डेनमार्क इस समय एक अजीब और मुश्किल हालात में फंसा हुआ है। उसका सामना किसी दुश्मन देश से नहीं, बल्कि अपने ही सहयोगी देश अमेरिका से है। राष्ट्रपति ट्रम्प ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कई धमकियां दे चुके हैं।
ग्रीनलैंड आधिकारिक तौर पर डेनमार्क का हिस्सा है और वह भी अमेरिका की तरह NATO मेंबर है। यानी ऐसे हालात पैदा हो गए हैं जहां पर NATO का ही एक मेंबर देश, दूसरे मेंबर देश को मिलिट्री एक्शन की धमकी दे रहा है।
डेनमार्क की ऐसी हालात को लेकर ग्रीस के पूर्व वित्त मंत्री और अर्थशास्त्री यानिस वारोफाकिस ने सोशल मीडिया पर लिखा कि यह ग्रीनलैंड के कर्मों का फल है। उन्होंने कहा कि NATO बाहरी दुश्मनों से बचाने के लिए है, लेकिन भीतर के दुश्मनों से हिफाजत के लिए नहीं है।
जब 1974 में NATO के दो मेंबर देशों ग्रीस और तुर्किये के बीच साइप्रस को लेकर जंग के हालात बने थे, तब डेनमार्क ने यह कहा था कि NATO का काम किसी मेंबर देश को दूसरे मेंबर देश से बचाना नहीं है।
क्या यह NATO के अंत की शुरुआत है
NATO की स्थापना 1949 में सोवियत संघ से बचाव के लिए हुई थी। इसके नियमों का आर्टिकल-5 कहता है कि अगर किसी एक सदस्य पर हमला होता है, तो उसे सभी पर हमला माना जाएगा। लेकिन समस्या यह है कि अगर हमला NATO के अंदर से ही हो, तो क्या होगा? इस पर NATO के नियम साफ नहीं हैं।
ट्रम्प काफी समय से यूरोप और NATO देशों को भड़काने वाले बयान दे रहे हैं। वे बार-बार ग्रीनलैंड को अपने नियंत्रण में लेने की बात कर चुके हैं। यूरोप के कई नेताओं और विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अमेरिका ने सच में ताकत के बल पर ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश की, तो यह नाटो के लिए अंत की शुरुआत हो सकती है।
यूरोपीय देशों ने डेनमार्क के समर्थन में प्रतीकात्मक तौर पर सैनिक भेजे हैं। ब्रिटेन ने सिर्फ एक सैनिक और नॉर्वे ने दो सैनिक भेजे। यह कदम सैन्य नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश था। हालांकि इससे भी ट्रम्प नाराज हो गए और उन्होंने डेनमार्क के समर्थन में खड़े यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया।
तुर्किये और साइप्रस के बीच क्या विवाद?
साइप्रस एक छोटा सा आइलैंड है, लेकिन इसकी भौगोलिक और राजनीतिक अहमियत बहुत बड़ी रही है। यह यूरोप, एशिया और मिडिल ईस्ट के बीच स्थित है। लंबे समय तक साइप्रस पर ब्रिटेन का शासन था और 1960 में यह ब्रिटेन से आजाद हुआ।
आजादी के समय साइप्रस की आबादी दो हिस्सों में बंटी हुई थी। तब करीब 80% आबादी ग्रीक मूल की थी और लगभग 18% तुर्किये मूल की। दोनों समुदायों के बीच पहले से तनाव था, इसलिए आजादी के साथ ही एक खास व्यवस्था बनाई गई।
इस व्यवस्था के तहत
- साइप्रस एक स्वतंत्र देश बना
- लेकिन ग्रीस, तुर्किये और ब्रिटेन को ‘गारंटर देश’ बनाया गया
- अगर साइप्रस में संविधान या दोनों समुदायों की सुरक्षा को खतरा हुआ, तो ये तीनों देश हस्तक्षेप कर सकते थे
शुरुआत से ही यह व्यवस्था कमजोर साबित हुई। ग्रीक और तुर्की समुदायों के बीच झड़पें होती रहीं। कई बार हिंसा भी हुई और दोनों तरफ भरोसा खत्म होता चला गया।
फिर आया 1974। उस समय ग्रीस में सैन्य सरकार थी। वे साइप्रस को ग्रीस में मिलाना चाहते थे। जुलाई 1974 में ग्रीस समर्थित लोगों ने साइप्रस में तख्तापलट कर दिया और राष्ट्रपति माकारियोस को सत्ता से हटा दिया।
इससे नाराज होकर तुर्किये ने भी साइप्रस पर हमला कर दिया। उन्होंने साइप्रस के करीब 36 फीसदी हिस्से पर कब्जा कर लिया। लाखों लोग अपने घर छोड़कर भागने को मजबूर हो गए। ग्रीक लोग दक्षिण की ओर चले गए और तुर्की लोग उत्तर की ओर।
इसके बाद साइप्रस हमेशा के लिए दो हिस्सों में बंट गया। दक्षिणी हिस्सा ग्रीक साइप्रस के नियंत्रण में रहा। उत्तरी हिस्सा तुर्की साइप्रस के नियंत्रण में चला गया।
तुर्किये समर्थित उत्तरी हिस्से ने बाद में खुद को “उत्तरी साइप्रस रिपब्लिक” घोषित कर दिया, लेकिन तुर्किये के अलावा दुनिया का कोई भी देश इसे मान्यता नहीं देता। आज भी दोनों हिस्सों के बीच एक यूएन कंट्रोल्ड बफर जोन है, जिसे ‘ग्रीन लाइन’ कहा जाता है।
सबसे अहम बात यह है कि उस समय NATO ने कोई सैन्य दखल नहीं दिया, क्योंकि ग्रीस और तुर्की दोनों ही NATO के सदस्य थे। यही वजह है कि यह मामला आज भी NATO की सबसे बड़ी कमजोरी के उदाहरण के तौर पर देखा जाता है।
US ने हमला किया तो NATO क्या करेगा
यूरोपियन यूनियन (EU) और इंटरनेशनल लॉ एक्सपर्ट स्टीवन ब्लैकमैन के मुताबिक ट्रम्प की धमकी NATO की बुनियादी सोच के खिलाफ है। इस संगठन का मूल सिद्धांत है कि सदस्य देशों की संप्रभुता का सम्मान किया जाएगा।
कुछ एक्सपर्ट्स मांग कर रहे हैं कि यूरोप को ट्रम्प के सामने झुकना बंद करना चाहिए और सख्ती दिखानी चाहिए, जैसे कि अमेरिका के सैन्य ठिकाने बंद करने की धमकी देना, अमेरिकी बॉन्ड की खरीद रोकना या अमेरिकी टेक कंपनियों पर सख्त नियम लगाना। लेकिन यूरोप के अंदरूनी मतभेद इतने गहरे हैं कि फिलहाल ऐसा होना मुश्किल लगता है।
ग्रीनलैंड को भले ही काफी हद तक स्वायत्तता मिली हो, लेकिन उसकी रक्षा और विदेश नीति की जिम्मेदारी अब भी डेनमार्क के पास है। अगर अमेरिका ने सच में कोई सैन्य कदम उठाया, तो NATO के भविष्य पर भी बड़ा सवाल खड़ा हो जाएगा।
अगर अमेरिका जैसे सबसे ताकतवर मेंबर ने ही ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की कोशिश की, तो NATO कुछ कर नहीं पाएगा, क्योंकि किसी भी सैन्य फैसले के लिए सभी की सहमति जरूरी होती है। हालांकि इससे NATO तुरंत खत्म नहीं होगा, लेकिन उसकी विश्वसनीयता को गहरा झटका जरूर लगेगा।