डिस्काम की हालात नासाज ना कर दे चुनावी घोषणाएं, एक लाख करोड़ रुपये के बोझ तले दबी हैं बिजली वितरण कंपनियां

पांच राज्यों में चुनावी बिगुल बजने के पहले ही राजनीतिक दलों के बीच बिजली सब्सिडी को लेकर नए ऐलानों की जबरदस्त प्रतिस्पर्धा देखने को मिली है। पंजाब में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने चुनाव जीतने पर 300 यूनिट तक बिजली मुफ्त देने, शिरोमणि अकाली दल ने 400 यूनिट मुफ्त बिजली, भाजपा ने पांच रुपये प्रति यूनिट की बिजली देने का वादा किया है।

उत्तर प्रदेश में भी अधिकतर पार्टियों ने किसानों को मुफ्त बिजली और दूसरे ग्राहकों को 300 यूनिट तक मुफ्त बिजली देने का वादा किया है। सपा भी इसमें शामिल है। तो दूसरी तरफ देश में सबसे ज्यादा बिजली शुल्क वाले राज्य उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने चुनावी घोषणा से ठीक पहले बिजली की दरों में 50 फीसद तक राहत दे कर अपना दांव भी खेल दिया है।

उत्तराखंड में भी आप की तरफ से मुफ्त बिजली का वादा किया गया है। यह भी बता दें कि जुलाई, 2021 में वहां की भाजपा सरकार ने आम उपभोक्ताओं के लिए बिजली की दरों को घटा भी दिया था। इस सब के बीच झारखंड की सरकार ने तो कुछ हफ्ते पहले गरीब परिवारों को 10 लीटर तक पेट्रोल खरीद पर 25 रुपये प्रति लीटर की सब्सिडी दे कर पेट्रोलियम सब्सिडी की नई राजनीति शुरू करने का संकेत दे दिया है।

जानकारों की मानें तो मुफ्त बिजली देने या दूसरे इनर्जी माध्यमों को चुनावी मुद्दा बनाने की यह राजनीति ना सिर्फ राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों पर भारी पड़ सकती है बल्कि इससे बिजली व इनर्जी सेक्टर में चल रहे सुधारों पर असर दिखाई दे सकता है। उत्तर प्रदेश और पंजाब की बिजली वितरण कंपनियों (डिस्काम) की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है।

केंद्र सरकार की तरफ से जुलाई, 2021 में जारी 41 डिस्काम की रेटिंग में यूपी की पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड का स्थान 17वां था जबकि राज्य के तीन अन्य डिस्काम 22वें, 24वें व 29वें स्थान पर थे। पंजाब स्टेट पावर कार्पोरेशन लिमिटेड के बारे में इस रिपोर्ट में कहा गया है कि इसकी सब्सिडी के लिए राज्य सरकार पर बढ़ता बोझ एक बड़ा चिंता का कारण है।

राज्य सरकार से बकाया भुगतान में मिल रही देरी पर भी चिंता जताई गई है। उत्तराखंड पावर कार्पोरेशन लिमिटेड के बारे में कहा गया है कि यह अभी भी सिर्फ 86.6 फीसद ग्राहकों को बिलिंग कर पा रही है। लागत की वसूली करने में भी यह साल दर साल पिछड़ती जा रही है। उत्तर प्रदेश के सारे डिस्काम के बारे में यह कहा गया है कि ये काफी ज्यादा कीमत पर बिजली खरीद करती हैं और इनका ट्रांसमिशन व डिस्ट्रीब्यूशन की हानि काफी ज्यादा है।

आनंद राठी शेयर एवं स्टाक ब्रोकर्स के चीफ इकोनोमिस्ट सुजन हाजरा बिजली व इनर्जी सेक्टर के बढ़ते राजनीतिकरण पर बताते हैं कि, बिजली सब्सिडी का स्तर बढ़ने या समाज के एक तबके को मुफ्त बिजली या लागत से कम दर पर बिजली देने का असर निश्चित तौर पर राज्यों की बिजली वितरण कंपनियों को उठाना पड़ेगा लेकिन इसका अंतत: असर राज्यों की इकोनोमी पर ही पड़ने वाला है।

पहले से ही भारत के कई राज्यों में यह देखा जा रहा है कि एक वर्ग को सस्ती बिजली देने की वजह से दूसरे वर्ग को ज्यादा बिजली शुल्क देना पड़ रहा है। इस तरह की क्रास सब्सिडी का मामला और बढ़ सकता है। आल इंडिया पावर इंजीनियर फेडरेशन के अध्यक्ष शैलेंद्र दूबे का कहना है कि मुफ्त बिजली या बिजली सब्सिडी का राजनीतिकरण पहले दक्षिण भारत में हुआ था लेकिन अब उत्तर भारत में भी राजनीति दल इसका इस्तेमाल करने लगे हैं।

समस्या बस यह है कि बिजली कानून, 2003 के मुताबिक राज्य सरकारें बिजली सब्सिडी का भुगतान अग्रिम में डिस्काम को नहीं कर पा रही हैं और इससे पहले से ही काफी वित्तीय बोझ में दबी इन कंपनियों की स्थिति और खराब हो सकती है। बिजली दरों को लेकर हो रही इस राजनीति से बिजली मंत्रालय भी चिंतित है। बिजली मंत्रालय के अधिकारी बताते हैं कि जनवरी 2021 के ताजे आंकड़े बताते हैं कि सभी डिस्काम पर कुल 99,968 करोड़ रुपये का बताया है।