5 साल का हिसाब-किताब: कौन विधायक ‘पास’, कौन ‘फेल’?:तेजप्रताप, अनंत सिंह पूछ न पाए एक भी सवाल, बिहार के 15 MLA रहे ‘मौन’, देखिए रिपोर्ट

लोकतंत्र के महापर्व के बीच 17वीं बिहार विधानसभा नवंबर 2020-25 का कार्यकाल अब पूरा हो चुका है। जनता ने मौजूदा बिहार विधानसभा चुनाव में भारी मतों से अपनी NDA को चुन लिया है। बहुमत मिलने के बाद अब NDA गठबंधन नई सरकार के गठन के लिए आगे की प्रक्रिया में जुट गई है।

इससे पहले कि 18वीं विधानसभा अपना कार्यकाल शुरू करे, हम एक बार पिछली विधानसभा के 243 विधायकों के ‘रिपोर्ट कार्ड’ पर एक नजर डालते हैं।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और बिहार इलेक्शन वॉच ने 17वीं विधानसभा के कामकाज का एक डिटेल्ड एनालिसिस जारी किया है। बिहार विधानसभा सचिवालय से मिले RTI और आधिकारिक डेटा के आधार पर तैयार किया है।

यह रिपोर्ट बताता है कि पांच साल में आपके 243 में से कुछ विधायकों ने सवालों की झड़ी लगा दी तो दूसरी ओर 15 माननीय ऐसे भी रहे, जिनके खाते में एक भी सवाल दर्ज नहीं हुआ। 17वीं विधानसभा में कानून बनाने की ‘रफ्तार’ इतनी तेज थी कि 99 के 99 बिल एक ही दिन में पास कर दिए गए। अधिकतर विधायक तो ‘मौन’ रहकर सिर्फ कार्यवाही का हिस्सा बने रहे।

इन एजेंसियों की एनालिसिस कई चौंकाने वाली आंकड़े भी पेश करती है। सबसे पहले जानते हैं 17वीं बिहार विधानसभा में आपके नेताओं का प्रदर्शन कैसा रहा…

विधानसभा की ‘हाजिरी’: साल में औसतन सिर्फ 29 दिन बैठक

किसी भी विधायक के प्रदर्शन को मापने से पहले यह जानना जरूरी है कि उन्हें काम करने का मौका कितना मिला। 17वीं बिहार विधानसभा ने नवंबर 2020 से जुलाई 2025 के बीच कुल 15 सत्र आयोजित किए। इन 15 सत्रों में सदन की कुल 146 बैठकें हुईं। इसका मतलब है कि इन पांच सालों में बिहार विधानसभा में प्रतिवर्ष औसतन सिर्फ 29 दिन की बैठक हुई।

यह आंकड़ा बेहद चिंताजनक है। बिहार जैसे राज्य में, जहां मुद्दों की भरमार है, क्या साल में औसतन 29 दिन की बैठक जनसमस्याओं पर चर्चा और कानून बनाने के लिए काफी है? यह एक बड़ा सवाल है, जो हमारी व्यवस्था की गंभीरता को दिखाता है। इन पांच वर्षों में सबसे लंबा सत्र दूसरा और पांचवां सत्र था। इनमें 22-22 बैठकें हुईं, जबकि कई सत्र सिर्फ 5 बैठकों में सिमट गए।

दल-बदल का खेल: 17 विधायकों ने बदली पार्टियां

17वीं विधानसभा का कार्यकाल राजनीतिक अस्थिरता का भी गवाह रहा। ADR की रिपोर्ट बताती है कि 2020 के चुनावों के बाद से 17 वर्तमान विधायकों ने अपनी पार्टियां बदलीं। इसमें RJD से BJP में जाना, JDU से RJD में आना, AIMIM के विधायकों का RJD में शामिल होना और INC विधायकों का BJP में जाना शामिल है।

यह दलबदल दिखाता है कि विधायकों की राजनीतिक निष्ठा कितनी अस्थिर रही। इसका सीधा असर सदन की स्थिरता और सरकार के कामकाज पर पड़ता है।

‘सवालों’ के सिकंदर: कौन टॉप पर और कौन रहे ‘खामोश’

एक विधायक के पास सरकार को जवाबदेह ठहराने का सबसे बड़ा हथियार होता है ‘सवाल पूछना’। विधानसभा सत्र के दौरान सदन में पूछे गए ‘तारांकित प्रश्न’, जिनका मंत्री मौखिक उत्तर देते हैं। दूसरा ‘अतारांकित प्रश्न’, जिनका लिखित उत्तर मिलता है। यही उनके काम का असली पैमाना है।

17वीं विधानसभा के आंकड़ों के मुताबिक, 251 विधायकों (उप-चुनावों सहित) ने मिलकर कुल 22,505 सवाल पूछे। सदन का औसत प्रति विधायक 179 प्रश्न रहा। लेकिन असली कहानी इस औसत में नहीं, बल्कि टॉपर्स और फेलियर्स की लिस्ट में है।

A) टॉप 15 ‘सक्रिय’ विधायक: जिन्होंने सबसे ज्यादा आवाज उठाई

इस कार्यकाल में ऐसे 15 विधायक रहे, जिन्होंने सदन में सबसे ज्यादा सवाल पूछकर अपनी सक्रियता का परिचय दिया। इस सूची में BJP, RJD, INC और वामपंथी दलों के विधायक शामिल हैं। यह दिखाता है कि विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के भी कुछ विधायक अपने क्षेत्र के मुद्दों को लेकर सजग रहे।

टॉपर्स का एनालिसिस:

  • बीजेपी के अरुण शंकर प्रसाद 275 सवाल पूछकर सूची में सबसे ऊपर हैं। खास बात यह रही कि इस कार्यकाल में ज्यादातर समय सत्ता पक्ष का हिस्सा रहने पर भी बीजेपी विधायक ने सवाल पूछा है।​
  • कांग्रेस के मनोज प्रसाद सिंह 231 सवाल और राजद के मुकेश कुमार यादव 230 सवाल के साथ सवाल पूछने वालों में टॉप पर रहे। यह बताता है कि विपक्षी भूमिका को दोनों ने गंभीरता से निभाया।​
  • वामपंथी दलों— सीपीआई(एम) और सीपीआई(एमएल) लिबरेशन, के विधायकों ने भी टॉप में जगह बनाई। इससे उनकी वैचारिक सक्रियता और सवालों के जरिए जवाबदेही पर जोर स्पष्ट होता है।

B) 15 ‘खामोश’ माननीय: जिनके खाते में ‘शून्य’ सवाल हैं

अब बात करते हैं रिपोर्ट कार्ड के दूसरे पहलू की। 17वीं विधानसभा में 15 विधायक ऐसे भी थे, जिन्होंने पांच साल के कार्यकाल में एक भी सवाल नहीं पूछा।

‘शून्य’ सवालों का सच: क्या यह ‘फेल’ हैं?

पहली नजर में यह सूची चौंकाती है। एक भी प्रश्न नहीं पूछने वालों में पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी, RJD सुप्रीमो के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव और BJP के कद्दावर नेता नितिन नवीन जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

वजह 1: मंत्री नहीं पूछते सवाल

ऐसे विधायक, जो मंत्री पद पर होते हैं। वह सरकार का हिस्सा होते हैं। इसलिए उनका काम सदन में सवालों का ‘जवाब’ देना होता है, ‘सवाल पूछना’ नहीं।

इस ‘शून्य’ सूची में शामिल ज्यादातर नाम (जैसे बिजेंद्र प्रसाद यादव, लेसी सिंह, मदन साहनी, मो. जमा खान, नितिन नवीन, शीला कुमारी, श्रवण कुमार, सुरेंद्र प्रसाद यादव, तेज प्रताप यादव, सुमित कुमार सिंह), इस 5 साल के कार्यकाल के दौरान कभी न कभी मंत्री रहे हैं।

जो विधायक पांच साल मंत्री रहे, उनका सवाल न पूछना संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लापरवाही नहीं है। लेकिन, विपक्ष में आने के बाद और मंत्री पद पर नहीं रहते हुए सदन में सरकार से प्रश्न न पूछना, उनकी सक्रियता पर सवाल खड़े करता है।

वजह 2: अयोग्यता या मृत्यु

  • अनंत कुमार सिंह (मोकामा): उन्हें जुलाई 2022 में एक आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद अयोग्य घोषित कर दिया गया था। इसलिए उनका खाता शून्य है।
  • सुभाष सिंह (गोपालगंज): वे मंत्री भी रहे और बाद में उनका निधन हो गया, जिसके बाद उपचुनाव हुआ।
  • अमान भूषण हजारी (कुशेश्वर स्थान): वे 2021 में हुए उपचुनाव में जीते थे।

बिहार में 5 साल में तीन बार सरकार बदली

बिहार में 2020 से 2025 तक नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री रहे हैं, लेकिन इस दौरान उनकी सरकार के गठबंधन सहयोगी बदलते रहे। इस अवधि में बिहार में तीन अलग-अलग गठबंधन सरकारें बनीं, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही रहे।

– 2020 का चुनाव जीतकर बनाई NDA सरकार

सबसे पहले नवंबर 2020 से अगस्त 2022 तक बिहार में NDA सरकार थी। चुनावों के बाद, जनता दल (यूनाइटेड) यानी JDU और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने सरकार बनाई। नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

– अगस्त 2022 में महागठबंधन के साथ जदयू की नई पारी

अगस्त 2022 में, नीतीश कुमार ने NDA से गठबंधन तोड़ दिया और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेतृत्व वाले ‘महागठबंधन’ के साथ मिलकर नई सरकार बनाई। इस सरकार में भी नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री बने रहे, जबकि तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बने।

– जनवरी 2024 में फिर BJP के साथ वर्तमान सरकार बनाई

जनवरी 2024 में नीतीश कुमार ने एक बार फिर पाला बदला। उन्होंने महागठबंधन सरकार से इस्तीफा दे दिया और वापस BJP के नेतृत्व वाले NDA के साथ आ गए। उन्होंने NDA के मुख्यमंत्री के रूप में फिर से शपथ ली और वर्तमान (अक्टूबर 2025) तक इसी पद पर हैं।

किस पार्टी के MLA ने उठाए सबसे ज्यादा मुद्दे?

विधायकों की व्यक्तिगत सक्रियता के अलावा, यह देखना भी जरूरी है कि एक पार्टी के तौर पर कौन सा दल कितना सक्रिय रहा। ADR की रिपोर्ट ने सभी दलों के विधायकों द्वारा पूछे गए सवालों का औसत निकाला है।

यह सूची साफ दिखाती है कि वामपंथी दल CPI-ML(158), CPI-M(125) और कांग्रेस (136) के विधायक सवाल पूछने के औसत में सबसे आगे रहे। मुख्य विपक्षी दल RJD (94) और मुख्य सत्ताधारी दल BJP (86) का औसत लगभग बराबर रहा।

JD(U) का औसत 60 और HAM का 59 सवालों के साथ काफी कम रहे। यह इस बात का संकेत है कि इन दलों के ज्यादातर विधायक या तो मंत्री पदों पर थे, जिससे वे सवाल नहीं पूछ सकते थे या फिर वे सदन में कम सक्रिय थे।

इन मुद्दों पर सबसे ज्यादा सवाल पूछे गए

पिछले पांच साले में कुल 22,505 सवाल पूछे गए। जिन मुद्दों पर प्रश्न पूछे गए थे, उससे पता चलता है कि बिहार के असली सरोकार क्या हैं।

ये आंकड़े आईने की तरह साफ हैं। बिहार के विधायकों के लिए आज भी सबसे बड़े मुद्दे सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य ही हैं। ग्रामीण कार्य और सड़क निर्माण को मिला दें तो यह सबसे बड़ा मुद्दा बनता है। इसके बाद शिक्षा और स्वास्थ्य का नंबर आता है। यह दिखाता है कि बिहार की राजनीति अभी भी बुनियादी ढांचे और मूलभूत सुविधाओं के इर्द-गिर्द ही घूम रही है।

100% बिल पास, तो क्या 0% बहस हुई?

विधायकों के काम का एक हिस्सा सवाल पूछना (निगरानी) और दूसरा हिस्सा ‘कानून बनाना’ (विधायी कार्य) है। 17वीं बिहार विधानसभा ने इस दूसरे काम में एक अनोखा रिकॉर्ड बनाया है। ADR की रिपोर्ट के मुताबिक, इन सभी 99 बिलों को उनके प्रस्तुत होने के दिन ही पास कर दिया गया।

लोकतंत्र में कानून बनाने की प्रक्रिया में लंबी बहस, संशोधन प्रस्ताव और गहन जांच (जैसे सेलेक्ट कमेटी को भेजना) शामिल होती है। लेकिन 17वीं बिहार विधानसभा के आंकड़े बताते हैं कि यहां 100 फीसदी बिल ‘सेम डे’ पास हो गए।

यह ‘रबर-स्टैंप’ विधानसभा की तस्वीर पेश करता है। इसका मतलब है कि विपक्ष की आपत्तियों या संशोधनों को कोई खास तवज्जो नहीं मिली और सरकार ने अपने बहुमत का इस्तेमाल कर बिलों को तेजी से पास करा लिया। चाहे वह ‘बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस विधेयक, 2021’ जैसा विवादास्पद बिल हो या ‘बिहार आरक्षण (संशोधन) विधेयक, 2023’ जैसा महत्वपूर्ण बिल या विश्वविद्यालयों से जुड़े संशोधन बिल हों।

आम जनता से जुड़े सभी बिलों को एक ही दिन में पेश और पास कर दिया गया। यह ‘कुशलता’ लोकतांत्रिक बहस और जांच-परख की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

जनता का ‘रिपोर्ट कार्ड’ क्या कहता है?

17वीं बिहार विधानसभा (2020-2025) का कार्यकाल विरोधाभासों से भरा रहा।

  • एक तरफ हमारे पास अरुण शंकर प्रसाद (275 सवाल) और मनोहर प्रसाद सिंह (231 सवाल) जैसे ‘टॉपर्स’ विधायक हैं, जिन्होंने अपनी भूमिका को गंभीरता से लिया। दूसरी तरफ हमारे पास मंत्रियों की एक लंबी सूची है, जो प्रक्रिया के तहत ‘खामोश’ रहे। पूर्व सीएम जीतन राम मांझी जैसे अनुभवी नेता हैं, जो विधायक होते हुए भी ‘मौन’ रहे।
  • 22,505 सवालों का भारी-भरकम आंकड़ा यह दिखाता है कि सदन में मुद्दे तो खूब उठे, लेकिन वे मुद्दे आज भी सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी सरोकारों पर ही अटके हुए हैं। बुनियादी सरोकारों पर ही अटके हुए हैं।
  • सबसे चिंताजनक तस्वीर कानून निर्माण में दिखी, जहां 100% बिल पेश होने के बाद बिना किसी बहस के उसी दिन पास हो गए। यह दिखाता है कि सदन ‘बहस’ के बजाय ‘गिनती’ (बहुमत) के आधार पर चला।

यह रिपोर्ट कार्ड अब जनता के हाथ में है। यह डेटा का एक आइना है जो दिखाता है कि आपका विधायक आपके लिए कितना लड़ा। अब जब ये नेता दोबारा आपके दरवाजे पर वोट मांगने आएं तो यह ‘रिपोर्ट कार्ड’ आपके हाथ में होना चाहिए। अंतिम फैसला आपको करना है कि इन माननीयों को ‘प्रमोट’ करना है या ‘फेल’।

E-Paper 2025