एंटरप्रेन्योरशिप में कामयाबी पाने के लिए जरूरी है नए प्रयोग, यहां पढ़ें पूरी जानकारी

आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में महिला उद्यमियों की भूमिका सराहनीय है। वे अपने छोटे-बड़े प्रयासों से नया उद्यम शुरू कर स्वावलंबन का रास्ता चुन रही हैं। जैसे हैदराबाद की अरुणा को एक समय कारोबार के बारे में कोई जानकारी नहीं थी, न ही ऐसा करने की कोई योजना थी। सिर्फ कुछ करने की इच्छाशक्ति थी। तब उन्होंने मार्केट का पूरा अध्ययन करने के बाद अपने पति के साथ मिलकर ‘बैंबू हाउस इंडिया’ की नींव रखी। इसके जरिये वह बैंबू एवं अन्य इको फ्रेंडली चीजों, प्लास्टिक वेस्ट से ग्रीन घरों का निर्माण करती हैं। अरुणा के सामने कई तरह की चुनौतियां आयीं। शुरुआती दौर में ही तबीयत भी बिगड़ गयी। पति का एक्सिडेंट हो गया। वह आठ महीने तक बिस्तर पर रहे। अचानक से र्आिथक हालात बिगड़ गये। कर्ज का बोझ आ गया। लेकिन उन्होंने तय कर रखा था कि हार नहीं माननी है और वह लगी रहीं। धीरे-धीरे उनका कारोबार पटरी पर लौटा। आज उनकी कंपनी हैदराबाद, तमिलनाडु, कर्नाटक, महाराष्ट्र में 400 से अधिक घर बना चुकी है।

अरुणा मूल रूप से पश्चिम बंगाल से हैं। शादी के बाद वह हैदराबाद चली गयीं। चूंकि बचपन से ही प्रकृति प्रेमी एवं इको-फ्रेंडली चीजों को पसंद करती आयी थीं, उससे प्रभावित थीं। इसलिए जब वहां भी अपने घर के लिए नये इको फ्रेंडली फर्नीचर की तलाश शुरू की, तब उन्हें काफी मायूसी हाथ लगी। अरुणा बताती हैं, ‘कई तरह की खोजबीन एवं बाजार के अध्ययन के बाद हमें भारत-बांग्लादेश सीमा पर बैंबू के कुछ कारीगरों के काम को देखने का अवसर मिला। कारीगर बहुत कुशल थे। लेकिन फर्नीचर से इतर वे कुछ और नहीं बनाते थे और न ही उनके उत्पाद बाजार तक पहुंच पा रहे थे। उसी समय हमें बैंबू से घर बनाने का आइडिया आया। इस प्रकार वर्ष 2006 में ‘बैंबू हाउस इंडिया’ की स्थापना हुई। बैंबू के घर न सिर्फ 20 से 25 वर्ष तक टिक सकते हैं, बल्कि इसके निर्माण एवं देखरेख पर न्यूनतम खर्च आता है। ऐसे घर कंक्रीट की अपेक्षाकृत ठंडे (2 से 3 डिग्री कम होता है तापमान) भी होते हैं।’

चुनौतियों के बीच निकाला रास्ता: भारत दुनिया में बैंबू का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। बावजूद इसके पूरा क्षेत्र असंगठित होने के कारण कई तरह की कमियां हैं यहां। अरुणा बताती हैं, ‘करीब डेढ़ साल के रिसर्च एवं सर्वे में हमने जाना कि कैसे शोधकर्ता, कारीगर से लेकर अन्य स्टेकहोल्डर्स अपने-अपने स्तर पर कार्य कर रहे हैं। बावजूद इसके, लोगों को इन सबके बारे में कोई जागरूक करने वाला नहीं था कि इससे फर्नीचर के अलावा मजबूत घरों का निर्माण भी किया जा सकता है। अपने वेंचर के जरिये हमने इसी कमी को दूर करने का प्रयास किया है।’

गृह निर्माण में दिया प्रशिक्षण: अरुणा बताती हैं कि हम घरों के निर्माण में बैंबू मैट बोर्ड, रीसाइकिल प्लास्टिक बोड्र्स, पाइन वुड वेस्ट आदि इस्तेमाल करते हैं। हमने कारीगरों को प्रशिक्षित किया है। इससे उनके लिए रोजगार के नये विकल्प खुले हैं। हमारे साथ हुनरमंद कारीगरों की एक पूरी टीम है, जिनकी र्आिथक स्थिति में काफी सुधार आ रहा है। लोगों को भी कंक्रीट के घर के बीच एक अतिरिक्त इको-फ्रेंडली कमरा या स्थान मिल रहा है।