बिहार के गंडक, कोसी और इंद्रपुरी बैराज तीनों का रोल अलग-अलग है। गंडक और कोसी बैराज इंटरनेशनल रिवर मैनेजमेंट और इरीगेशन के लिहाज से बहुत जरूरी है, जबकि इंद्रपुरी बैराज बिहार के दक्षिण-पश्चिम हिस्से के इरीगेशन व्यवस्था का रीढ़ माना जाता है।
बिहार की नदियां जहां प्रदेश की खेती और जल संसाधनों की सबसे बड़ी ताकत हैं, वहीं मानसून के दौरान यही नदियां बाढ़ का बड़ा कारण भी बनती हैं। नदियों के पानी को कंट्रोल करने, इरीगेशन के लिए नहरों में पानी पहुंचाने और बाढ़ के समय बहाव को व्यवस्थित करने में राज्य के बड़े बैराजों की बहुत बड़ी भूमिका है।
इनमें पश्चिम चंपारण का वाल्मीकिनगर गंडक बैराज, सुपौल में स्थित कोसी जिसे नेपाल में भीमनगर/वीरपुर बैराज कहा जाता है। इसके अलावा रोहतास का इंद्रपुरी बैराज सबसे जरूरी स्ट्रक्च में शामिल है।
तीनों बैराज अलग-अलग नदियों पर बने हैं और इनकी अपनी अलग इंजीनियरिंग, इतिहास और उपयोगिता है। बिहार जल संसाधन विभाग के वर्तमान रिकॉर्ड के अनुसार तीनों की डिजाइन डिस्चार्ज क्षमता को जोड़ें तो यह करीब 32.58 लाख क्यूसेक होती है। इसमें इंद्रपुरी की डिजाइन क्षमता 14.58 लाख, कोसी की 9.50 लाख और गंडक की 8.50 लाख क्यूसेक है।
गंडक बैराज
38,850 वर्ग KM का है गंडक बैराज
गंडक बैराज बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के वाल्मीकिनगर में भारत-नेपाल बॉर्डर पर मौजूद है। नेपाल में इसे नारायणी नदी के नाम से भी जाना जाता है। बैराज के ऊपरी हिस्से में नेपाल का त्रिवेणी क्षेत्र है, जहां से गंडक का पानी बिहार में प्रवेश करता है। नदी का बड़ा हिस्सा नेपाल में होने के कारण वहां होने वाली भारी बारिश और बाढ़ का सीधा असर गंडक बैराज पर पड़ता है।
बिहार जल संसाधन विभाग के अनुसार, वाल्मीकिनगर गंडक बैराज का जलग्रहण क्षेत्र करीब 38,850 वर्ग किलोमीटर है। बैराज की डिजाइन डिस्चार्ज क्षमता 8.50 लाख क्यूसेक है और इसमें नदी के ऊपर कुल 36 गेट हैं। इनमें 18 स्पिलवे गेट, छह पूर्वी अंडरस्लूइस और छह पश्चिमी अंडरस्लूइस गेट शामिल हैं।
कब बना था गंडक प्रोजेक्ट?
गंडक बैराज भारत-नेपाल की साझा गंडक परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दोनों देशों की सरकारों के बीच दिसंबर 1959 में गंडक नदी से संबंधित समझौता हुआ था। बाद में 1964 में इसमें संशोधन किए गए, ताकि नेपाल के नदी संबंधी अधिकारों की भी सुरक्षा हो सके।
इसी व्यवस्था के तहत वाल्मीकिनगर में गंडक बैराज का निर्माण 1968-69 में किया गया। इसका उद्देश्य बिहार, उत्तर प्रदेश और नेपाल में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना था।
गंडक बैराज की डिजाइन डिस्चार्ज क्षमता 8.50 लाख क्यूसेक है। बिहार जल संसाधन विभाग के रियल टाइम डैशबोर्ड पर भी यही क्षमता दर्ज है। इसका मतलब यह नहीं है कि बैराज 8.50 लाख क्यूसेक पानी को रोककर रख सकता है। टेक्निकल रूप से यह उसकी मैक्सिमम डिजाइन पासिंग/डिस्चार्ज क्षमता है। पानी का दबाव बढ़ने पर फाटकों को खोलकर उसे डाउनस्ट्रीम की ओर भेजा जाता है।
गंडक बैराज की भूमिका सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। यह भारत और नेपाल के बीच जल सहयोग का भी महत्वपूर्ण उदाहरण है।
गंडक की नहरें कितनी जरूरी?
बैराज से पानी को अलग-अलग कैनल सिस्टम के जरिए खेतों तक पहुंचाया जाता है। पूर्वी गंडक नहर प्रणाली बिहार के लिए विशेष रूप से जरूरी है। गंडक प्रोजेक्ट के तहत नेपाल और भारत के क्षेत्रों को भी सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है।
बैराज पर पानी की मात्रा बढ़ने के साथ नहरों और डाउनस्ट्रीम क्षेत्र में पानी के प्रवाह की निगरानी भी जरूरी हो जाती है। खासकर मानसून के दौरान नेपाल में भारी बारिश होने पर वाल्मीकिनगर बैराज पर अधिकारियों की नजर बनी रहती है।
बाढ़ के समय क्यों बढ़ जाती है अहमियत?
गंडक बैराज के मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नदी का जलग्रहण क्षेत्र नेपाल तक फैला हुआ है। नेपाल में भारी बारिश होने पर नदी का डिस्चार्ज अचानक बढ़ सकता है। ऐसे समय बैराज के गेटों का संचालन, डाउनस्ट्रीम नदी की स्थिति और तटबंधों की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।
बिहार में बाढ़ प्रबंधन के लिहाज से गंडक बैराज इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि इसके नीचे की ओर पश्चिमी चंपारण, गोपालगंज, सारण, वैशाली और आगे गंगा के क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं।
36 फाटक क्यों जरूरी हैं?
1. पानी का बहाव नियंत्रित करते हैं- गंडक में पानी बढ़ने पर जरूरत के अनुसार फाटक खोले या बंद किए जाते हैं। इससे डाउनस्ट्रीम में जाने वाले पानी की मात्रा को कंट्रोल किया जाता है।
2. नेपाल से आने वाले पानी का पहला बड़ा कंट्रोल पॉइंट- गंडक बैराज भारत-नेपाल सीमा के पास है। नेपाल के ऊपरी इलाकों में भारी बारिश होने पर नदी में अचानक पानी बढ़ सकता है। ऐसे में बैराज के 36 फाटक पानी के बहाव को संभालने में इंपॉर्टेंट रोल निभाते हैं।
3. बाढ़ का खतरा तय करने में अहम- कितने फाटक खुले हैं और उनसे कितना पानी छोड़ा जा रहा है, इसका सीधा असर पश्चिम चंपारण, गोपालगंज, सारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली समेत गंडक के निचले इलाकों पर पड़ सकता है।
हालांकि, बाढ़ का असर सिर्फ गेटों की संख्या से तय नहीं होता; नदी का प्राकृतिक बहाव, तटबंध और स्थानीय जलस्तर भी जरूरी होते हैं।
4. ज्यादा पानी आने पर दबाव कम करते हैं – अगर ऊपर से लगातार बहुत ज्यादा पानी आ रहा हो, तो बैराज में पानी रोककर रखना जोखिम बढ़ा सकता है। ऐसे में फाटक खोलकर पानी को नीचे की ओर निकाला जाता है।
5. इरीगेशन के लिए भी जरूरी- गंडक बैराज केवल बाढ़ नियंत्रण के लिए नहीं है। इसके जरिए नहरों में पानी पहुंचाकर बिहार और उत्तर प्रदेश के बड़े इलाके में सिंचाई की जाती है।
नेपाल में बाढ़ के बाद कैसे बढ़ा डिस्चार्ज?
26 अगस्त को नेपाल के भोटेकोशी-त्रिशूली-नारायणी नदी तंत्र में आई बाढ़ ने गंडक बेसिन को प्रभावित किया। 26 अगस्त की दोपहर करीब 12 बजे वाल्मीकिनगर बैराज पर डिस्चार्ज करीब 86 हजार क्यूसेक था और बढ़ने की प्रवृत्ति में था। अधिकारियों के अनुसार, नेपाल के देवघाट गेज पर पानी बढ़ने के बाद उसे वाल्मीकिनगर पहुंचने में करीब 3.5 से 4 घंटे लगने का अनुमान था।
इसके बाद 26 अगस्त की रात तक बैराज से डिस्चार्ज करीब 1.50 से 1.52 लाख क्यूसेक तक पहुंच गया। यानी कुछ ही घंटों में बहाव लगभग दोगुना हो गया।
27 अगस्त की सुबह पानी घटकर करीब 99,800 क्यूसेक हो गया, लेकिन दिन में फिर करीब 1.04 लाख क्यूसेक तक पहुंचा। 28 अगस्त की सुबह 6 बजे भी डिस्चार्ज 99,800 क्यूसेक दर्ज किया गया था। इसके बाद दोपहर 2 बजे यह बढ़कर 1,02,100 क्यूसेक हो गया।
विभागीय डैशबोर्ड के मुताबिक, यह 2026 में दर्ज अधिकतम 2.24 लाख क्यूसेक के करीब 45.6% और 2003 के ऐतिहासिक अधिकतम 6,39,750 क्यूसेक का करीब 16% था।
बता दें कि फिलहाल, 9 सितंबर 2026 के अनुसार बगहा में गंडक बैराज में 89 हजार 2400 क्यूसेक पानी छोड़ा गया है।
गंडक का पानी कहां तक असर डाल सकता है?
गंडक के डाउनस्ट्रीम में सबसे पहले पश्चिमी चंपारण, फिर गोपालगंज और आगे गंडक के प्रभाव क्षेत्र में आने वाले हिस्से संवेदनशील होते हैं। नदी का प्रभाव सारण क्षेत्र तक भी पहुंचता है।
जल संसाधन विभाग की 2026 की कटाव-रोधी कार्यों की लिस्ट में पश्चिमी चंपारण के भीतहा, ठकराहा, पिपरासी, मधुबनी और गोपालगंज के सदर और बैकुंठपुर क्षेत्र में गंडक से जुड़े कटाव-रोधी कार्य दर्ज हैं।
इससे स्पष्ट है कि खतरा सिर्फ बैराज के आसपास तक सीमित नहीं है। नदी नीचे की ओर जहां मोड़ लेती है, जहां तेज धारा सीधे तट से टकराती है और जहां पहले कटाव हो चुका है, वहां खतरा अधिक हो सकता है।
कोसी बैराज
कोसी बैराज जिसे ‘बिहार का शोक’ कहा जाता है
अगर बिहार में किसी नदी का नाम बाढ़ और तबाही से सबसे ज्यादा जोड़ा जाता है तो वह कोसी है। इसी वजह से कोसी को लंबे समय से ‘बिहार का शोक’ कहा जाता रहा है।
कोसी का बैराज भारत में नहीं, बल्कि नेपाल के क्षेत्र में भीमनगर के पास बनाया गया है। इसका संचालन और रखरखाव भारत की ओर से किया जाता है। बिहार जल संसाधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार बैराज की लंबाई करीब 1,149 मीटर है और इसमें कुल 56 गेट हैं। इसकी डिजाइन डिस्चार्ज क्षमता 9.50 लाख क्यूसेक है। इसका जलग्रहण क्षेत्र करीब 93,355 वर्ग किलोमीटर है।
कोसी बैराज की नींव क्यों पड़ी?
कोसी नदी का इतिहास बार-बार बदलते रास्ते और विनाशकारी बाढ़ से जुड़ा रहा है। 1954 में बिहार में कोसी की भयंकर बाढ़ के बाद नदी को कंट्रोल करने के लिए भारत और नेपाल के बीच समझौते की दिशा में काम हुआ।
25 अप्रैल 1954 को भारत और नेपाल के बीच कोसी समझौता हुआ। इसके बाद कोसी परियोजना के तहत बैराज और तटबंधों के निर्माण की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
कोसी बैराज का निर्माण 1958 से 1962 के बीच हुआ और इसे 1960 के दशक की शुरुआत में प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में उपयोग में लाया गया। उपलब्ध टेक्निकल रिसोर्स में इसे 1963-64 के आसपास औपचारिक रूप से शुरू किए जाने का उल्लेख मिलता है।
इसका मकसद सिर्फ बाढ़ नियंत्रण नहीं था। इसके साथ इरीगेशन, बिजली उत्पादन और नदी के प्रवाह को नियंत्रित करने की योजना भी जुड़ी थी। इसके साथ कोसी की दोनों तरफ विशाल तटबंध बनाए गए। पूर्वी कोसी तटबंध और पश्चिमी कोसी तटबंध का उद्देश्य नदी को एक निर्धारित चैनल के अंदर रखना और आसपास के इलाकों को बाढ़ से सुरक्षा देना था।
56 फाटक और 9.50 लाख क्यूसेक की डिजाइन क्षमता
वीरपुर कोसी बराज में 56 फाटक हैं। इनमें 46 स्पिलवे गेट, छह पूर्वी अंडरस्लूइस और चार पश्चिमी अंडरस्लूइस गेट हैं। इसके अलावा पूर्वी और पश्चिमी हेड रेगुलेटर की अलग व्यवस्था है। बैराज को करीब 9.50 लाख क्यूसेक तक के डिजाइन डिस्चार्ज को संभालने के हिसाब से तैयार किया गया है। हालांकि, नदी में वास्तविक पानी की मात्रा मौसम, बारिश और ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र की परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
2026 के मानसून में कोसी बैराज से करीब 2.06 लाख क्यूसेक तक पानी छोड़ा गया। हालांकि बैराज से अब तक का मैक्सिमम 7.88 लाख क्यूसेक डिस्चार्ज 5 अक्टूबर 1968 को दर्ज किया गया था।
पानी का असर कहां?
कोसी बराज से निकलने वाला पानी सबसे पहले सुपौल, फिर सहरसा और मधेपुरा के नदी किनारे और निचले इलाकों को प्रभावित कर सकता है। आगे नदी का प्रवाह खगड़िया और कटिहार के कुरसेला क्षेत्र की ओर जाता है।
26 अगस्त के फ्लड फोरकास्ट डेटा में बीरपुर गेज पर कोसी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर दर्ज था। कुरसेला, कटिहार में भी कोसी का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर था।
बता दें कि 2008 की कोसी त्रासदी ने एक बार फिर दिखाया कि इस नदी का प्रबंधन कितना चुनौतीपूर्ण है। नदी के पूर्वी तटबंध में कुशहा के पास टूटने के बाद पानी ने बड़े इलाके में अपना रास्ता बदल लिया था। इसका असर बिहार के सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, अररिया और आसपास के क्षेत्रों तक पहुंचा।
यही कारण है कि मानसून में कोसी बैराज के गेटों की स्थिति और नदी के जलस्तर को लेकर बिहार में विशेष निगरानी रहती है।
कोसी के मामले में बराज से ज्यादा बड़ा सवाल कई बार तटबंधों की स्थिति बन जाता है।
जल संसाधन विभाग के 2026 के एंटी-इरोशन रिकॉर्ड में सुपौल के किशनपुर और सुपौल क्षेत्र, सहरसा के नौहट्टा, महिषी, सिमरी बख्तियारपुर, सलखुआ और उससे जुड़े क्षेत्रों में कटावरोधी काम दर्ज हैं। इसी वजह से दोनों तटबंधों को अलग-अलग देखा जाना चाहिए।
पूर्वी तटबंध पर: किशनपुर, सुपौल, नौहट्टा, महिषी, सिमरी बख्तियारपुर और सलखुआ जैसे इलाकों में कटाव, सीपेज और पुराने मरम्मत स्थलों की जांच जरूरी है।
पश्चिमी तटबंध पर: निर्मली-सुपौल से जुड़े हिस्सों में पुराने कटाव वाले स्थान और नदी के दबाव की स्थिति महत्वपूर्ण है। विभाग के रिकॉर्ड में पश्चिमी तटबंध डिवीजन, निर्मली के कई एंटी-इरोशन कार्य दर्ज हैं।
इंद्रपुरी बैराज
दक्षिण बिहार की खेती की सबसे बड़ी सिंचाई
उत्तर बिहार में जहां गंडक और कोसी जरूरी हैं, वहीं दक्षिण-पश्चिम बिहार में इंद्रपुरी बैराज की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। यह रोहतास जिले में सोन नदी पर बनाया गया है। इसे सोन बैराज के नाम से भी जाना जाता है।
बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार इंद्रपुरी बैराज की लंबाई 1,407 मीटर है। इसका निर्माण 1960 के दशक में शुरू हुआ और इसे 1968 में चालू किया गया। बिहार जल संसाधन विभाग की मौजूदा लिस्ट में इंद्रपुरी सोन बैराज की डिजाइन डिस्चार्ज क्षमता 14.58 लाख क्यूसेक दर्ज है।
इसका मूल उद्देश्य सोन नदी के पानी को नियंत्रित कर नहर प्रणाली के जरिए दक्षिण बिहार के बड़े हिस्से में सिंचाई उपलब्ध कराना है। इस बराज की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह गंडक या कोसी की तरह विशाल बाढ़-संग्रहण बांध नहीं है।
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार इसमें स्थायी जल-संग्रहण की क्षमता वाला बड़ा स्टोरेज रिजर्वायर नहीं है। इसी वजह से यहां भी कितना पानी रोक सकता है? इससे ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल है, कितना पानी सुरक्षित तरीके से पास किया जा सकता है और नहरों में कितना डायवर्ट किया जा सकता है?
इंद्रपुरी से पहले भी थी सोन की सिंचाई व्यवस्था
इंद्रपुरी बैराज की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई थी। सोन नदी से सिंचाई की कोशिश अंग्रेजी शासन के समय से चल रही थी।
1873-74 में डेहरी के पास सोन नदी पर एनीकट बनाकर एक बड़ी सिंचाई व्यवस्था विकसित की गई थी। सोन का पानी नदी के दोनों किनारों की नहर प्रणालियों में पहुंचाया जाता था।
बाद में इसी पुरानी व्यवस्था को ज्यादा प्रभावी और विस्तृत बनाने के लिए इंद्रपुरी में बैराज का निर्माण किया गया। बिहार पर्यटन विभाग के अनुसार बैराज को पुराने सिंचाई तंत्र से जोड़ने के लिए लिंक नहरों का भी निर्माण किया गया।
इंद्रपुरी बैराज की लंबाई 1,407 मीटर है। बिहार पर्यटन विभाग इसे दुनिया के लंबे बैराजों में गिनता है और अपनी वेबसाइट पर इसे दुनिया का चौथा सबसे लंबा बैराज बताता है।
यह बैराज केवल पानी रोकने या छोड़ने की संरचना नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़ा विशाल नहर नेटवर्क दक्षिण बिहार की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
किन जिलों को मिलता है फायदा?
इंद्रपुरी बैराज से निकलने वाली नहरें दक्षिण बिहार के बड़े कृषि क्षेत्र को सिंचाई उपलब्ध कराती हैं। बिहार जल संसाधन विभाग के आंकड़ों में इंद्रपुरी से जुड़ी पूर्वी संयोजक नहर, पूर्वी सोन उच्च स्तरीय नहर और कई डिस्ट्रिब्यूटरिज का उल्लेख है। इनमें औरंगाबाद और गया जैसे जिले शामिल हैं। यानी सोन का पानी बैराज से निकलने के बाद सिर्फ नदी के डाउनस्ट्रीम हिस्से में नहीं जाता, बल्कि नहरों के जरिए दूर-दराज के खेतों तक पहुंचता है।
इंद्रपुरी बराज में 69 फाटक हैं। भारी बारिश के समय सभी फाटक खोले जाने के उदाहरण पहले भी सामने आए हैं। 28 अगस्त 2026 को दोपहर 2 बजे सोन का डिस्चार्ज 86,080 क्यूसेक था। 24 घंटे में इसमें करीब 26,944 क्यूसेक और 48 घंटे में 69,273 क्यूसेक की कमी हुई। यानी फिलहाल सोन में उत्तर बिहार की गंडक-कोसी जैसी अचानक बढ़ती बाढ़ का दबाव नहीं दिख रहा है।
फिर भी बराज की निगरानी जरूरी है, क्योंकि ऊपर के कैचमेंट, झारखंड, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के हिस्सों में भारी बारिश या बड़े जलाशयों से रिलीज होने पर सोन का प्रवाह तेजी से बदल सकता है।
नहरों के जरिए दक्षिण बिहार तक पानी
इंद्रपुरी से कई महत्वपूर्ण नहरें निकलती हैं। जल संसाधन विभाग के 27 अगस्त के आंकड़ों में चौसा शाखा नहर, पश्चिमी सोन उच्चस्तरीय नहर, कुदरा वितरणी, पटना मुख्य नहर/बलिदाद लॉक, मुरका वितरणी और अरवल लॉक सहित कई सिस्टम दर्ज हैं।
चौसा शाखा नहर से रोहतास और बक्सर, पश्चिमी सोन उच्चस्तरीय नहर से रोहतास और कैमूर, पटना मुख्य नहर से अरवल और पटना तथा अन्य वितरणियों से आसपास के क्षेत्रों को पानी मिलता है।
यानी इंद्रपुरी में पानी का बढ़ना दो तरह से महत्वपूर्ण है बहुत ज्यादा पानी आया तो बाढ़ और डाउनस्ट्रीम दबाव, कम पानी आया तो सिंचाई पर असर।
मानसून में इन बैराजों पर क्यों रहती है सबसे ज्यादा नजर?
मानसून में बैराज की भूमिका अचानक कई गुना बढ़ जाती है। नेपाल के पहाड़ी और तराई क्षेत्रों में भारी बारिश होने पर गंडक और कोसी में पानी तेजी से बढ़ सकता है। उस समय बैराज के अपस्ट्रीम जलस्तर, डाउनस्ट्रीम डिस्चार्ज और गेटों की स्थिति लगातार देखी जाती है।
इंद्रपुरी में भी सोन नदी में भारी पानी आने पर गेटों के संचालन और डाउनस्ट्रीम स्थिति की निगरानी होती है। लेकिन इसका सबसे बड़ा स्थायी महत्व सिंचाई व्यवस्था में है।