दावा-खामेनेई के बेटे बन सकते हैं ईरान के सुप्रीम लीडर:2 साल से सत्ता संभालने की ट्रेनिंग ले रहे थे; आखिरी फैसला 88 मौलवी करेंगे

अमेरिका-इजराइल के हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि उनकी जगह कौन लेगा। यह सवाल इसलिए भी, क्योंकि ईरान का सुप्रीम लीडर राष्ट्रपति से भी ज्यादा ताकतवर होता है।

ईरान ने अभी नए सुप्रीम लीडर के बारे में कुछ नहीं कहा है, लेकिन सरकारी मीडिया ‘फार्स’ समेत कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उनके बेटे मुजतबा खामेनेई इस पद पर चुने जा सकते हैं। उन्हें पिछले 2 साल से सुप्रीम लीडर बनाने की तैयारी चल रही थी।

ईरान में सुप्रीम लीडर को ‘रहबर’ कहा जाता है। ‘रहबर’ का मतलब है, मार्गदर्शक या रास्ता दिखाने वाला। 88 मौलवियों की असेंबली सुप्रीम लीडर का चुनाव करती है।

दुनिया में ईरान और वेटिकन सिटी ही ऐसे देश हैं जहां धार्मिक नेता सबसे ज्यादा ताकतवर हैं। ईरान में सुप्रीम लीडर का दर्जा ठीक वैसा ही है, जैसा वेटिकन में पोप को हासिल है।

खामेनेई ने बीमार होने पर मुजतबा को उत्तराधिकारी बनाया था

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई ने अपने दूसरे बेटे मुजतबा खामेनेई को साल 2024 में उत्तराधिकारी बनाया था। खामेनेई ने बीमारी के चलते यह फैसला लिया था। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान की एक्सपर्ट असेंबली ने 26 सितंबर 2024 को ही नए सुप्रीम लीडर का चुनाव कर लिया था। खामेनेई ने असेंबली के 60 सदस्यों को बुलाकर गोपनीय तरीके से उत्तराधिकारी पर फैसला लेने कहा था।

खामेनेई की मौत के बाद अब मुजतबा सार्वजनिक रूप से सुप्रीम लीडर के दावेदार के तौर पर सामने आ सकते हैं।

इस्लामिक मामलों के जानकार हैं मुजतबा खामेनेई

मुजतबा अपने पिता की तरह ही इस्लामिक मामलों के जानकार हैं। वे पहली बार 2009 में दुनिया की नजरों में आए। उन्होंने ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों को सख्ती से कुचला, जिसमें कई लोग मारे गए। तब राष्ट्रपति चुनाव में कट्टरपंथी नेता महमूद अहमदीनेजाद को सुधारवादी नेता मीर होसैन मौसवी पर जीत मिली थी।

सुधारवादी नेताओं ने दावा किया कि चुनाव में भारी पैमाने पर गड़बड़ी हुई है। इसके बाद लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे। इसे ‘ईरानी ग्रीन मूवमेंट’ का नाम दिया गया। यह दो साल तक चला, लेकिन ईरानी सरकार ने इसे बल प्रयोग करके दबा दिया था। कहा गया था कि इसके पीछे मुजतबा खामेनेई का दिमाग है।

किसी पद पर नहीं थे मुजतबा, भाषण भी नहीं देते

मुजतबा के सरकार में किसी पद पर न होने के बाद भी जरूरी फैसलों में लगातार उनकी भागीदारी बढ़ती देखी गई। रिपोर्ट के मुताबिक मुजतबा एक रहस्यमयी शख्स हैं। वह बहुत कम अवसरों पर नजर आते हैं। वे पिता की तरह सार्वजनिक भाषण नहीं देते।

कहा जाता है कि ईरान की खुफिया और दूसरी सरकारी एजेंसियों में मुजतबा के लोग बैठे हुए हैं। ईरान में इब्राहिम रईसी के राष्ट्रपति बनने के बाद मुजतबा का कद काफी बढ़ गया था। मुजतबा को रईसी के उत्तराधिकारी यानी कि ईरान के राष्ट्रपति पद के लिए तैयार किया जा रहा था, लेकिन रईसी की मौत के बाद इसमें बदलाव आ गया।

ईरान में 5 सबसे ताकतवर लोग और संस्थाएं

i. रहबर: ईरान में रहबर देश की सरकार, सेना, समाज और विदेश नीति पर फैसला करते हैं। वे सभी सेनाओं के कमांडर‑इन‑चीफ भी होते हैं। अब तक सिर्फ दो लोग इस पद पर आए हैं। खामेनेई 37 साल से रहबर थे। ईरान में रहबर, असेंबली, गार्डियन काउंसिल, राष्ट्रपति और संसद मिलकर देश चलाते हैं। लेकिन असली ताकत हमेशा रहबर के पास रहती है।

ii. असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स: इसमें 88 धर्मगुरु होते हैं। जनता हर 8 साल में इनके सदस्यों का चुनाव करती है। यह असेंबली रहबर को चुनती है और उनके काम पर नजर रखती है। अगर रहबर ठीक से काम न करें, तो उन्हें हटा भी सकती है।

iii. राष्ट्रपति: राष्ट्रपति देश का दूसरा सबसे ताकतवर नेता होता है। वे सरकार चलाते हैं और विदेश नीति में मदद करते हैं, लेकिन आखिरी फैसला हमेशा रहबर का होता है। राष्ट्रपति बनने के लिए गार्डियन काउंसिल की मंजूरी जरूरी होती है।

iv. गार्डियन काउंसिल: इसमें 6 धर्मगुरु और 6 जज होते हैं। हर 6 साल में रहबर इन्हें चुनते हैं। यह काउंसिल संसद के बनाए कानूनों को रोक भी सकती है।

v. संसद: इसमें 290 सदस्य होते हैं, जिन्हें जनता हर 4 साल में चुनती है। संसद कानून बनाती है, बजट पास करती है और जरूरत पड़ने पर राष्ट्रपति या मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है।

अब मारे गए सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के बारे में जानिए…

अयातुल्ला अली खामेनेई का जन्म 19 अप्रैल 1939 को ईरान के धार्मिक शहर मशहद में एक मौलवी परिवार में हुआ था। वे रेजा शाह पहलवी की नीतियों के खिलाफ थे और इस्लामी शासन की वकालत करते थे।

1963 में शाह के खिलाफ भाषण देने पर उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। धीरे-धीरे वे सरकार विरोधी आंदोलन का बड़ा चेहरा बन गए और खोमैनी के भरोसेमंद सहयोगी माने जाने लगे।

1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई और शाह की सरकार गिर गई। खोमैनी देश लौटे और नई इस्लामिक सरकार बनाई। खामेनेई को क्रांतिकारी परिषद में जगह मिली और बाद में उप रक्षामंत्री बनाया गया।

1981 में तेहरान की एक मस्जिद में भाषण के दौरान खामेनेई पर बम हमला हुआ। उसी साल एक और बम धमाके में तत्कालीन राष्ट्रपति की मौत हो गई। इसके बाद हुए चुनाव में खामेनेई भारी बहुमत से जीतकर ईरान के तीसरे राष्ट्रपति बने।

1989 में खोमैनी के निधन के बाद खामेनेई को देश का सर्वोच्च नेता यानी ‘रहबर’ बनाया गया। इसके लिए संविधान में बदलाव भी किया गया। समर्थक उन्हें इस्लामी व्यवस्था का मजबूत रक्षक मानते हैं, जबकि आलोचक उन पर सख्त और कट्टर शासन चलाने का आरोप लगाते हैं।

37 साल से ईरान की सर्वोच्च सत्ता पर काबिज थे खामेनेई

आयतुल्ला अली खामेनेई 1989 में रुहोल्लाह खुमैनी के निधन के बाद से ईरान के सर्वोच्च नेता के पद पर काबिज थे। ईरान में 1979 की इस्लामी क्रांति के दौरान, जब शाह मोहम्मद रजा पहलवी को हटाया गया तो खामेनेई ने क्रांति में बड़ी भूमिका निभाई थी।

इस्लामिक क्रांति के बाद खामेनेई को 1981 में राष्ट्रपति बनाया गया। वह 8 साल तक इस पद पर रहे। 1989 में ईरान के सुप्रीम लीडर खुमैनी की मौत के बाद उन्हें उत्तराधिकारी बनाया गया था।

अब जानकारी इन मुद्दों की, जो ईरान और इजराइल के बीच जंग की वजह बने

न्यूक्लियर प्रोग्राम: अमेरिका को शक है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर सकता है। इसी वजह से उसने कई बार उस पर पाबंदियां लगाईं। ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम सिर्फ बिजली बनाने और वैज्ञानिक रिसर्च के लिए है, हथियार बनाने के लिए नहीं।

बैलिस्टिक मिसाइल मुद्दा: परमाणु समझौते की बातचीत में ईरान का मिसाइल प्रोग्राम सबसे बड़ा अड़ंगा बना हुआ है। ईरान साफ कहता है कि उसकी बैलिस्टिक मिसाइलें उसकी सुरक्षा के लिए जरूरी हैं और इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं होगा। वह इसे अपनी “रेड लाइन” मानता है।

इजराइल को लेकर टकराव: अमेरिका, इजराइल का सबसे बड़ा समर्थक है। वहीं ईरान इजराइल का खुलकर विरोध करता है और उस पर क्षेत्र में अस्थिरता फैलाने का आरोप लगाता है। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ जाता है।

मिडिल ईस्ट में दखल: अमेरिका का आरोप है कि ईरान इराक, सीरिया, लेबनान और यमन जैसे देशों में अपने समर्थक गुटों को मदद देकर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। ईरान कहता है कि वह अपने हितों और सहयोगियों की रक्षा कर रहा है।

आर्थिक पाबंदियां: अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा है। इसके जवाब में ईरान भी कभी अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज करने या सख्त बयान देने जैसे कदम उठाता है।

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