NEET छात्रा रेप-मौत मामले में CBI ने केस दर्ज करते ही जांच तेज कर दी है। गुरुवार को एजेंसी ने पटना SSP को पत्र लिखकर केस डायरी, CCTV फुटेज, अब तक की जांच रिपोर्ट और सभी संबंधित दस्तावेज और साक्ष्य तलब किए हैं।
बिहार सरकार ने 31 जनवरी को मामले की जांच CBI से कराने की अनुशंसा की थी। अनुशंसा के 12 दिन बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मंजूरी दी। इसके बाद 12 फरवरी को पटना में CBI ने केस दर्ज किया और जांच की जिम्मेदारी ASP पवन कुमार श्रीवास्तव को सौंपी गई।
सबसे पहले पढ़िए पिता का वो बयान, जिसके आधार पर केस दर्ज हुआ था
‘मेरा नाम…, उम्र करीब 51 साल, पिता… साकिन…थाना…जिला जहानाबाद। आज दिनांक 9-01-2026 को समय करीब 14 बजे, कदमकुआं थाने के पुलिस पदाधिकारी के समक्ष अपना बयान अंकित करवा रहा हूं कि दिनांक 5-01-2026 को समय करीब 13 बजे मेरी बेटी….उम्र करीब 18 साल अपने घर से शंभू गर्ल्स हॉस्टल, मुन्नाचक, कंकड़बाग के लिए निकली। हॉस्टल पहुंचकर उसने मुझ से रात करीब 21 बजे फोन से बात की और बताई कि मैं सही सलामत हॉस्टल पहुंच चुकी हूं।
अगले दिन दिनांक 6-01-2026 की शाम को मुझे मेरे दोस्त रंजन कुमार ने फोन कर बताया कि आपकी बच्ची हॉस्टल में बेहोश पड़ी है। हमलोग तुरंत पटना के लिए निकले। तभी हॉस्टल की केयर टेकर नीतू मैम से बात हुई कि आपकी बच्ची को डॉक्टर सहजानंद कंकड़बाग के यहां भर्ती करवाया गया है। यहां से उसको रेफर करने की बात कही जा रही है। इस पर हम लोग अपने परिचित को डॉक्टर सहजानंद के यहां भेजा और वहां से ले आकर प्रभात मेमोरियल हॉस्पिटल राजेंद्र नगर में भर्ती करवा दिया।
हम लोग भी करीब 9 बजे हॉस्पिटल पहुंच गए। दिनांक 6-01-2026 से ही मेरी बच्ची को होश नहीं आ रहा है और न ही वो कुछ बता पाई है। मुझे शक है कि मेरी बेटी के साथ शंभू गर्ल्स हॉस्टल में मारपीट की गई है या उसके साथ कुछ गलत करके शारीरिक संबंध बनाने का प्रयास किया गया। मेरी बेटी के शरीर पर सिर्फ चोट के निशान हैं। मैंने यह बयान पढ़ और पढ़वाकर सुन और समझ लिया है। तभी जाकर अपना हस्ताक्षर किया है।’
अब जानिए CBI कहां से शुरू कर सकती है जांच
पटना पुलिस से केस डायरी और सबूत लेने के बाद केंद्रीय एजेंसी की टीम सबसे पहले नीट छात्रा के परिवार से मिलेगी। पिता, मां, भाई, मामा और परिवार के दूसरे सदस्यों के बयान दर्ज करेगी। इसके लिए टीम जहानाबाद स्थित उनके गांव भी जा सकती है। केस का सीक्वेंस समझने के लिए वहीं से अपनी जांच की शुरुआत कर सकती है। फिर पटना में गर्ल्स हॉस्टल और जिन-जिन हॉस्पिटल में इलाज हुआ, वहां-वहां के डॉक्टरों से मामले की जानकारी लेगी।
इलाज में शामिल डॉक्टर्स और उनकी टीम का बयान दर्ज कर सकती है। इनके अलावा PMCH में पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर से भी टीम बात कर सकती है।
अब जानिए इस पूरे मामले में CBI के सामने क्या चुनौतियां होंगी
1. समय बीतने से साक्ष्य कमजोर होते जा रहे
CBI को सबसे बड़ी चुनौती समय की देरी से मिलेगी। घटना को कई हफ्ते बीत चुके हैं। डिजिटल डेटा ओवरराइट हो सकता है, गवाहों के बयानों में अंतर आ सकता है, फिजिकल साक्ष्य की ताजगी कम हो चुकी है। CBI को अब रीकंस्ट्रक्शन के आधार पर केस बनाना होगा, जो हमेशा मुश्किल होता है।
2. एसआईटी की जांच की कमियों को दूर करना
CBI को SIT की शुरुआती गलतियों के बावजूद केस को दोबारा खड़ा करना होगा। सीन ऑफ क्राइम, सैंपलिंग और टाइमलाइन की खामियों को बचाव पक्ष कोर्ट में हथियार बनाएगा। CBI को यह दिखाना होगा कि नई जांच कैसे निष्पक्ष और वैज्ञानिक है, ताकि पुरानी थ्योरी केस को न डुबो दें।
3. परिवार-गवाहों का भरोसा जीतना
परिवार और कुछ गवाह पहले ही दबाव और डर की बात कह चुके हैं। CBI के लिए जरूरी होगा कि वह गवाहों की सुरक्षा और परिवार का विश्वास बहाल करे। बिना भरोसे के कोई भी गवाह खुलकर बयान नहीं देगा। यह सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती है, सिर्फ कानूनी नहीं।
4. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट और एम्स रिपोर्ट का कंपरीजन
CBI को पोस्टमॉर्टम, FSL और एम्स ओपिनियन सबको साइंटिफिक तरीके से जोड़ना होगा। मेडिकल राय में जरा-सी गड़बड़ी बचाव पक्ष को संदेह का लाभ दे सकती है। यह सबसे तकनीकी और संवेदनशील चुनौती होगी। CCTV, कॉल डिटेल, टावर डंप और मोबाइल डेटा इन सबका टाइम-सिंक जरूरी है। अगर एक भी डेटा सेट मेल नहीं खाया, तो पूरी डिजिटल थ्योरी कमजोर पड़ जाएगी।
1. आत्महत्या थ्योरी पर शुरु से ही लगी रही
SIT की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि उसने शुरुआत से ही केस को आत्महत्या के फ्रेम में देखना शुरू कर दिया। जबकि अस्पताल के शुरुआती संकेत, पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में दर्ज संघर्ष के निशान और बाद में FSL रिपोर्ट इस थ्योरी से मेल नहीं खाते थे। आत्महत्या मान लेने से जांच की दिशा सीमित हो गई और कई अहम साक्ष्य उसी नजरिए से इकट्ठा किए गए।
कानून कहता है कि जब तक सभी संभावनाएं खारिज न हों, किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जाना चाहिए। यहां उल्टा होता दिखाई दिया। निष्कर्ष पहले, जांच बाद में होती रही।
2. DNA को ही निर्णायक मान लेना
SIT ने DNA मिलान को लगभग “फाइनल टेस्ट” मान चल रही थी। 18 सैंपल फेल होने के बाद जांच ठहर सी गई। क्योंकि एसआईटी को लग रहा था कि DNA एक मजबूत साक्ष्य है, इसमें किसी न किसी का सैंपल मैच कर जाएगा और उसी पर मामला खोल दिया जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इससे यह भी पता चल रहा है कि एसआईटी सही संदिग्धों तक पहुंच ही नहीं हुई।
3. अस्पताल से मिले सबूतों को देर से जोड़ना
इलाज के दौरान अस्पताल स्टाफ को यौन हिंसा के संकेत मिले थे। लेकिन SIT ने इन्हें शुरुआती थ्योरी का हिस्सा नहीं बनाया। मेडिकल इनपुट को जांच में देर से शामिल किया गया, जिससे साक्ष्य कमजोर होते गए। इसके बाद पुलिस ने आनन फानन में प्रेस कांफ्रेंस कर दी कि रेप हुआ ही नहीं। बाद में पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने सारे मामले को उलट दिया। अगर अस्पताल से मिले संकेत से ही पुलिस एक्टिव होती तो केस की दिशा कुछ और ही होती।
4. हाॅस्टल के बजाए, परिवार पर लगातार शक
परिवार का आरोप है कि SIT ने बाहरी संदिग्धों की बजाय परिवार और रिश्तेदारों पर ज्यादा फोकस किया। DNA, बार-बार पूछताछ और दबाव की शिकायतों ने जांच की दिशा पर सवाल उठाए। कानून के मुताबिक पीड़ित पक्ष को सहयोगी माना जाता है, न कि प्राथमिक संदिग्ध। इस असंतुलन ने SIT की थ्योरी को कमजोर हो गई।