सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज संजय किशन कौल ने कहा कि सरकारें हमेशा उन जजों को पसंद करती रही हैं, जो उनके विचारों से सहमत होते हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को अपनी स्वतंत्रता बचाने के लिए मजबूती से खड़ा रहना चाहिए।
पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ के न्यायिक नियुक्तियों के दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए कौल ने कहा कि कॉलेजियम को स्वतंत्र रूप से फैसले लेने चाहिए और सरकार से पहले ही मंजूरी लेने से बचना चाहिए। उन्होंने ये बातें अपनी आगामी किताब ‘विदाउट फियर ऑर फेवर’ को लेकर चर्चा के दौरान कहीं।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल ने स्पष्ट किया है कि वह कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास को मेंटर नहीं कर रहे थे। उन्होंने कहा कि वह उनसे एक पत्रकार के रूप में केवल कुछ बार मिले थे और उन्हें अपनी भाषा में थोड़ा संयम बरतने की सलाह दी थी, जो कि अक्सर पीढ़ियों के बीच अलग-अलग होती है।
अनुच्छेद 370 हटाने पर: अनुच्छेद 370 हटाने के मामले में फैसला देते समय उन्होंने खुद को कश्मीरी हिंदू नहीं, बल्कि एक संवैधानिक जज माना। उनके परिवार ने 1947 के बंटवारे का दर्द झेला था, लेकिन न्याय करते समय निजी अनुभवों को फैसले पर हावी नहीं होने दिया। दिसंबर 2023 में वह उस पांच जजों की संविधान पीठ का हिस्सा थे, जिसने अनुच्छेद 370 हटाने के फैसले को बरकरार रखा था।
जम्मू-कश्मीर में हिंसा पर: जम्मू-कश्मीर में लंबे समय से हुई हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं को स्वीकार करना जरूरी है। उन्होंने राज्य और गैर-राज्य पक्षों की ओर से हुए उल्लंघनों की जांच के लिए एक निष्पक्ष सत्य एवं सुलह आयोग बनाने का सुझाव दिया था। उनके मुताबिक, पीड़ितों को न्याय और मानसिक शांति देने के लिए गलतियों को स्वीकार करना जरूरी है।
राफेल विमान सौदे पर: राफेल विमान सौदे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि रक्षा सौदों में सरकार के फैसलों की जगह अदालत अपना फैसला नहीं थोप सकती। वहीं, कॉकरोच जनता पार्टी के नेता सौरव दास के साथ वायरल तस्वीर पर उन्होंने स्पष्ट किया कि यह एक साल पुरानी दिवाली मुलाकात की तस्वीर थी। इसका दास की पार्टी या उसकी विचारधारा से जुड़ाव नहीं था।
CJP नेता सौरव दास से मुलाकात पर: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास से उनकी मुलाकात एक पत्रकार के तौर पर एक-दो बार हुई थी। करीब एक साल पहले दिवाली के एक कार्यक्रम में उनके साथ तस्वीर खिंची थी, जिसे गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। दास को केवल अपनी भाषा में संयम बरतने की सलाह दी थी। उन्होंने CJP के कार्यकर्ताओं को आंदोलन के तरीके पर कोई खास सलाह देने से इनकार किया।
सुप्रीम कोर्ट में समलैंगिक जज की नियुक्ति पर: वरिष्ठ वकील सौरभ कृपाल को दिल्ली हाईकोर्ट का जज बनाने में देरी की असली वजह उनके समलैंगिक होने को लेकर सरकार की आपत्ति थी। सरकार को लगता था कि देश अभी किसी समलैंगिक व्यक्ति को जज के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। कृपाल ने जज बनने की अपनी सहमति कभी वापस नहीं ली, लेकिन सरकार ने नियुक्ति को मंजूरी नहीं दी और कॉलेजियम ने भी सिफारिश वापस नहीं ली। कौल ने इसे न्यायपालिका के लिए एक नुकसान बताया।
सौरभ कृपाल के नाम की सिफारिश अक्टूबर 2017 में दिल्ली हाईकोर्ट और नवंबर 2021 में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने की थी। नवंबर 2022 में केंद्र सरकार ने इस सिफारिश पर आपत्ति जताते हुए फाइल वापस भेज दी। इसके बाद जनवरी 2023 में कॉलेजियम ने दोबारा उनके नाम की सिफारिश की, लेकिन नियुक्ति नहीं हो सकी।
पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़: पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के साथ अच्छे व्यक्तिगत संबंध थे, लेकिन जजों की नियुक्ति के मामले में उनकी सोच अलग थी। चंद्रचूड़ कई बार सरकार के सामने अपना पक्ष मजबूती से रखने में नरम पड़ जाते थे।
जजों की नियुक्ति पर: हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति जल्दी होनी चाहिए, ताकि योग्य वकील इस जिम्मेदारी को स्वीकार करने के लिए तैयार रहें। नियुक्तियों की प्रक्रिया लंबी और जटिल होने से अच्छे उम्मीदवार पीछे हट सकते हैं। सरकार को जानकारी देना जरूरी है, लेकिन इसके कारण नियुक्तियां नहीं रुकनी चाहिए।
उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर: जस्टिस कौल ने उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत नहीं मिलने पर चिंता जताई है। भारत में कई बार दोष साबित होने से पहले ही लंबे समय तक जेल में रहना सजा जैसा बन जाता है। जमानत सजा नहीं है, असली सजा दोष साबित होने के बाद मिलती है।
आमतौर पर जमानत मिलना नियम होना चाहिए, हालांकि कुछ कानूनों में जमानत देने पर सख्त पाबंदियां हैं। कोर्ट को ऐसे मामलों में हिरासत और जमानत के नियमों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
उमर खालिद और शरजील इमाम पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की कथित साजिश में शामिल होने का आरोप है। इस हिंसा में 53 लोगों की मौत हुई थी। दोनों के खिलाफ UAPA के तहत मामला दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट ने 5 जनवरी को और दिल्ली हाईकोर्ट ने सितंबर में उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
कोर्ट और राजनीतिक लड़ाई पर: कोर्ट का इस्तेमाल सरकार के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई लड़ने के लिए नहीं होना चाहिए। राजनीतिक मुद्दों को कोर्ट में लाने के बजाय दूसरे मंचों पर उठाना चाहिए। हालांकि, अगर किसी मामले में कानूनी सवाल है, तो अदालत को उस पर सुनवाई करनी चाहिए। कोर्ट सरकार के कामकाज पर नजर रखने और संविधान की रक्षा करने के लिए हैं, न कि विपक्ष के हथियार के रूप में काम करने के लिए।
उनका यह बयान चुनाव आयोग की मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ विपक्ष की याचिका के बीच आया है। INDIA गठबंधन के नेताओं ने इस प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। कौल ने कहा कि राजनीतिक ध्रुवीकरण के दौर में न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं पर लोगों का भरोसा बनाए रखना जरूरी है।