International Romani Day: भारतीय जड़ों से जुडऩे की चाहत, नाजी और साम्यवादी शासनों में इन्हें मिली थी भयंकर प्रताड़ना

उत्पीडऩ और निर्वासन से दुनिया का कोई कोना अछूता नहीं है। पृथक जातीय पहचान, रंग और धार्मिक मान्यताओं में अंतर के नाते दुनिया भर में अनेक प्रकार की त्रासदियां होती रही हैं। परंतु एक विशेष समुदाय है जिसने इस लिहाज से सर्वाधिक पीड़ा सही है। यह समूज भले ही बिखरा है, मगर सबसे बड़ा समूह है जिनकी पहचान से जुड़े इतिहास पर अब भी काम बाकी है। वहीं इनके साथ भेदभाव अब तक जारी है। यह समुदाय स्वभाव से मस्त और कला शिल्प मर्मज्ञ है। इन घुमंतुओं के कई नाम हैं जिनमें अपमानजनक ‘जिप्सी’ भी है, जिसका अभिप्राय संदेहास्पद आवारा समूह है। किंतु इन्हें पसंद ‘रामा नो छावा’ है। रोमानी भाषा में इसका अर्थ है- राम के बच्चे।

यह नाम निरंतर इन्हें गर्व और अतीत के पहचान से जोड़े रखता है। इसी नाम की महिमा है कि दुनिया भर में बिखरे ये लोग प्रतिवर्ष आज के दिन यानी आठ अप्रैल को एकत्रित होते हैं। दुनिया भर में इन्हें अब रोमा समुदाय के नाम से जाना जाता है। रोमा आयोजनों में ये अपने रचनात्मक कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रदर्शन करते हैं। वहीं बदलते समय के साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने बढ़ाने की भी बात होती है। ऐसे हर आयोजन में सर्वाधिक चर्चा अतीत के पलायन निर्वासन की होती है। आखिर एक समुदाय के तौर पर इनके अस्तित्व में आने का कारण भी तो यही है। ये हर गम भूल सकते हैं, किंतु भारत से अपने बिछोह को नहीं। प्रथम वैश्विक रोमा सम्मेलन से यह मुद्दा चला आ रहा है।

यह सम्मेलन वर्ष 1971 में लंदन में आयोजित हुआ था। तब से रोमाओं के भारत से जुडऩे और आने का सिलसिला जारी है। वहीं समय के साथ भूले बिसरे इस समुदाय की पहचान पर शोध संकलन भी हो रहे हैं। बात इनके आबादी और बसावट की करें तो ये यूरेशियाई मुल्कों से लेकर दक्षिण अमेरिका तक करीब 30 देशों में बसे हैं। किंतु इनकी सर्वाधिक प्रभावी संख्या रोमानिया, बुल्गारिया, स्लोवाकिया, हंगरी, सर्बिया जैसे पूर्वी यूरोपियन देशों में है। इन्हें अपने अलग रंग रूप और सामुदायिक पहचान के नाते अक्सर तकलीफें झेलनी पड़ी हैं। नाजी, साम्राज्यवादी और साम्यवादी शासनों मे इन्हें भयंकर प्रताडऩा मिली। इनकी एक बड़ी आबादी विश्व युद्धों की भेंट भी चढ़ी। किंतु इन्होंने प्रताडऩा और पृथक पहचान के नाते कभी कोई मांग नहीं रखी। इसके बावजूद यूरोप में इन्हें संदेह की नजरों से देखा जाता रहा है। प्रसिद्ध गायक एल्विन प्रेस्ले भी एक रोमा थे, वहीं अभिनय जगत के कई प्रसिद्ध नाम रोमा समुदाय से हैं। हालीवुड की चर्चित मूवी टेन कमांडमेट्स के खलनायक यूएल ब्रायनर तो रोमा संघ के अध्यक्ष भी थे। इन सबके बावजूद रोमा समुदाय उत्पीडऩ को सहने और भटकने के लिए अभिशप्त है।