भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत ने सोमवार को कहा कि यह बहुत जरूरी है कि फैमिली कोर्ट बच्चों के मन से मनोवैज्ञानिक डर को खत्म करें। इसके लिए कोर्ट के पारंपरिक कामकाज में कुछ बदलाव किए जाएं। उन्होंने पूछा कि क्या फैमिली कोर्ट में काले चोंगे होने चाहिए?
CJI ने कहा कि जब हम फैमिली कोर्ट के लिए एक नई सोच और अवधारणा बना रहे हैं तो क्या इससे बच्चे के मन में कोई मनोवैज्ञानिक डर पैदा नहीं होगा?
उन्होंने सुझाव दिया कि फैमिली कोर्ट में पीठासीन जज और वकील यूनिफॉर्म में नहीं आने चाहिए। CJI सूर्यकांत ने ये बातें दिल्ली के रोहिणी में एक फैमिली कोर्ट की आधारशिला रखने के कार्यक्रम में कहीं।
उन्होंने कहा कि फैमिली कोर्ट में आप सभी के लिए हमारे पीठासीन अधिकारी कोर्ट की पोशाक में नहीं बैठेंगे। बार के सदस्य भी काले और सफेद चोंगे में नहीं आएंगे। पुलिस अधिकारी भी वर्दी में नहीं आएंगे, क्योंकि यह पूरा माहौल बच्चों के मन में डर पैदा करता है, खासकर तब जब वे किसी भी व्यवस्था के सबसे ज्यादा पीड़ित होते हैं।
जस्टिस सूर्यकांत के 4 पॉइंट
- हर कोई कोर्ट आना नहीं चाहता। जब हम सुधारों की बात करते हैं और जब हम फैमिली कोर्ट की अवधारणा को विवादों को सुलझाने के एक मंच के रूप में देखते हैं तो यह सिविल संपत्ति विवादों जैसा मामला नहीं है।
- फैमिली कोर्ट का मकसद मानवीय रिश्तों को सुधारना, उन पर विचार करना और उन्हें ठीक करना है। क्या हम इन्हें ‘पारिवारिक समाधान केंद्र’ नहीं कह सकते?
- फैमिली कोर्ट में अन्य कोर्ट के मुकाबले ज्यादातर मुकदमों और विवादों के विपरीत दूर के पक्षों या बेजान संस्थाओं के बीच के नहीं होते। ये मामले परिवारों के भीतर से ही आते हैं।
- फैमिली कोर्ट के सामने आने वाले विवादों के भारी भावनात्मक, सामाजिक और वित्तीय परिणाम होते हैं जो तात्कालिक कानूनी विवाद से कहीं आगे तक जाते हैं।
कार्यक्रम में दिल्ली सीएम, सुप्रीम कोर्ट के अन्य जज भी शामिल
इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मनमोहन ने कहा कि दिल्ली में, जिला कोर्ट को जिन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, वे तीन प्रकार की हैं। बजट, कर्मचारी और जगह। उन्होंने कहा कि जगह का अर्थ है अदालत के कमरे। साथ ही रहने की व्यवस्था (आवासीय आवास) की भी चुनौतियां हैं।
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीके उपाध्याय ने भी इस कार्यक्रम में अपने विचार रखे।