा शक्ति है। ये स्‍कूल उन्‍हें यहां पर आगे बढ़ने का पूरा मौका दे रहा है। उन्‍हें रहने की जगह और खान मुहैया करवा रहा है। उन्‍होंने बताया कि प्रोफेशंल्‍स नेटवर्क के जरिए उन्‍हें ऐसे लोगों के बारे में जानकारी हासिल हुई थी और उन्‍होंने उनका इंतजाम अपने यहां पर किया। यहां पर अब तक छह यूक्रेन से आए करीब छह म्‍यूजिशियंस हैं। नादिया के साथ आने वालों में मीशा, उसकी बहन सेनिया कुशरोवा शामिल हैं। इन सभी ने जब यूक्रेन का माहौल युद्ध के चलते गड़बड़ाने लगा था तभी डेनमार्क जाने का फैसला किया था।

गोलाबारी के बीच लिया देश छोड़ने का फैसला 

24 फरवरी को जब यूक्रेन के शहर रूस की गोलाबारी से दहल उठे तो वो सभी दहशत में आ गई थीं। हर तरफ अफरातफरी का माहौल था। हर कोई भाग रहा था। खारकीव से निकलने के बाद वो अपने डोनेट में अपनी मां के घर रुकी फिर लिविव के रास्‍ते पौलेंड और फिर डेनमार्क पहुंच गईं। उन्‍होंने काफी लंबा रास्‍ता पैदल ही तय किया तो कुछ रास्‍ता बस कार और ट्रेन से पूरा किया। उनके मुताबिक यहां तक पहुंचना आसान नही रहा।