लेटर काल्पनिक हैं, लेकिन तीनों पत्र मिलकर एक पूरी तस्वीर बनाते हैं। एक बेटी का टूटा भरोसा, एक परिवार का दर्द और एक राज्य की व्यवस्था पर उठते सवाल। ये सिर्फ शब्द नहीं- एक मृत लड़की की चीखें हैं, जो कह रही है- ‘मैं मर गई, लेकिन मेरे जैसे और न मरें।’
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को चिट्ठी
सर, नमस्कार।
मैं…एक साधारण लड़की हूं। जहानाबाद की मिट्टी में पली-बढ़ी, सपनों में डॉक्टर बनने की तस्वीर लिए पटना आई थी। मां-बाप ने आंखों में आंसू भरकर कहा था- ‘बेटा, पढ़ ले, डॉक्टर बन जा, गांव की औरतों का दर्द समझ सकेगी।’ मैंने वही सुना।
रात-रात भर नीट के MCQ रटे, आंखों में नींद के बजाय उम्मीद जगी रही। शंभू गर्ल्स हॉस्टल को अपना दूसरा घर माना। सोचा था- यहां सुरक्षित हूं, यहां तो बिहार का सुशासन है ना?
पर सर… वो रात… वो रात मेरी जिंदगी का सबसे काला अध्याय बन गई।
मेरे साथ दरिंदगी हुई। चीखी, लड़ी, हाथ-पैर मारे, नाखून गड़ाए… पर कोई नहीं आया। किसी ने नहीं सुना।
जब मैं बेहोश पड़ी मिली, तो पुलिस ने कहा- स्लीपिंग पिल्स खा ली होंगी, सुसाइड है। मेरे मां-बाप को झूठ बोला गया। मेरे शरीर पर चोट के निशान थे, बलात्कार हुआ था, पर पहले सब कुछ दबाने की कोशिश हुई। क्यों सर? क्या इसलिए कि ‘सुशासन’ की छवि पर चोट न लगे?
मैं अब इस दुनिया में नहीं हूं, पर मां आज भी रो रही है। मेरे पिता का सिर शर्म से झुका है।
और मैं… मैं तो बस एक सवाल पूछना चाहती हूं आपने कहा था ना बेटियों को पढ़ाओ, सुरक्षित रखो। तो फिर मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?
क्या मेरी मौत भी ‘सामान्य’ थी आपके लिए?
सर, मैं आपसे इंसाफ नहीं मांग रही, क्योंकि इंसाफ तो मेरे जाने के बाद और सवालों में घिर गया है।
सर, मेरी मां कहती है- ‘बेटा, नीतीश जी अच्छे हैं, वो सुनेंगे। मैं उसकी बात मानकर लिख रही हूं।
अगर सुन रहे हैं, तो कृपया मेरी मां की आंखों के आंसू पोंछ दीजिए।
मेरे जैसे हजारों सपनों को बचाइए। क्योंकि अगली बार कोई और बेटी पटना आएगी… और वो भी सोचेगी यहां सुरक्षित हूं।
पर उसका भरोसा टूटने से पहले… आप कुछ कीजिए।
आपकी एक बेटी की तरह, (जो अब सिर्फ एक पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट बनकर रह गई)
जय बिहार। (पर बेटियों के लिए भी जय हो, इस कामना के साथ)
गृह मंत्री सम्राट चौधरी को लेटर
बिहार की एक मरी हुई बेटी की चीख के साथ सलाम।
चाचा जी…
मैं आपको चाचा जी ही कहूंगी, क्योंकि आपने खुद को बिहार की हर बेटी का रक्षक बताया था। पिछले महीने ही आपने कहा था-अपराधी बिहार छोड़कर भाग रहे हैं। जो बचे हैं उनको अगले 3 महीने में बिहार छोड़ने पर मजबूर कर दूंगा, क्योंकि बिहार को सुशासन चाहिए।
मैंने वो वीडियो देखा था। मैंने विश्वास किया था। जहानाबाद से पटना आई थी तो पहले सुशासन बाबू के पास गृह मंत्रालय था, फिर आपके पास आ गया है।
सोचा था-सम्राट चाचा गृह मंत्री हैं, अब बहुत कुछ बदलेगा। और ज्यादा सेफ रहूंगी।
पर चाचा जी…उस रात मेरे साथ जो हुआ, वो सिर्फ बलात्कार नहीं था। वो आपके सारे वादों का बलात्कार था।
जब मैं मरी हुई मिली, तो पहले तो पुलिस ने कहा-‘सुसाइड है, स्लीपिंग पिल्स खा ली।’
मेरे शरीर पर काटने के निशान थे, खून के धब्बे थे। बलात्कार के सबूत थे। फिर भी सुसाइड बताया गया। क्यों चाचा जी?
क्या आपकी पुलिस को अब बलात्कार भी ‘सुसाइड’ लगने लगा है?
आप डिप्टी सीएम हैं। गृह मंत्रालय आपके पास है।
फिर भी मेरे केस में अब तक सिर्फ एक आरोपी की गिरफ्तार हुई है। हॉस्टल संचालिका क्यों खुला घूम रही है? आरोपी, क्यों नहीं पकड़े गए?
मैं मर चुकी हूं चाचा जी। पर मेरी मां अभी जिंदा है।
लोग कहते हैं- ‘सम्राट चौधरी बहुत सख्त हैं, वो इंसाफ दिलाएंगे।’
पर चाचा जी… मां के हाथ अब तक खाली हैं।
उसकी आंखों में सिर्फ आंसू हैं।
मैं बस एक आखिरी सवाल पूछना चाहती हूं- अगर ये सब आपकी जानने वाली बच्ची के साथ होता…तो क्या आप भी चुप बैठे रहते? क्या तब भी पुलिस सुसाइड का केस बनाती?
चाचा जी,
मैं अब सिर्फ एक लाश हूं। पर बिहार में अभी लाखों बेटियां जिंदा हैं। मेरे लिए जो हो सकता था, आप कर नहीं पाए। अब कम से कम उन बेटियों को बचा लीजिए, जो अभी भी आपको “चाचा जी” कहकर विश्वास करती हैं।
आपकी वो भतीजी, जो अब सिर्फ एक केस फाइल बनकर रह गई है।
जय हिंद। जय बिहार।
पर बेटियों के लिए भी जय हो… ये आखिरी गुजारिश है।
DGP विनय कुमार को चिट्ठी
माननीय DGP विनय कुमार जी,
सर,
मैं वही लड़की हूं जिसे आपकी पुलिस ने पहले ‘स्लीपिंग पिल्स ओवरडोज’ और ‘सुसाइड’ का लेबल चिपका दिया था।
मैं वही हूं जिसके शरीर पर काटने-नोचने के निशान थे। सेल्फ डिफेंस के सबूत थे। फिर भी आपकी पुलिस ने पहले दिन ही मीडिया में घोषणा कर दी कि कोई बलात्कार नहीं हुआ। लड़की बेहोश थी, अचानक हालत बिगड़ी। यह आत्महत्या है।
वाह सर!
आपकी पुलिस को पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने से पहले ही सब पता था?
या फिर ‘सुशासन’ की इमेज बचाने के लिए झूठ बोलना इतना आसान हो गया है?
अब आपने SIT बना दी।
बहुत अच्छा।
IG जितेंद्र राणा खुद निगरानी कर रहे हैं। हॉस्टल मकान मालिक मनीष रंजन को गिरफ्तार कर लिया। मोबाइल रिकॉर्ड चेक हो रहा है। वीडियो फुटेज देखे जा रहे हैं।
पर सर…
ये सब तो तब हुआ जब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने आपके पहले के बयानों को झूठा साबित कर दिया। जब जनता सड़कों पर उतरी। मीडिया का प्रेशर बढ़ा। तब जाकर आपकी नींद खुली?
मैं पूछना चाहती हूं…
थाना प्रभारी रोशनी ने गलत रिपोर्ट क्यों दी?
ASP और SP ने बिना जांच के “सुसाइड” क्यों घोषित कर दिया?
SSP ने रेप से इनकार क्यों किया? अब SIT बन गई, एक गिरफ्तारी हुई है।
पर सर, ये ‘कार्रवाई’ नहीं, डैमेज कंट्रोल है। ये इंसाफ नहीं, मजबूरी में उठाया गया कदम है।
अगर पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट न आती, तो आज भी मेरा केस “सुसाइड” ही होता।
मेरे मां-बाप को “आत्महत्या” का ठप्पा लगाकर चुप करा दिया जाता।
अब तो आपकी पुलिस ने हद ही कर दी है। मेरे करेक्टर को खंगाला जा रहा है। बॉयफ्रेंड का एंगल खोजा जा रहा है। माता-पिता से बार-बार एक ही सवाल पूछा जा रहा कितने घंटे बात करती थी।
अगर यही जांच करनी है तो मेरी फाइल बंद कर दीजिए सर, मैं समझ जाऊंगी शायद मेरे कातिल को आप पकड़ नहीं सकते।
एक गुजारिश करना चाहती हूं….
मैं मर चुकी हूं। पर आपकी पुलिस की “तत्परता” और “संवेदनशीलता” आज भी जिंदा है- झूठ बोलने और बचाव करने में।
कृपया मेरी मौत को “सामान्य” न बनाइए। कम से कम अगली बेटी के लिए सच बोलिए।
आपकी एक पूर्व छात्रा
जिसे आपकी पुलिस ने पहले “सुसाइड” और अब “केस” बना दिया है।
संवेदना के साथ नहीं—सवालों के साथ जो अब भी अनुत्तरित हैं।
जय बिहार। (पर बेटियों के लिए न्याय कब?)