चित्तौड़गढ़ (मेवाड़) के कृष्णधाम श्रीसांवलियाजी सेठ मंदिर में भंडार की गिनती का छठा राउंड मंगलवार को पूरा हुआ।
दानपात्र और भंडार से 1 करोड़ 95 लाख 27 हजार रुपए की गिनती की गई। छह राउंड की गिनती में कुल 36 करोड़ 49 लाख 82 हजार रुपए का चढ़ावा आया है।
मंदिर प्रशासन के अनुसार, बुधवार को होने वाला सातवां राउंड संभवतः अंतिम राउंड होगा। इसमें चिल्लर, ऑनलाइन दान और सोने-चांदी के गहनों समेत अन्य आइटम्स का तौल किया जाएगा।
अब जानिए- हर राउंड में कितनी नकदी मिली
- 2 मार्च को भंडार खुला : ठाकुरजी का भंडार 2 मार्च को करीब डेढ़ महीने बाद खोला गया था। पहले राउंड की गिनती में कुल 10 करोड़ 65 लाख रुपए प्राप्त हुए।
- दूसरे राउंड में 7.25 करोड़ रुपए निकले: 3 मार्च को चंद्र ग्रहण व सूतक और 4 मार्च को फूलडोल महोत्सव के कारण गिनती नहीं की गई। 5 मार्च को दूसरे राउंड में कुल 7 करोड़ 25 लाख 80 हजार रुपए की राशि मिली।
- तीसरे राउंड में 2.61 करोड़: 6 मार्च को तीसरे राउंड में भंडार से 2 करोड़ 61 लाख 75 हजार रुपए की गिनती हुई।
- चौथे राउंड में 8.55 करोड़: 7 मार्च को चौथे राउंड में कुल 8 करोड़ 55 लाख 55 हजार रुपए की गिनती हुई।
- पांचवें राउंड में 5.47 करोड़: 8 मार्च को रविवार होने के कारण काउंटिंग नहीं हुई। 9 मार्च पांचवें राउंड में कुल 5 करोड़ 47 लाख 45 हजार रुपए की गिनती सामने आई।
- छठे राउंड में 1.95 करोड़ निकले: मंगलवार को छठे राउंड में 1 करोड़ 95 लाख 27 हजार रुपए की राशि की गिनती हुई।
पिछले साल नवंबर में बना था सर्वाधिक चढ़ावे का रिकॉर्ड
मंदिर प्रशासन का कहना है कि नवंबर, 2025 में खोले गए भंडार के दौरान 51 करोड़ 27 लाख 30 हजार 112 रुपए चढ़ावा आया था। मंदिर के इतिहास में यह पहली बार था, जब भंडार ने 51 करोड़ का आंकड़ा पार किया।
चबूतरे पर होती थी मूर्तियों की पूजा
40 साल तक बागुंड के प्राकट्य स्थल पर ही एक चबूतरे पर तीनों मूर्तियों की पूजा की जाती रही। इसके बाद फिर भादसोड़ा के ग्रामीण एक मूर्ति को अपने गांव ले आए और एक केलुपोश मकान में स्थापित कर दिया। वहीं, एक मूर्ति मंडफिया लाई गई थी। तंवर बताते हैं- इन्हीं मूर्तियों में से एक मूर्ति के सीने पर पैर का निशान था। मान्यता है कि यह भृगु ऋषि के पैर हैं।
अब पढ़िए- भृगु ऋषि से जुड़ी मान्यता
इस मूर्ति पर जो चरण चिह्न है, उसके पीछे एक कथा है। कथा के अनुसार, एक बार सभी ऋषियों ने मिलकर एक यज्ञ किया। विचार किया कि इस यज्ञ का फल ब्रह्मा, विष्णु या महेश, इनमें से किसे दिया जाए।
निर्णय के लिए भृगु ऋषि को चुना गया। वे सबसे पहले भगवान विष्णु के पास पहुंचे, जो उस समय निंद्रा में थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं।
भृगु ऋषि को यह लगा कि भगवान विष्णु उन्हें देखकर भी सोने का बहाना कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने क्रोधित होकर भगवान विष्णु के सीने पर लात मार दी।
भगवान तुरंत उठे और ऋषि के पैर पकड़ लिए, क्षमा मांगते हुए बोले- मेरा शरीर कठोर है, कहीं आपके कोमल चरणों को चोट तो नहीं आई? भगवान की यह विनम्रता और सहनशीलता देखकर भृगु ऋषि ने उन्हें त्रिदेवों में श्रेष्ठ माना और यज्ञ का फल उन्हें ही समर्पित किया।