सुप्रीम कोर्ट बुधवार को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के खिलाफ याचिका पर सुनवाई होनी है। सुनवाई के लिए ममता सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई हैं। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के बाहर बड़ी तादाद में पुलिस फोर्स तैनात है।
बंगाल CM ने अपनी याचिका में बंगाल में चल रहे SIR के तहत वोटर लिस्ट संशोधन को चुनौती दी है। उनका आरोप है कि बंगाल में चल रहा SIR मनमाना है, और चुनावों से पहले बड़े पैमाने पर मतदाताओं को बाहर किए जाने का खतरा है।
ममता की मांग है कि 2026 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव पुरानी सूची के आधार पर ही कराए जाएं। बनर्जी अपने वकीलों के साथ कोर्ट रूम नंबर एक में मौजूद हैं। मंगलवार को उनके नाम पर एक गेट पास जारी किया गया था।
सूत्रों के मुताबिक, LLB डिग्री होल्डर ममता कोर्ट में खुद अपनी दलीलें भी रख सकती हैं। मामला CJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच में है।
इन याचिकाओं में ममता के अलावा मोस्तारी बानू और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सांसद डेरेक ओ ब्रायन और डोला सेन की याचिकाएं भी शामिल हैं।
ममता के पास LLB की डिग्री, आवेदन में कहा- SC के तौर-तरीके समझती हूं
ममता बनर्जी के इलेक्शन एफिडेविट के अनुसार उन्होंने 1979 में कोलकाता यूनिवर्सिटी से MA करने के बाद, जोगेश चंद्र चौधरी कॉलेज (कोलकाता) में LLB कोर्स में एडमिशन लिया था। 1982 में उनका LLB पूरा हो गया था। मुख्यमंत्री ने व्यक्तिगत रूप से पेश होने और बहस करने की अनुमति मांगने के लिए एक अंतरिम आवेदन भी दायर किया है।
अपने आवेदन में ममता ने कहा है कि आर्टिकल 32 रिट में याचिकाकर्ता होने के नाते वह मामले से पूरी तरह वाकिफ हैं। वे कहती हैं कि पश्चिम बंगाल की CM और TMC अध्यक्ष होने के नाते वह SC के तौर-तरीकों को समझती हैं और स्थापित नियमों के अनुसार ही व्यवहार करेंगी।
3 फरवरी : ममता बोली- EC ने 6 पत्रों का जवाब नहीं दिया
इससे पहले ममता ने मंगलवार को दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। उन्होंने कहा कि चुनाव से ठीक पहले SIR क्यों किया जा रहा है? चार राज्य बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम में चुनाव होने हैं। SIR तीन राज्यों में हो रहा है, लेकिन भाजपा-शासित असम में नहीं। क्योंकि वह ‘डबल इंजन’ राज्य है।
ममता बनर्जी ने घुसपैठियों पर कहा कि ये लोग (BJP) घुसपैठियों की बात करते हैं लेकिन ये तो आपकी जिम्मेदारी है। बॉर्डर की रखवाली केंद्र की जिम्मेदारी है। ऐसे में घुसपैठ के लिए वही जिम्मेदार है।
SIR के विरोध में ममता ने 26 कविताओं की किताब लिखी
ममता बनर्जी ने SIR के खिलाफ विरोध का एक अलग तरीका अपनाया है। उन्होंने इस मुद्दे पर आधारित 26 कविताओं की एक किताब लिखी है। दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में मुख्यमंत्री ने दावा किया कि उन्होंने यह किताब यात्रा के दौरान सिर्फ तीन दिनों में लिखी।
उन्होंने कहा कि उनके नाम अब तक 163 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि वह न तो पूर्व सांसद के रूप में पेंशन लेती हैं और न ही मुख्यमंत्री के रूप में वेतन, बल्कि किताबों और अन्य रचनात्मक कार्यों से मिलने वाली रॉयल्टी से अपने निजी खर्च चलाती हैं।
तृणमूल कांग्रेस की संस्थापक ममता बनर्जी साहित्य और कला के क्षेत्र में काफी सक्रिय रही हैं। वह कविता, कहानी, निबंध और राजनीतिक लेखन के साथ-साथ पेंटिंग और गीत लेखन के लिए भी जानी जाती हैं, जिनकी कृतियां देश और विदेश में प्रदर्शित हो चुकी हैं।
2 फरवरी: ममता काला शॉल ओढ़कर मुख्य चुनाव आयुक्त से मिलीं
ममता बनर्जी ने सोमवार को स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के खिलाफ काला शॉल ओढ़कर दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से मुलाकात की थी। उनके साथ SIR प्रभावित 13 परिवार और TMC के नेता भी थे।
चुनाव आयोग के अधिकारियों ने बताया कि ममता ने अपने मुद्दे CEC को बताए लेकिन उनका जवाब सुने बिना ही नाराज होकर चली गईं। मुलाकात के बाद ममता ने कहा, “मैं बहुत दुखी हूं। मैं दिल्ली की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हूं। मैंने आज तक ऐसा अहंकारी और झूठा चुनाव आयुक्त नहीं देखा। वह इस तरह से बात करते हैं जैसे वह जमींदार हों और हम नौकर।
28 जनवरी : ममता ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई थी
ममता बनर्जी ने 28 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। उन्होंने चुनाव आयोग और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को इस मामले में पक्षकार बनाया है।
इससे पहले उन्होंने 3 जनवरी को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पत्र लिखकर SIR को मनमाना और त्रुटिपूर्ण बताते हुए रोकने की मांग की थी।
19 जनवरी : SC बोला- आम लोगों को असुविधा नहीं होनी चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने SIR प्रक्रिया को लेकर निर्देश जारी करते हुए कहा था कि यह प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और आम लोगों को किसी तरह की असुविधा नहीं होनी चाहिए।
कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया था कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ सूची में शामिल मतदाताओं के नाम ग्राम पंचायत भवनों और ब्लॉक कार्यालयों में प्रदर्शित किए जाएं।
कोर्ट ने यह भी नोट किया था कि राज्य में करीब 1.25 करोड़ मतदाता इस सूची में शामिल हैं। इसमें 2002 की मतदाता सूची से तुलना के दौरान माता-पिता के नाम में अंतर या उम्र से जुड़ी विसंगतियां पाई गई हैं।