बिना कैश करोड़ों का व्यापार, आखिर पर्ची सिस्टम क्या है:आगरा में IT रेड में 30 करोड़ की पर्चियां मिलीं, 3500 करोड़ में 80% लेनदेन पर्चे पर

आगरा में 3 जूता कारोबारियों के यहां इनकम टैक्स की रेड 81 घंटे तक चली। रेड में 57 करोड़ रुपए नकद और एक करोड़ रुपए की ज्वैलरी बरामद हुई। जबकि करीब 30 करोड़ रुपए की पर्चियां भी मिली हैं। इन पर्चियों में छिपा है आगरा के जूता कारोबार का सिस्टम। यहां का जूता कारोबार नकद से अधिक पर्ची सिस्टम पर निर्भर है।

कारोबारियों का दावा है कि देश के जूता उद्योग में आगरा की लगभग 65% की भागीदारी है। सिर्फ यहां के जूता उद्योग का सालाना टर्नओवर 3000-3500 करोड़ रुपए का है। इस सालाना टर्नओवर में पर्ची सिस्टम का 80% हिस्सा है।

60 के दशक में पर्ची सिस्टम शुरू हुआ
आगरा शू फैक्टर्स फेडरेशन के संस्थापक अध्यक्ष स्व. राजकुमार सामा ने इस पर्ची सिस्टम को अपनी किताब में विस्तार से समझाया है। देश के विभाजन के बाद आगरा आए सिंधी और पंजाबियों के सामने रोजी-रोटी का संकट था। महिलाओं ने घरों में काम करने और सिलाई-कढ़ाई से आर्थिक सहयोग की शुरुआत की। लेकिन, पुरुष ठोस काम की तलाश में हींग की मंडी में मुस्लिम शू मार्केट पहुंचे।

वे यहां दुकानें अलॉट कराना चाहते थे। मगर, स्थानीय दुकानदारों और प्रशासन का सहयोग नहीं मिल रहा था। उसी समय आगरा शू फैक्टर्स फेडरेशन की शुरुआत हुई। एक प्रतिनिधिमंडल उस समय केंद्रीय मंत्री से मिलने दिल्ली गया। लेकिन, सहयोग नहीं मिला। इस मुद्दा समाचार की सुर्खियां बन गया।

इसके बाद केंद्रीय मंत्री खुद आगरा पहुंचे। बाजार की खाली दुकानों को अलॉट करवाया। दुकानें अलॉट होने के बाद सबसे बड़ा मुद्दा कारोबार के लिए पैसे का था। तभी 60 के दशक में पर्ची सिस्टम शुरू किया गया।

बाकायदा पर्चियां प्रिंट कराई गईं। एक पर्ची में चार कॉलम होते हैं। कारीगर, माल, डेट और पेमेंट की जानकारी इसमें लिखी जाती है। फर्म का नंबर भी डाला जाता है। पर्ची पर माल मिलने लगा। पर्ची लेने के 3 या 4 महीने बाद भुगतान करना होता है।

धन्नासेठ पर्चियां खरीदने के लिए दलालों को लगा दिया
जूता उद्योग का काम बढ़ा तो पर्ची सिस्टम चर्चा में आ गया। इस पर्ची सिस्टम के ब्याज से काफी मुनाफा होने लगा। यह सुन शहर के कुछ धनी लोग, जिनमें डॉक्टर, वकील, उद्योगपति आदि शामिल थे, उन्होंने अपने दलालों को पर्चियां खरीदने पर लगा दिया। ये लोग कारीगरों से साधारण ब्याज पर पर्चियां खरीद लेते थे। पर्ची खरीदने के बाद निर्धारित समय में पर्ची पर कैश मिल जाता था। इस काम में कई विधवाओं ने भी पैसा लगाना शुरू दिया।

क्रेडिबिलिटी पर कम-ज्यादा ब्याज तय होता है
हर पर्ची पर कितना ब्याज लगेगा? यह दुकानदार की क्रेडिबिलिटी पर तय होता है। जिसकी जितनी अच्छी गुड विल होती है, उसका ब्याज प्रतिशत उतना ही कम होता है। बाजार में 75 पैसे से लेकर 2.5 रुपए प्रति सैकड़ा पर ब्याज तय होता है। जिनकी क्रेडिबिलिटी नहीं होती है, उनके नाम की पर्ची ही नहीं काटी जाती है।

इनकम टैक्स ने आपत्ति जताई
इस सिस्टम के शुरू होने के 7-8 साल बाद इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने आपत्ति जताई। उस समय के इनकम टैक्स कमिश्नर ने कहा- जिनको पर्ची या चेक दिया गया है, उन कारीगर का नाम, पता उपलब्ध कराना होगा। जूता कारोबारियों ने बताया कि पर्ची सिस्टम में पता ही नहीं होता कि कौन पर्ची वापस लेकर आएगा। पर्ची लेकर कोई जाता है, लेकिन वापस कोई और लेकर आता है। डिपार्टमेंट ने कारोबारियों की बात नहीं मानी और पर्चियों के ब्याज पर भी टैक्स लगाने की बात की।

इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के खिलाफ 33 दिन चली हड़ताल
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने टैक्स लगाने का फैसला लिया तो विरोध में 33 दिन तक जूता कारोबारियों ने हड़ताल की थी। स्व. राजकुमार सामा के पोते विजय सामा बताते हैं कि सभी ने अपनी दुकानों की चाबी दादाजी के पास रखवा दी थी। रोज अपनी दुकानों पर समय से पहुंचते थे। बातें करते थे और शाम को घर वापस आ जाते थे। फिर कानपुर के चीफ कमिश्नर से मिलकर समस्या बताने के बाद पर्ची सिस्टम को बिना टैक्स के अनुमति मिली।

ऐसे काम करता है पर्ची सिस्टम
जूता कारीगर जूते बनाने के लिए बाजार से उधार में माल उठाते हैं। एक हफ्ते में पैसे देने का वायदा करते हैं। माल दुकानदार के पास पहुंचता है। दुकानदार माल की कीमत की पर्ची बनाता है। पर्ची लेकर कारीगर बाजार में पहुंचता है, जहां पर्ची खरीदने वाले बैठे हैं। वो किस दुकानदार की पर्ची है, उस हिसाब से ब्याज तय करते हैं। सौदा पटने के बाद पर्ची खरीद ली जाती है। कारीगर को ब्याज काटकर पैसा दे दिया जाता है। जिससे कारीगर उधार चुकाता है। पर्ची पर लिखी डेट पर पर्ची खरीदने वाला दुकानदार के पास पहुंचता है। वहां से उसे कैश मिलता है। जिसमें उसका फायदा ब्याज का होता है।