क्यों इजराइल-हमास जंग को बताया जा रहा दूसरा नकबा:पहले नकबे में 7 लाख फिलिस्तीनियों से छिना देश; 5 नक्शों में फिलिस्तीन मिटने की कहानी

15 मई का दिन दुनियाभर में मौजूद फिलिस्तीनियों के लिए साल का सबसे दुख भरा दिन होता है। वो इस दिन को ‘नकबा’ कहते हैं। नकबा अरबी भाषा का शब्द है, जिसका मतलब ‘विनाश’ है।

फिलिस्तीनी लोगों का मानना है कि ये वो दिन था, जब उनसे उनका देश और जमीन छीन कर उन्हें बेघर कर दिया गया था। अब गाजा पर इजराइली सेना की कार्रवाई को फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास ने दूसरा नकबा बताया है।

साल 1917 की बात है। ब्रिटेन ने ‘बाल्फोर डिक्लेरेशन’ नाम के एक समझौते के जरिए फिलिस्तीन को बांटकर यहूदियों के लिए एक देश बनाने का वादा किया। ब्रिटेन के इस वादे का फिलिस्तीन के लोगों ने जमकर विरोध किया।

ये वो समय था जब यहूदी अपने लिए एक अलग देश की मांग कर रहे थे। इस डिक्लेरेशन के बाद ही अलग-अलग देशों से यहूदी फिलिस्तीन आकर यरुशलम और इसके आसपास के इलाको में बसने लगे।

दरअसल, यहूदी धर्म के लोगों का मानना है कि यहूदियों का पवित्र मंदिर ‘द होली ऑफ द होलीज’ इसी जगह पर हुआ करता था। आज भी वहां मौजूद ‘वॉल ऑफ द माउंट’ उसी मंदिर का हिस्सा है। इसलिए यहूदी इस जगह को अपनी मातृभूमि मानते हैं। यरुशलम और इसके आसपास के शहरों को ऑटोमन, रोमन साम्राज्य और उसके बाद कई बार हमले कर उजाड़ा गया है।

जब दुनियाभर के यहूदी यहां आकर बसने लगे तो 1939 में उनके खिलाफ फिलिस्तीन में आंदोलन शुरू हुआ। ब्रिटिश सरकार ने फिलिस्तीनी लोगों के इस आंदोलन को पूरी ताकत से कुचल दिया। अब फिलिस्तीन के लोगों की लड़ाई अंग्रेजों और यहूदियों दोनों से थी। वहीं हिटलर और उसकी नाजी सेना यूरोप में यहूदियों का जनसंहार कर रही थी। इसके चलते यूरोप के अलग-अलग देशों में बसे यहूदियों के लिए एक देश की जरूरत और बढ़ गई। न्यूयॉर्कर की रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे हालातों में यूरोप ने यहूदियों को बसाने की जिम्मेदारी फिलिस्तीन पर डाल दी। 1945 आते-आते यहूदियों और फिलिस्तीनियों में टकराव काफी ज्यादा बढ़ गए।

यरुशलम और इसके आस-पास के इलाके में रोज फिलिस्तीनी और यहूदियों के बीच लड़ाई होने लगी। फिलिस्तीन में हो रही हिंसा को देखते हुए ब्रिटेन ने ये मामला संयुक्त राष्ट्र संघ यानी UN के पास भेज दिया। इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने इस लड़ाई को रोकने के लिए फिलिस्तीन को दो देशों में बांटने का फैसला किया।

29 नवंबर, 1947 को संयुक्त राष्ट्र ने प्रस्ताव 181 के जरिए यह फैसला लिया था। इस प्रस्ताव के तहत, यरुशलम को संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण के अधीन रखने का फैसला किया गया। 1947 में UN ने फिलिस्तीन और इजराइल को लेकर एक मैप जारी किया, जिसे आप नीचे देख सकते हैं…