अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के टूटने का खतरा:सुप्रीम लीडर अखुंदजादा और गृहमंत्री हक्कानी के गुट भिड़े, इंटरनेट बैन ने खोल दी अंदरूनी कलह

अफगानिस्तान में तालिबान के भीतर हालात ठीक नहीं हैं। हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि सरकार ढहने का खतरा मंडरा रहा है। संगठन के अंदर सत्ता को लेकर खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक हाल ही में एक वायरल ऑडियो क्लिप से इसका खुलासा हुआ। हालांकि इसकी फिक्स डेट सामने नहीं आई।

एक धड़े का नेतृत्व तालिबान के सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा कर रहे हैं, जबकि दूसरा धड़ा गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी का है। दोनों गुटों की सोच और सत्ता के इस्तेमाल को लेकर मतभेद अब संगठन की एकता पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

गौरतलब है कि तालिबान ने अगस्त 2021 में अमेरिकी सेना की वापसी के बाद राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया था। तब से सत्ता पर पूरी पकड़ के दावों के बीच, अब सामने आ रहे संकेत बताते हैं कि तालिबान के भीतर की दरारें गहरी होती जा रही हैं।

लीक ऑडियो में क्या है

बीबीसी के मुताबिक सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा भाषण में कहते हैं कि सरकार के अंदर ही लोग आपस में टकरा रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ये अंदरूनी मतभेद बढ़ते रहे, तो इस्लामिक अमीरात (तालिबान सरकार) ढह जाएगा और खत्म हो जाएगा। अखुंदजादा ने यह भाषण जनवरी 2025 में दक्षिणी शहर कंधार के एक मदरसे में तालिबान लड़ाकों के सामने दिया था।

इस भाषण ने उन अफवाहों को और हवा दी, जो कई महीनों से चल रही थीं कि तालिबान की टॉप लीडरशिप में गंभीर मतभेद हैं। तालिबान हमेशा इन मतभेदों से इनकार करता रहा है, यहां तक कि बीबीसी के सीधे सवालों के जवाब में भी।

हालांकि इन्हीं अफवाहों के बाद बीबीसी ने एक साल तक जांच की। इस दौरान 100 से ज्यादा मौजूदा और पूर्व तालिबान सदस्यों, लोकल लोगों, एक्सपर्ट्स और पूर्व डिप्लोमैट्स से बात की। सुरक्षा कारणों से बीबीसी ने इन लोगों की पहचान उजागर नहीं की।

तालिबान के कंधार गुट और काबुल गुट में तकरार

बीबीसी की जांच में पहली बार साफ तौर पर सामने आया कि तालिबान के सबसे ऊपर दो अलग-अलग गुट हैं, जिनके पास अफगानिस्तान के लिए दो अलग सोच है। पहला गुट पूरी तरह अखुंदजादा के लिए वफादार है। यह गुट कंधार से काम करता है और दुनिया से अलग-थलग रहकर अफगानिस्तान को एक सख्त इस्लामिक अमीरात बनाना चाहता है।

दूसरा गुट राजधानी काबुल में बैठा है। सिराजुद्दीन हक्कानी का यह गुट भी इस्लाम की सख्त व्याख्या मानता है, लेकिन चाहता है कि अफगानिस्तान दुनिया से जुड़े, अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करे और लड़कियों व महिलाओं को कम से कम शिक्षा का अधिकार मिले, जो इस समय प्राथमिक स्तर के बाद रोक दी गई है।

इंटरनेट और फोन सर्विस बंद होने से खींचतान उजागर हुई

रिपोर्ट के मुताबिक सितंबर के अंत में एक ऐसा फैसला हुआ, जिसकी वजह से यह खींचतान और खुलकर नजर आने लगी। सुप्रीम लीडर अखुंदजादा ने पूरे अफगानिस्तान में इंटरनेट और फोन सेवाएं बंद करने का आदेश दिया, जिससे यह देश दुनिया से कट गया।

तीन दिन बाद अचानक देशभर में इंटरनेट बहाल हो गया, बिना किसी आधिकारिक वजह के। तालिबान के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक काबुल गुट ने अखुंदजादा के आदेश के खिलाफ जाकर इंटरनेट दोबारा चालू करवाया।

इंटरनेट बंद करने का आदेश बहुत सख्त कदम था। आज के समय में इंटरनेट सिर्फ आम लोगों के लिए नहीं, बल्कि सरकार चलाने और कारोबार करने के लिए भी जरूरी हो चुका है। अगर इंटरनेट बंद रहता, तो शासन व्यवस्था और व्यापार दोनों ठप पड़ जाते।

इसी वजह से काबुल गुट के नेताओं ने इस बार जोखिम उठाया। वे सीधे प्रधानमंत्री मुल्ला हसन अखुंद से मिलने गए और उन्हें समझाया कि इंटरनेट बंद रखना नुकसानदेह होगा। इस बातचीत के बाद आदेश वापस ले लिया गया और इंटरनेट दोबारा चालू कर दिया गया।

तालिबान में अंदरूनी विरोध भड़कने का डर था

इस घटना के बाद लोग यह अंदाजा लगाने लगे कि अब आगे क्या होगा। कुछ लोगों का मानना था कि काबुल में बैठे तालिबान नेताओं को धीरे-धीरे सत्ता से हटाया जा सकता है। वहीं कुछ का कहना था कि अखुंदजादा ने कदम पीछे इसलिए खींच लिया, क्योंकि उन्हें अंदरूनी विरोध भड़कने का डर था।

हालांकि तालिबान ने इन अटकलों को खारिज किया। तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि संगठन के भीतर किसी तरह का बंटवारा नहीं है। उनके मुताबिक जो मतभेद हैं, वे परिवार के अंदर होने वाले मतभेदों जैसे हैं, जिन्हें आपसी बातचीत से सुलझा लिया जाता है।

एक अफगानिस्तान एक्सपर्ट के मुताबिक तालिबान हमेशा अपनी एकता और अनुशासन के लिए जाना जाता रहा है। संगठन के DNA में ऊपर के आदेश को मानना शामिल है। ऐसे में सर्वोच्च नेता के सीधे आदेश के खिलाफ जाकर कदम उठाना बेहद अहम घटना थी। एक तालिबान अंदरूनी व्यक्ति ने इसे सीधी बगावत कहा।

जो कभी टीवी के दुश्मन थे, आज वही कैमरे के सामने

काबुल गुट के रुख में आया बदलाव किसी से छिपा नहीं हैं। एक एक्सपर्ट ने कहा, “हमें याद है कि काबुल में बैठे यही तालिबान नेता कभी टेलीविजन तोड़ दिया करते थे, लेकिन अब वे खुद टीवी पर दिखाई देते हैं। वे सोशल मीडिया की ताकत को भी अच्छी तरह समझते हैं।”

याकूब मुजाहिद के पिता मुल्ला उमर ने तालिबान के पहले शासनकाल में संगठन का नेतृत्व किया था। जब संगीत और टीवी पर पूरी तरह बैन था, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। आज ये नेता अफगान युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय होते जा रहे हैं।

इसकी झलक सोशल मीडिया पर दिखाई देती है। टिकटॉक पर इनके समर्थन में बड़ी संख्या में वीडियो बनाए जा रहे हैं, जिन्हें लोग देख रहे हैं और साझा भी कर रहे हैं।

सिर्फ ऑनलाइन ही नहीं, जमीनी स्तर पर भी इसका असर दिख रहा है। बाजारों में इनके चेहरे वाली तस्वीरें, पोस्टर और दूसरी चीजें बिकने लगी हैं। इससे पता चलता है कि इनकी पहचान और असर, खासकर युवाओं के बीच, लगातार बढ़ रहा है।

युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हैं हक्कानी

सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा अगर किसी तालिबानी नेता का असर दिखता है तो वह सिराजुद्दीन हक्कानी हैं। हक्कानी ने अमेरिकी सेना के खिलाफ अफगान जंग में बहादुरी दिखाई थी और कई मुश्किल हमलों को अंजाम दिया था।

हक्कानी ने ही 2017 में काबुल में जर्मन दूतावास के पास ट्रक बम धमाका कराया था, जिसमें 90 से ज्यादा लोग मारे गए थे। अमेरिकी सेना की पकड़ में न आने की वजह से समर्थकों के बीच वह हीरो बन गया। उस दौर में उनकी सिर्फ एक ही तस्वीर मौजूद थी, जिसे बीबीसी के एक अफगान पत्रकार ने लिया था।

दोबारा कब्जे के बाद दुनिया के सामने आए हक्कानी

साल 2021 में अमेरिका की अफगानिस्तान से वापसी के छह महीने बाद ही हक्कानी पहली बार दुनिया के कैमरों के सामने आए। काबुल में पुलिस अधिकारियों के एक दीक्षांत समारोह में वे खुले चेहरे के साथ मंच पर नजर आए।

हक्कानी अब अब सिर्फ एक लड़ाका नहीं, बल्कि एक राजनेता बन चुके थे। 2024 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने उनसे बैठकर बातचीत की और सवाल किया: क्या वे अफगानिस्तान में बदलाव की सबसे बड़ी उम्मीद हैं? इसके कुछ ही महीनों बाद, एफबीआई ने चुपचाप उनके सिर पर रखा गया 1 करोड़ डॉलर का इनाम भी हटा लिया।

सुप्रीम लीडर अखुंदजादा सिर्फ अल्लाह के लिए जिम्मेदार

हक्कानी की तमाम लोकप्रियता के बावजूद सुप्रीम लीडर हिबतुल्लाह अखुंदजादा के खिलाफ खुलकर कदम उठाना अब भी उनके लिए बेहद असंभव माना जाता है।

तालिबान के मुताबिक अखुंदजादा सुप्रीम लीडर हैं, वे सिर्फ अल्लाह के लिए जवाबदेह हैं और जिन्हें चुनौती देना सोचा भी नहीं जा सकता। 2016 में उन्हें तालिबान का नेता इसलिए चुना गया था क्योंकि वे सहमति से फैसले लेने वाले माने जाते थे।

अखुंदजादा के पास खुद लड़ाई का ज्यादा अनुभव नहीं था, इसलिए उन्होंने सिराजुद्दीन हक्कानी को डिप्टी लीडर बनाया, जो उस समय अमेरिका की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में थे। उन पर 1 करोड़ डॉलर का इनाम था। दूसरे डिप्टी लीडर थे याकूब मुजाहिद, जो तालिबान संस्थापक मुल्ला उमर के बेटे हैं। वे फिलहाल रक्षा मंत्री हैं और हक्कानी गुट के ज्यादा करीब हैं।

अखुंदजादा ने काबुल की जगह कंधार को पावर सेंटर बनाया

अखुंदजादा और हक्कानी के बीच की व्यवस्था ने ही तालिबान को 2021 में दोबारा सत्ता हासिल करने में मदद की। बाहर की दुनिया को तब तालिबान एकजुट दिख रहा था। लेकिन सत्ता में आते ही अखुंदजादा अकेला शक्ति केंद्र बन गए।

अखुंदजादा ने दोनों (हक्कानी और मुजाहिद) को डिप्टी लीडर्स से हटाकर मंत्री पद पर सीमित कर दिया गया। यहां तक कि तालिबान के सह-संस्थापक अब्दुल गनी बरादर को भी प्रधानमंत्री की जगह उप प्रधानमंत्री बनाया गया।

अखुंदजादा ने राजधानी काबुल में रहने के बजाय कंधार को सत्ता का केंद्र बनाए रखा और अपने चारों ओर कट्टरपंथी और भरोसेमंद लोगों को इकट्ठा किया। सुरक्षा, धार्मिक नीतियों और अर्थव्यवस्था के अहम हिस्से इन्हीं के हाथ में दिए गए।

कंधार के फैसले काबुल के मंत्रियों से सलाह के बिना होने लगे, खासकर लड़कियों की शिक्षा जैसे मुद्दों पर। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में भी माना गया कि महिलाओं की शिक्षा पर रोक दोनों गुटों के बीच तनाव की बड़ी वजह है।

शिक्षा पर सवाल उठाने पर मंत्री फरार, गिरफ्तारियां हुईं

एक एक्सपर्ट ने कहा कि जो लोग खुलकर अखुंदजादा के खिलाफ बोले, उन्हें खुलकर इसकी कीमत चुकानी पड़ी। फरवरी 2025 में तालिबान सरकार के तत्कालीन उप विदेश मंत्री शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकजई को देश छोड़कर भागना पड़ा। इसकी वजह उनका एक खुला और सार्वजनिक बयान बना, जो तालिबान के सख्त नेतृत्व को बिल्कुल पसंद नहीं आया।

शेर मोहम्मद अब्बास स्तानिकजई ने खुले मंच से कहा था कि तालिबान का मौजूदा लीडरशिप अल्लाह के रास्ते से भटक गया है और 2 करोड़ लोगों के साथ अन्याय कर रहा है। उनके इस बयान का सीधा इशारा लड़कियों और महिलाओं की शिक्षा पर लगाए गए प्रतिबंध की ओर था।

उनका यह बयान तालिबान के सर्वोच्च नेता अखुंदजादा के लिए सीधी चुनौती माना गया। इसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई की आशंका बढ़ गई। जान के खतरे को देखते हुए उन्हें अफगानिस्तान छोड़ना पड़ा। वह कहां रह रहे हैं इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र के निगरानीकर्ताओं का कहना है कि जुलाई और सितंबर 2025 में 2 लोगों को भी लड़कियों की शिक्षा पर अखुंदजादा के फरमानों पर सवाल उठाने के बाद गिरफ्तार किया गया।

खास बुलावे पर ही अखुंदजादा से मिल पाते हैं तालिबानी नेता

अखुंदजादा के बारे में बताया जाता है कि वे बेहद सख्त धार्मिक सोच रखते हैं। वे बहुत कम बोलते हैं, इशारों में बात करते हैं और उनकी बातें बुजुर्ग मौलवी समझाते हैं। उनकी तस्वीरें लेना मना है और सिर्फ दो ही तस्वीरें मौजूद हैं।

अखुंदजादा से मिलना अब बेहद मुश्किल हो गया है और काबुल के मंत्रियों को कंधार जाने के लिए खास बुलावे का इंतजार करना पड़ता है।

दूसरी तरफ काबुल गुट के नेता दुनिया देख चुके हैं। उनका मानना है कि मौजूदा हालात में सरकार ज्यादा दिन नहीं चल सकती। वे खाड़ी देशों जैसे मॉडल की बात करते हैं। इस गुट में बरादर, हक्कानी और याकूब जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

तालिबान की टॉप लीडरशिप में मतभेद तो साफ दिख रहे हैं, लेकिन क्या ये मतभेद कभी ठोस कदमों में बदलेंगे? फिलहाल तो ऐसा कुछ नहीं हुआ है।

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