जापान के पांडा प्रेमियों के लिए यह हफ्ता भावुक करने वाला है। टोक्यो के उएनो चिड़ियाघर में मौजूद आखिरी दो जुड़वां पांडा शाओ शाओ और लेई लेई 27 जनवरी को चीन लौट रहे हैं। इन पांडा पर चीन का मालिकाना हक है।
रविवार को चिड़ियाघर में इन्हें आखिरी बार सार्वजनिक तौर पर दिखाया गया। हजारों लोग आखिरी बार पांडा देखने पहुंचे। चिड़ियाघर ने हर विजिटर को सिर्फ एक मिनट का समय दिया था।
इसके बावजूद लोग पांडा-थीम वाले खिलौनों के साथ पहुंचे, उनके नाम पुकारते रहे और मोबाइल से फोटो-वीडियो बनाते दिखे। कई लोग टिकट न मिलने के बावजूद चिड़ियाघर आए, ताकि इस विदाई के गवाह बन सकें।
इनके जाने के बाद जापान पहली बार पिछले करीब 50 साल में बिना पांडा रह जाएगा। इनकी विदाई के पीछे जापान और चीन के बीच बिगड़ते रिश्ते बड़ी वजह माने जा रहे हैं।
चीन-जापान रिश्तों में क्यों बढ़ी तल्खी
हाल के महीनों में टोक्यो और बीजिंग के रिश्तों में तनाव बढ़ा है। जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची के उस बयान से चीन नाराज है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ताइवान पर चीन की किसी भी कार्रवाई से जापान दखल दे सकता है।
टोक्यो महानगर सरकार की ओर से नए पांडा भेजने के अनुरोध के बावजूद चीन ने साफ कर दिया है कि फिलहाल उएनो चिड़ियाघर में पांडा भेजने की कोई योजना नहीं है।
चीन के सरकारी अखबार बीजिंग डेली ने एक विशेषज्ञ के हवाले से कहा कि अगर तनाव बना रहा तो जापान में भविष्य में पांडा दिखाई ही नहीं देंगे।
जापान में पांडा डिप्लोमेसी पहले भी राजनीति से टकरा चुकी है। 2011 के भूकंप और सुनामी के बाद सेंदाई शहर में पांडा लाने की योजना 2012 के क्षेत्रीय विवाद के बाद रद्द कर दी गई थी।
शाओ शाओ और लेई लेई का जन्म 2021 में उएनो चिड़ियाघर में हुआ था। चीन पांडा दूसरे देशों को उधार देता है, लेकिन उनका मालिकाना हक अपने पास रखता है, यहां तक कि विदेश में जन्मे बच्चों पर भी।
15 साल से पांडा की तस्वीरें ले रहा एक फैन
जापान के एक वेब इंजीनियर ताकाहिरो ताकाउजी की जिंदगी पांडाओं के इर्द-गिर्द घूमती है। उन्होंने 15 साल पहले उएनो चिड़ियाघर में पांडा देखना शुरू किया था। तब से वह रोज चिड़ियाघर जाते रहे और अब तक 1 करोड़ से ज्यादा पांडा तस्वीरें खींच चुके हैं।
आखिरी दर्शन के दौरान उन्होंने एक मिनट में करीब 5,000 तस्वीरें लीं। घर लौटकर उन्होंने इन्हें अपने ब्लॉग ‘एवरी डे पांडास’ पर अपलोड किया। ताकाउजी कहते हैं, “मैंने इन्हें जन्म से देखा है। ये मेरे बच्चों जैसे हैं। कभी नहीं सोचा था कि जापान में पांडा खत्म हो जाएंगे।”
लंबे समय से पांडा देखने वाली मिचिको सेकी ने कहा कि वह पांडा को कूटनीतिक विवादों में फंसा हुआ नहीं देखना चाहतीं। उन्होंने कहा, “पांडा लोगों को सुकून देते हैं। जापान को पांडा चाहिए। उम्मीद है नेता कोई रास्ता निकालेंगे।”
चीन ने जापान को पहली बार 1972 में भेजे थे पांडा
चीन ने 1972 में पहली बार जापान को पांडा भेजे थे। यह तोहफा दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंध सामान्य होने का प्रतीक था।
काले-सफेद पांडा जल्द ही जापान में बेहद लोकप्रिय हो गए और बाद के दशकों में आए पांडा राष्ट्रीय सितारों जैसे माने जाने लगे।
पांडा लंबे समय से चीन की कूटनीति का हिस्सा रहे हैं। 1970 के दशक में चीन ने अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों को भी पांडा तोहफे में दिए थे।
1980 के दशक के बाद चीन ने गिफ्ट की जगह लीज सिस्टम शुरू किया, जिसके तहत विदेशी चिड़ियाघर संरक्षण और रिसर्च के लिए शुल्क देते हैं।
सिर्फ चीन में ही मिलते हैं जाइंट पांडा
जाइंट पांडा दुनिया के सबसे पहचाने जाने वाले जानवरों में से एक हैं, लेकिन कि ये प्राकृतिक रूप से सिर्फ चीन में ही पाए जाते हैं। जंगलों में रहने वाले जाइंट पांडा चीन के अलावा दुनिया के किसी भी देश में नहीं मिलते।
दूसरे देशों के चिड़ियाघरों में दिखने वाले सभी पांडा चीन से लोन पर भेजे जाते हैं और उन पर चीन सरकार का ही नियंत्रण रहता है।
जाइंट पांडा मूल रूप से चीन के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से के निवासी हैं। ये खास तौर पर चीन के कुछ पहाड़ी और घने जंगलों वाले इलाकों में पाए जाते हैं।
इनका प्राकृतिक आवास मुख्य रूप से चीन के तीन प्रांतों सिचुआन, शानक्सी और गांसू तक सीमित है। यहां ऊंचाई वाले बांस के जंगल हैं, जो पांडा के जीवन के लिए जरूरी हैं। जाइंट पांडा भालू परिवार का हिस्सा हैं, लेकिन इनका भोजन लगभग पूरी तरह बांस पर निर्भर है।
कम पोषण वाले बांस से ऊर्जा लेने के लिए पांडा दिन में 10 से 14 किलो तक बांस खाते हैं। इसी वजह से पांडा ऐसे ही इलाकों में रह सकते हैं, जहां सालभर बांस उपलब्ध हो।
पांडा नहीं तो जापान को सैकड़ों करोड़ का नुकसान
पांडा जापान में सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक संपत्ति भी हैं। उएनो इलाके में पांडा से जुड़ा कारोबार बड़े पैमाने पर चलता है। दुकानों, स्टेशन और डिपार्टमेंट स्टोर्स में पांडा थीम वाले सामान बिकते हैं।
कंसाई यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एमेरिटस कात्सुहिरो मियामोतो के मुताबिक, अगर उएनो जू में पांडा नहीं रहे तो जापान को सालाना कम से कम ₹8500 करोड़ का आर्थिक नुकसान हो सकता है।
उन्होंने कहा कि इसका असर सिर्फ जू तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि होटल, रेस्टोरेंट, कैफे और स्मारिका दुकानों तक पहुंचेगा। अगर यह स्थिति कई साल तक बनी रही, तो कुल नुकसान 20 हजार से 50 हजार करोड़ तक पहुंच सकता है।
इसका उदाहरण 2008 में देखने को मिला था। उस साल पांडा लिंग लिंग की मौत के बाद उएनो जू एक साल तक पांडा-विहीन रहा। उसी वित्तीय वर्ष में जू में आने वाले विजिटर्स की संख्या 60 साल में पहली बार 30 लाख से नीचे गिर गई थी।