E-Census: ई-जनगणना से बचेंगे करोड़ों रुपये, मतदाता सूची में अपनेआप जुड़ जाएगा नाम; होंगे और भी फायदे

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने एलान किया है कि अगली जनगणना आनलाइन यानी ई-मोड(E-Census) के जरिये की जाएगी। यह किफायती होने के साथ-साथ सटीक भी होगी। इसके आधार पर अगले 25 वर्षों के लिए देश के विकास की योजनाएं बनाई जाएंगी। अब तक जिस तरह से जनगणना होती आई है, उस पूरे अभियान में हजारों करोड़ रुपये का खर्च आता है। इसकी प्रक्रिया काफी जटिल होने के साथ ही इसमें कई बार गलतफहमी में लोग सही जानकारी नहीं दर्ज कराते हैं। ई-जनगणना इन समस्याओं को दूर करेगी।

दरअसल, जनगणना के लिए एक नया साफ्टवेयर तैयार कर किया जा रहा है। इस पर आधारित वेबसाइट और मोबाइल एप्लिकेशन बनाए जाएंगे। देश के नागरिक अपनी सुविधा से कहीं से भी अपने और अपने परिवार से जुड़े आंकड़े स्वयं डाल सकेंगे। जैसे कि जन्म के बाद बच्चे का नाम स्वयं जोड़े जा सकेंगे। फिर जब वह 18 साल का हो जाएगा, तो उसका नाम मतदाता सूची में अपनेआप शामिल हो जाएगा। वहीं मृत्यु के बाद उसका नाम भी खुद हट जाएगा। चूंकि जन्म-मृत्यु रजिस्टर को भी इस साफ्टवेयर से जोड़ा जाएगा। इसके कारण देश में हर जन्म-मृत्यु के बाद जनगणना अपने आप अपडेट हो जाएगी। ई-जनगणना में विभिन्न एजेंसियां के शामिल होने से पते बदलने जैसी प्रक्रियाएं भी आसान होंगी। इस प्रकार से आधुनिक तकनीक की मदद से अधिक वैज्ञानिक जनगणना सुनिश्चित हो पाएगी।

जनगणना एक ऐसी प्रक्रिया है, जो न केवल किसी मुल्क की जनसंख्या की प्रकृति के बारे में जानकारी उपलब्ध करवाती है, बल्कि देश की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक विविधता को भी जानने का अवसर प्रदान करती है। जनगणना देश के विकास का पैमाना तय करती है। केंद्र और राज्य सरकारों को जब कोई योजना बनानी होती है या फिर कोई नीति-निर्धारण करना होता है, तब इस कार्य में उनकी सबसे ज्यादा मदद जनगणना के आंकड़े ही करते हैं।

जनगणना को आंकड़ों का एक व्यापक स्रोत माना जाता है। इसके अंतर्गत ही किसी मुल्क की जनसांख्यिकी लाभांश के बारे में जानकारी इकट्ठा की जाती है। इसके आधार पर यह पता चलता है कि आबादी का स्वरूप किस तरह आकार ले रहा है। मसलन बच्चों, युवाओं, महिलाओं, पुरुषों और बुजुर्गों की हर तरह की जानकारी सामने आती है। इससे देश की जरूरतों का पहले ही अंदाजा हो जाता है।

जनगणना के आंकड़ों का उपयोग सब्सिडी के निर्धारण में भी किया जाता है। देश के सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व उसकी जनसंख्या के अनुपात में देने का जिम्मा जनगणना के आंकड़ों के इर्द-गिर्द ही केंद्रित है। इसके आधार पर ही लोकसभा, विधानसभाओं एवं स्थानीय निकायों के निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन किया जाता है।