President Election 2022: देश को ऐसा राष्ट्रपति चाहिए, जो राज-काज और समाज से तारतम्यता में हो निपुण

सैद्धांतिक दृष्टि से भारत के राष्ट्रपति के पास तमाम अधिकार हैं, पर व्यावहारिक दृष्टि से उनकी सीमाएं हैं। वह राष्ट्र के प्रमुख जरूर हैं, पर कार्यपालिका के नहीं। उनके अधिकार अमेरिका अथवा फ्रांस के राष्ट्रपति की तरह नहीं, इंग्लैंड के राजा/रानी की तरह हैं। सारे निर्णय उनके नाम से होते हैं, किंतु निर्णय वे नहीं करते। निर्णय कार्यपालिका करती है। वे सत्ता के प्रमुख जरूर हैं, मगर सत्ता उनके हाथ में नहीं होती। वह तो कार्यपालिका और प्रधानमंत्री के हाथ में होती है।

सवाल है कि जब सत्ता के सूत्र राष्ट्रपति के हाथ में न होकर प्रधानमंत्री के हाथ में ही होते हैं, तो फिर राष्ट्रपति चुनाव के पहले देश में इतना सोच-विचार क्यों होता है? वस्तुत: राष्ट्रपति देश के गौरव के प्रतीक हैं। वह तीनों रक्षा सेवाओं के प्रमुख, राजदूतों और राज्यपालों के नियुक्तिकर्ता होते हैं। धन विधेयक को छोड़कर कोई भी अन्य विधेयक उनकी स्वीकृति के बिना कानून नहीं बनता। दूसरे देशों से भारत आए राजदूतों को उनके ही सामने अपने परिचय प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने होते हैं। इसलिए राष्ट्रपति के चुनाव के पूर्व इतना विमर्श होता है।

राष्ट्रपति ऐसा होना चाहिए, जिनका प्रधानमंत्री के साथ अच्छा तालमेल रहे। देश सौभाग्यशाली है कि डा. राजेंद्र प्रसाद, डा. राधाकृष्णन, डा. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे दिग्गज राष्ट्रपतियों और उनके साथ रहे प्रधानमंत्रियों में सोच और कार्य की ज्यादा भिन्नता नहीं रही। वे सब देश की उन्नति का लक्ष्य लेकर ही चले। किसी-किसी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के बीच तो दोस्तों जैसा रिश्ता रहा। एपीजे अब्दुल कलाम के राष्ट्रपति बनने के पूर्व की घटना है। वह प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से परमाणु परीक्षण की तारीख तय करने पहुंचे। तारीख तय हुई तो एपीजे बोले, ‘बस, किसी को पता नहीं चलना चाहिए। बात लीक हो गई तो सब गड़बड़ हो जाएगी।’ इस पर वाजपेयी जी ने हंसते हुए कहा, ‘लीक भला कैसे होगी। आप भी कुंआरे हैं और मैं भी कुंआरा हूं।’ यह दोस्ती कलाम के राष्ट्रपति काल में भी बनी रही।