प्रतिकूल भावनाओं पर ऐसे पायें नियंत्रण, नकारात्मक दृष्टिकोण से मिल जाएगी निजात

जब आप किसी खास मनोदशा यानी मूड से ग्रस्त होते हैं तो आप वैसे व्यक्ति नहीं होते, जैसा आपको होना चाहिए। अगली बार जब आप किसी खास मनोदशा से ग्रस्त हों तो क्यों न अपना विश्लेषण करें। इसके बाद आप देखेंगे कि किस प्रकार स्वेच्छा से, जानबूझकर आप स्वयं को दुखी बना रहे हैं। आपकी संपूर्ण मनोदशा अपने स्पंदनों को आंखों के जरिए प्रकट करती है और जो कोई भी आपको देखता है, उसको वहां उपस्थित नकारात्मकता का आभास हो जाता है। आपकी आंखों में नकारात्मक भावनाएं झलकती देखकर लोग आपसे दूर हो जाते हैं। वे उन असुविधाजनक स्पंदनों से दूर रहना चाहते हैं।

अपनी आंखों से उन मनोदशाओं की झलक को दूर करने से पहले उन्हें आपको अपने मानसिक दर्पण से दूर करना होगा। इस संसार में आप शीशे के मकान में रहते हैं और प्रत्येक व्यक्ति आपको देख रहा है। आप दिखावा नहीं कर सकते, आपको स्वाभाविक जीवन जीना है। आपके सारे अच्छे गुण आपकी मनोदशाओं के द्वारा भीतर ढके पड़े हैं। केवल दूसरे लोग ही आपके व्यवहार को नहीं देख रहे, बल्कि आप भी उनके व्यवहार का अध्ययन कर रहे होते हैं। अपने आसपास के लोगों को लगातार ध्यान से देखते रहने के परिणामस्वरूप आप तुलना करने लग जाते हैं। इसी कारण आप विभिन्न मनोदशाओं से घिर जाते हैं। मनोदशाएं आमतौर पर परिवेश के प्रभावों का परिणाम होती हैं।

जब आप किसी खास मनोदशा यानी मूड से ग्रस्त होते हैं तो आप वैसे व्यक्ति नहीं होते, जैसा आपको होना चाहिए। अगली बार जब आप किसी खास मनोदशा से ग्रस्त हों तो क्यों न अपना विश्लेषण करें। इसके बाद आप देखेंगे कि किस प्रकार स्वेच्छा से, जानबूझकर आप स्वयं को दुखी बना रहे हैं। आपकी संपूर्ण मनोदशा अपने स्पंदनों को आंखों के जरिए प्रकट करती है और जो कोई भी आपको देखता है, उसको वहां उपस्थित नकारात्मकता का आभास हो जाता है। आपकी आंखों में नकारात्मक भावनाएं झलकती देखकर लोग आपसे दूर हो जाते हैं। वे उन असुविधाजनक स्पंदनों से दूर रहना चाहते हैं।

अपनी आंखों से उन मनोदशाओं की झलक को दूर करने से पहले उन्हें आपको अपने मानसिक दर्पण से दूर करना होगा। इस संसार में आप शीशे के मकान में रहते हैं और प्रत्येक व्यक्ति आपको देख रहा है। आप दिखावा नहीं कर सकते, आपको स्वाभाविक जीवन जीना है। आपके सारे अच्छे गुण आपकी मनोदशाओं के द्वारा भीतर ढके पड़े हैं। केवल दूसरे लोग ही आपके व्यवहार को नहीं देख रहे, बल्कि आप भी उनके व्यवहार का अध्ययन कर रहे होते हैं। अपने आसपास के लोगों को लगातार ध्यान से देखते रहने के परिणामस्वरूप आप तुलना करने लग जाते हैं। इसी कारण आप विभिन्न मनोदशाओं से घिर जाते हैं। मनोदशाएं आमतौर पर परिवेश के प्रभावों का परिणाम होती हैं।