सर्बिया में छात्र संगठनों ने चुनाव जीता:पुतिन समर्थक PM पद के उम्मीदवार वुचिच हारे; देश में 2 साल से प्रदर्शन चल रहे

सर्बिया में छात्र संगठनों के गठबंधन ‘स्टूडेंट लिस्ट’ ने चुनाव जीत लिया है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन के करीबी पूर्व राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुचिच की पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है। वे PM पद के उम्मीदवार थे। उन्होंने सितंबर में ही राष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया था।

वुचिच के मुताबिक, छात्र गठबंधन को संसद की 250 में से कम से कम 135 सीटें मिली हैं। वहीं, वुचिच की पार्टी को करीब 105 सीटें मिलने का अनुमान है।

छात्र गठबंधन को करीब 22 लाख वोट और वुचिच की पार्टी को 17.2 लाख वोट मिले। अंतिम आधिकारिक नतीजे अभी घोषित नहीं हुए हैं।

छात्र संगठन पिछले 2 साल से सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। उनका आरोप था कि भ्रष्टाचार और तानाशाही की सरकार चल रही है।

बेलग्रेड में हजारों लोग जश्न मनाने सड़कों पर उतरे

वुचिच के हार मानने के बाद राजधानी बेलग्रेड समेत कई शहरों में लोगों ने जश्न मनाया। हजारों लोग सड़कों पर आ गए। लोगों ने सर्बिया के झंडे लहराए, गाड़ियों के हॉर्न बजाए और पटाखे फोड़े। जश्न मनाने वालों में बड़ी संख्या युवाओं की थी।

चुनाव में करीब 70% लोगों ने वोट डाले। 1992 में यूगोस्लाविया के टूटने के बाद से यह सबसे ज्यादा मतदान वाले चुनावों में से एक माना जा रहा है।

16 लोगों की मौत के बाद शुरू हुआ था आंदोलन

नवंबर 2024 में सर्बिया के नोवी साद शहर के रेलवे स्टेशन की छतरी गिर गई थी। इस हादसे में 16 लोगों की मौत हो गई थी। इसके बाद छात्रों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया। छात्रों ने निर्माण कार्य में भ्रष्टाचार और हादसे के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई नहीं होने को लेकर सवाल उठाए।

धीरे-धीरे आंदोलन बढ़ता गया। छात्र सरकार पर भ्रष्टाचार और सत्ता का गलत इस्तेमाल करने के आरोप लगाने लगे।

वुचिच पहले PM, फिर राष्ट्रपति बने; अब दोबारा PM बनना चाहते थे

अलेक्जेंडर वुचिच 2014 से 2017 तक सर्बिया के प्रधानमंत्री रहे। 2017 में राष्ट्रपति बने और 2022 में दूसरी बार यह पद जीता। सर्बिया के संविधान के मुताबिक, कोई व्यक्ति दो बार ही राष्ट्रपति बन सकता है। इसलिए वुचिच तीसरी बार इस पद के लिए चुनाव नहीं लड़ सकते थे।

उनका दूसरा कार्यकाल 2027 में खत्म होना था, लेकिन उन्होंने सितंबर 2026 में ही राष्ट्रपति पद छोड़ दिया। इसके बाद वे संसदीय चुनाव के जरिए फिर से सरकार की कमान संभालना चाहते थे। उनकी पार्टी सर्बियन प्रोग्रेसिव पार्टी (SNS) ने उन्हें प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था।

सर्बिया में राष्ट्रपति देश के प्रमुख होते हैं, जबकि प्रधानमंत्री सरकार चलाते हैं। राष्ट्रपति पद पर दो कार्यकाल पूरे करने के बाद भी वुचिच प्रधानमंत्री बन सकते थे। इसी रास्ते से वे सत्ता में बने रहना चाहते थे।

वुचिच पर मिलोशेविच की राह पर चलने का आरोप

अलेक्जेंडर वुचिच ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत स्लोबोदान मिलोशेविच की सरकार में सूचना मंत्री के तौर पर की थी। उस समय वुचिच कट्टर राष्ट्रवादी विचारों के समर्थक थे। वे ‘ग्रेटर सर्बिया’ बनाने की सोच का भी समर्थन करते थे।

इसका मतलब था ऐसा बड़ा सर्बियाई देश बनाना, जिसमें मौजूदा सर्बिया के अलावा पड़ोसी देशों के उन इलाकों को भी शामिल किया जाए, जहां सर्ब समुदाय के लोग रहते हैं।

समय के साथ वुचिच के राजनीतिक रुख में बदलाव आया, लेकिन उनके विरोधियों का आरोप है कि उन्होंने सत्ता पर अपनी पकड़ मजबूत रखने के लिए मिलोशेविच जैसे तरीके अपनाए।

मिलोशेविच 1990 के दशक में बाल्कन क्षेत्र के प्रमुख राष्ट्रवादी नेताओं में से एक थे। उनके शासन के दौरान पड़ोसी देशों के साथ तनाव बढ़ा और सरकार की आलोचना करने वालों पर दबाव डालने के आरोप लगे। वुचिच के विरोधी उनके काम करने के तरीके की तुलना इसी दौर से करते हैं।

छात्र संगठनों के सामने अब नई सरकार बनाने की चुनौती

चुनाव में जीत के बाद छात्र गठबंधन के सामने अब सरकार बनाने की चुनौती होगी। शुरुआती नतीजों के मुताबिक, गठबंधन को संसद में बहुमत मिल सकता है। हालांकि, सरकार बनाने की प्रक्रिया आधिकारिक नतीजे आने और आगे की राजनीतिक बातचीत के बाद ही पूरी होगी।

छात्र नेताओं ने भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करने, सरकारी कामकाज में सुधार लाने और कानून के हिसाब से व्यवस्था चलाने का वादा किया है। अब देखना होगा कि नई सरकार इन वादों को कैसे पूरा करती है। यूरोपीय संघ की भी सर्बिया में कानून का पालन, मीडिया की आजादी और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने जैसे मुद्दों पर नजर रहेगी।

विदेश नीति में बड़े बदलाव की संभावना कम

वुचिच की हार के बाद भी सर्बिया के रूस और यूरोपीय संघ से रिश्तों में बड़े बदलाव की संभावना कम है। कोसोवो को लेकर भी नई सरकार का रुख पहले जैसा रह सकता है।

कोसोवो ने 2008 में सर्बिया से अलग होकर खुद को स्वतंत्र देश घोषित किया था। लेकिन सर्बिया उसे आज भी अलग देश नहीं मानता। इस मुद्दे पर दोनों के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है।

यूरोपीय संघ में शामिल होने की प्रक्रिया तेज करने की मांग करने वाली ‘यूरोपियन सर्बिया’ पार्टी को चुनाव में 3% वोट भी नहीं मिले। संसद में जगह पाने के लिए पार्टी को कम से कम इतने वोट हासिल करना जरूरी था।

इससे पता चलता है कि चुनाव में यूरोपीय संघ में शामिल होने का मुद्दा सबसे बड़ा नहीं रहा। अब देखना होगा कि नई सरकार रूस और कोसोवो के साथ रिश्तों को लेकर क्या रुख अपनाती है।