दुनिया में पहली बार ड्रोन से घायल सैनिक का रेस्क्यू:यूक्रेनी सैनिक डेढ़ साल से बॉर्डर पर फंसा था, चारों तरफ बारूदी सुरंगें बिछी थीं

दुनिया में पहली बार एक घायल सैनिक की जान बचाने के लिए ड्रोन से रेस्क्यू किया गया। कोस्त्यांतिन व्लासेंको नाम का यूक्रेनी सैनिक 491 दिनों से सीमा पर फंसा हुआ था।

चारों तरफ रूसी सैनिकों का खतरा था। जमीन पर बारूदी सुरंगें बिछी थीं और आसमान में मंडराते ड्रोन पर नजर पड़ते ही जान जाने का डर था। वह न तो आसानी से वहां से निकल सकता था और न ही कोई उसे बचाने पहुंच पा रहा था। ऐसे में उसे बचाने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया गया।

रूसी हमले में दोस्त मारा गया, खुद घायल हुए

कोस्त्यांतिन व्लासेंको पूर्वी यूक्रेन के कुपियांस्क मोर्चे पर तैनात थे। वहां रूसी सेना के हमलों का खतरा लगातार बना रहता था। व्लासेंको और उनका एक साथी कंक्रीट के नाली के पाइप में बने ठिकाने पर रहते थे।

दोनों साथ मिलकर मोर्चा संभाल रहे थे। इसी साल 14 फरवरी को रूसी सेना के ड्रोन हमले में व्लासेंको के साथी की मौत हो गई। विस्फोटक के छर्रों से व्लासेंको भी घायल हुए। उनके दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गए।

व्लासेंको को तुरंत इलाज की जरूरत थी, लेकिन उस जगह तक डॉक्टरों का पहुंचना बेहद मुश्किल था। चोट इतनी गंभीर थी कि उनके दाहिने पैर में गैंगरीन फैल गया।

पैर सड़ा तो खुद ही चाकू से काटकर अलग किया

इस बीमारी में शरीर का प्रभावित हिस्सा सड़ने लगता है। इलाज न मिलने और हालत बिगड़ने के कारण व्लासेंको ने अपना पैर खुद काटकर अलग कर दिया।

घायल होने के बाद भी सैनिक को पूरी तरह अकेला नहीं छोड़ा गया था। यूक्रेनी सेना ड्रोन से उसके लिए खाना, पानी और दवाएं भेजती थी।

हर 4-5 दिन में सामान उसके ठिकाने के पास गिराया जाता था। सैनिक रेंगकर वहां पहुंचता और जरूरत का सामान उठाता था। गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी इसी मदद के सहारे वह दुश्मन के बीच अपनी जान बचाए रहा।

जमीन से बचाने की कोशिश नाकाम हुई

व्लासेंको को निकालने के लिए यूक्रेनी सेना ने पहले जमीन पर चलने वाले रोबोट का इस्तेमाल करने की कोशिश की। लेकिन रूसी सैनिकों ने उसे रास्ते में ही पहचान लिया और नष्ट कर दिया। पैदल सैनिकों के लिए भी उस इलाके तक पहुंचना बहुत जोखिम भरा था।

ऐसे में सेना के सामने दो ही रास्ते थे। या तो व्लासेंको को उसी खतरनाक जगह पर छोड़ दिया जाए, या फिर उन्हें निकालने का कोई नया तरीका खोजा जाए।

इसके बाद 30वीं मैकेनाइज्ड ब्रिगेड और 92वीं असॉल्ट ब्रिगेड के सैनिकों ने भारी ड्रोन से उन्हें निकालने की योजना बनाई। इस अभियान की तैयारी में करीब छह महीने लगे।

कई सैनिकों और तकनीकी विशेषज्ञों ने मिलकर ऐसा तरीका तैयार किया, जिससे एक घायल व्यक्ति को ड्रोन से हवा में उठाकर सुरक्षित जगह तक ले जाया जा सके।

130 किलो तक वजन उठाने वाले ड्रोन से बचाव

इस काम के लिए यूक्रेनी कंपनी गुरज़ुफ डिफेंस का ‘हेवी शॉट अयुदाग-6’ ड्रोन चुना गया। यह छह पंखों वाला भारी ड्रोन है, जिसका इस्तेमाल आम तौर पर सामान और सैन्य सामग्री ले जाने के लिए किया जाता है। यह करीब 130 किलो तक वजन उठा सकता है।

बचाव अभियान के लिए इसमें एक विशेष व्यवस्था लगाई गई, जिससे व्लासेंको को सुरक्षित तरीके से बांधकर हवा में उठाया जा सके। ड्रोन के कैमरे और माइक्रोफोन की मदद से उसका ऑपरेटर उनसे संपर्क भी कर सकता था।

जब अभियान शुरू हुआ, तो ड्रोन व्लासेंको की जगह तक पहुंचा। सैनिक को उससे बांधा गया और फिर धीरे-धीरे जमीन से ऊपर उठाया गया। यह कोई आसान उड़ान नहीं थी। ड्रोन को एक घायल व्यक्ति का वजन लेकर उड़ना था और उसे ऐसे इलाके से बाहर निकालना था, जहां दुश्मन के हमले का खतरा बना हुआ था।

बैटरी पर ज्यादा दबाव पड़ने के कारण ड्रोन को बीच में एक जगह रोककर उसकी बैटरी बदलने की व्यवस्था भी की गई थी। इसके लिए सेना की टीमें पहले से तैनात थीं। बैटरी बदलने के बाद ड्रोन ने आगे का सफर पूरा किया और व्लासेंको को सुरक्षित ठिकाने तक पहुंचाया।

ड्रोन से उतारने के बाद रोबोट से अस्पताल पहुंचाया

हवा से निकालने के बाद भी व्लासेंको को अस्पताल पहुंचाने का काम बाकी था। उन्हें ड्रोन से उतारकर जमीन पर चलने वाले ‘मिरोतवोरेत्स’ नाम के रोबोटिक वाहन पर रखा गया। इस वाहन को दूर से चलाया जा सकता है, इसलिए सैनिकों को खुद उस खतरनाक रास्ते पर जाने की जरूरत नहीं पड़ी।

रोबोट व्लासेंको को आगे सुरक्षित इलाके तक ले गया। वहां से बचाव दल ने उन्हें गाड़ी में बैठाया और अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने उनका इलाज शुरू किया।

व्लासेंको को बचाने में कई सैन्य इकाइयों और ड्रोन ऑपरेटरों ने मिलकर काम किया। इस अभियान ने दिखाया कि जब किसी घायल सैनिक तक पहुंचने के लिए जमीन का रास्ता बहुत खतरनाक हो, तो भारी ड्रोन और जमीन पर चलने वाले रोबोट उसकी जान बचाने में मदद कर सकते हैं।

हर साल 10 लाख सस्ते ड्रोन बना सकता है यूक्रेन

रूस-यूक्रेन जंग में ड्रोन का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है। 2023 में पहली बार यूक्रेन ने ड्रोन से मॉस्को पर हमला किया था। शुरुआत में इन हमलों में कम ड्रोन इस्तेमाल होते थे, लेकिन अब यूक्रेन लंबी दूरी तक हमला करने में सक्षम हो गया है।

यूक्रेन ने सस्ते ड्रोन बनाने की क्षमता भी बढ़ाई है। ये अब हर साल करीब 10 लाख सस्ते ड्रोन बना सकता है।