घरवाले चाहते थे रेलवे में नौकरी करूं:राज शांडिल्य बोले- रिश्तेदार को छोड़ने मुंबई आया तो यहीं रह गया, ड्रीमगर्ल के बाद भी स्ट्रगल जारी है

मिडिल क्लास फैमिली के लड़कों से परिवार वालों की अक्सर एक ही उम्मीद होती है। बेटा या तो फैमिली बिजनेस कर ले या फिर कोई 9 से 5 वाली नौकरी।

ऐसे ही एक मिडिल क्लास परिवार में जन्मे राज शांडिल्य के परिवार को भी उनसे ऐसी ही उम्मीदें थीं, पर राज जानते थे कि वाे क्या कर सकते हैं और क्या नहीं… यही वजह रही कि उन्होंने 9 से 5 की नौकरी करके सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी करने के बजाय अपनी इच्छाएं पूरी करने के लिए स्ट्रगल किया।

उनका यह स्ट्रगल वेस्ट भी नहीं गया क्योंकि बतौर राइटर-डायरेक्टर उनकी पहली ही फिल्म ‘ड्रीमगर्ल’ ने उन्हें बॉलीवुड में इस्टैबलिश्ड राइटर-डायरेक्टर बना दिया।

राज बीते दिनों एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए भोपाल आए हुए थे। इसी दौरान मेरी उनसे मुलाकात हुई। मिलते ही मैंने उन्हें बताया कि मेरा बचपन भी उसी शहर में बीता है जहां उन्होंने 12वीं तक पढ़ाई की। यह सुनकर वो एक्साइटेड भी हुए। दरअसल हम दोनों ही उत्तर प्रदेश के झांसी के रहने वाले हैं।

झांसी से जुड़ी कुछ यादें शेयर करने के बाद उन्होंने मुझसे अपनी कहानी शेयर करनी शुरू की।

फैमिली चाहती थी रेलवे की नौकरी करूं
मैं झांसी में ही पैदा हुआ और मैंने 12वीं तक की पढ़ाई भी झांसी से ही की। 12वीं के बाद लड़कों से अक्सर नौकरी की उम्मीदें की जाती हैं। दूसरी मिडिल क्लास फैमिली के पेरेंट्स की तरह मेरे पेरेंट्स भी चाहते थे कि मैं कुछ करूं। ऐसे घरों में तय रहता है कि लड़का होगा तो इंजीनियर बनेगा, लड़की होगी तो डॉक्टर बनेगी। बाकी प्रोफेशनल कोर्सेस का कोई स्कोप था नहीं झांसी में उस वक्त.. तो 12वीं के बाद बड़ी समस्या थी कि मैं क्या करूं।

मेरी पूरी फैमिली रेलवे में थी तो सब चाहते थे कि मैं रेलवे जॉइन कर लूंं। टीटी, गार्ड या ड्राइवर बन जाऊं, लेकिन मेरा मन वो करने का नहीं था।

मुझे हमेशा लगता था कि मेरे पापा ने मुझे अच्छे से पढ़ाया है तो एक नौकरी से आप सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी कर सकते हैं, अपनी इच्छाएं पूरी नहीं कर सकते। हालांकि ऐसा भी नहीं था कि मेरे घर वालों ने मेरी इच्छाएं पूरी नहीं कीं… सबकुछ किया…पर मेरे मन में ये सोच थी कि इस परिवार और खानदान को मैं एक स्टेप आगे लेकर कैसे जाऊं…

मैं 9 से 5 वाली नौकरी नहीं कर सकता था
..तो 12वीं के बाद सबसे बड़ा सवाल था कि करूं क्या? जब रेलवे के फॉर्म्स निकलते थे तो यहां एग्जाम की डेट आती थी.. बहुत सारी कुछ चीजें होती थीं.. फिर मैंने साेचा कि कुछ ऐसा किया जाए जहां मुझे ये 9 से 5 वाली नौकरी ना करनी पड़े। मैं पैसे के साथ-साथ नाम भी कमाना चाहता था। और मैं अपने परिवार को वो सब दे सकूं जो शायद मिलती उन्हें.. पर थोड़ी देर से मिलती.. तो मेरे इस फील्ड में जाने से वो थोड़ा टाइम से मिल गई। खैर, 12वीं के बाद मैं इंजीनियरिंग करने के लिए भोपाल आ गया।

स्टैंडअप कॉमेडी देखकर लगा कि मैं ये लिख सकता हूं
इसके बाद जब मैं भोपाल आया तो वहां एक दिन एक लाइव शो देखा। उस शाे में मेरी मुलाकात कई बड़े स्टैंड अप कॉमेडियंस से हुई। उस वक्त रियलिटी शो ‘लाफ्टर चैलेंज’ भी शुरू ही हुआ था, उसे देखा तो मुझे लगा कि इस किस्म की कॉमेडी राइटिंग मैं कर सकता हूं।

हालांकि लिखता में शुरू से ही था। कुछ ना कुछ किस्से, कहानियां और भजन-कीर्तन लिखता रहता था। कभी सोचा नहीं था कि इस तरह से प्रोफेशनली लिखूंगा, खासकर कॉमेडी में।

किसी को छोड़ने मुंबई गया था, वहीं का होकर रह गया
फिर मैं सितंबर 2007 में मेरे एक परिचित को छोड़ने के लिए मुंबई गया। ऐसा होता है ना कि मुंबई एक ऐसा शहर है जो एक बार आपको अपना लेता है तो कहीं जाने नहीं देता। कुछ दिन वहां रहा तो काम मिलना शुरू हुआ। शुरुआत में कुछ शोज लिखे, लेकिन वो बड़े बिट्स एंड पीसेस में लिखे थे।

इसी बीच भोपाल-मुंबई अपडाउन करता रहता था। कुछ वक्त के बाद मुझे ‘कॉमेडी सर्कस’ मिला जो मेरा पहला ऑफिशियल शो बना। इसके लिए मैंने कॉमेडी स्क्रिप्ट्स लिखीं। फिर वहां से मेरा लिखने का दौर शुरू हुआ, पर लॉन्ग टर्म जो एक शो को कहते हैं, जो एक राइटर का बेस होता है, वो मेरी लाइफ में ‘कॉमेडी सर्कस’ था। 2007 से लेकर मैंने 2014 तक 7 साल वो शो लिखा।

फाइनेंशियल और मेंटल स्ट्रगल बहुत रहा
इस बीच भोपाल से आने-जाने का काफी स्ट्रगल था। फाइनेंशियली भी और मेंटली भी। कई ऐसी चीजें होती हैं जो आपको लाइफ में आगे बढ़ाती हैं और यह मेरी लाइफ का गोल्डन टाइम था। उस डेढ़-दो साल में मैंने इतना कुछ सीखा, जो शायद में कभी किसी कोर्स में या किसी गुरु से नहीं सीख सकता था, क्योंकि कहते हैं कि समय सबसे बड़ा गुरु होता है तो उस समय ने मुझे काफी कुछ सिखाया। कहते हैं कि कॉमेडी इमोशंस से निकलती है और मेरे कॉमेडी लिखने में इन इमोशंस का बहुत योगदान रहा।

‘वेलकम बैक’ के बाद रेगुलर फिल्मों में काम मिला
इसके कुछ साल बाद मैंने ‘कॉमेडी नाइट्स विद कपिल’ में कपिल (शर्मा) भाई के लिए लिखना शुरू किया। इसके बाद अनीस बज्मी साहब ने फिल्म ‘वेलकम बैक’ के लिए कॉल किया। उस फिल्म में मेरे डायलॉग्स पसंद किए गए और फिर मुझे फिल्मों में रेगुलर काम मिलने लगा। इसके बाद मैंने नवाजुद्दीन सिद्दीकी स्टारर ‘फ्रीकी अली’, संजय दत्त की ‘भूमि’, सनी देओल स्टारर ‘भैयाजी सुपरहिट’ और सिद्धार्थ-परिणीति की ‘जबरिया जोड़ी’ जैसी फिल्मों के लिए डायलॉग्स लिखे।