‘BDO ने कहा था- तुम कभी अधिकारी नहीं बनोगे’:15 साल बाद बीडीओ बने दीपक, पढ़ाई के लिए मां ने गहने गिरवी रखे; CM ने दिया नियुक्ति पत्र

15 साल, एक ऐसा सफर जिसमें कभी पीटी में सफलता मिली तो कभी मेंस में, लेकिन इंटरव्यू की दहलीज पर सपना टूटता रहा। कभी दरोगा में असफलता मिली, कभी BSSC और रेलवे में। धीरे-धीरे खुद पर भरोसा भी डगमगाने लगा था, लेकिन बिहार के सीवान के दीपक कुमार ने हार नहीं मानी।

आखिरकार BPSC 70वीं परीक्षा में RDO (Rural Development Officer), जिसे BDO के रूप में भी जाना जाता है, के पद पर उनका चयन हो गया। पटना के बापू सभागार में गुरुवार को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 70वीं BPSC परीक्षा से चयनित 2027 अभ्यर्थियों को नियुक्ति पत्र सौंपे। इन्हीं अभ्यर्थियों में से एक दीपक कुमार भी थे।

नियुक्ति पत्र लेने पहुंचे दीपक की कहानी सिर्फ एक सरकारी नौकरी मिलने की कहानी नहीं, बल्कि 15 साल के संघर्ष, परिवार के त्याग, कर्ज, खेत गिरवी रखने और टूटते हौसले के बीच उम्मीद जिंदा रखने की कहानी है।

7वां अटेम्प्ट था, इस बार भी नहीं होता तो हिम्मत टूट जाती

सीवान के रहने वाले दीपक कुमार ने बताया, मैं 5 जून 2011 को पटना आकर रहने लगा। 20 जून 2026 की शाम करीब 7 बजे जब BPSC 70वीं का रिजल्ट आया और मेरा नाम सफल अभ्यर्थियों में आया, तो 15 साल की मेहनत एक पल में आंखों के सामने घूम गई।

BPSC 64वीं से सिविल सर्विसेज में जाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे थे। कभी PT पास होता तो मेंस में रुक जाता था, कभी मेंस निकल जाता तो इंटरव्यू में सफलता नहीं मिलती थी। यह मेरा 7वां अटेम्प्ट था। अगर इस बार भी रिजल्ट नहीं आता, तो मेरी हिम्मत टूटने लगी थी। अंदर से लगने लगा था कि शायद मुझमें ही कोई कमी है।

दीपक ने कहा, कभी मेंस में कम नंबर आते तो उन्हें लगता कि शायद उन्हें लिखना नहीं आता और जब मेंस निकल जाता तो इंटरव्यू को लेकर डर सताने लगता। धीरे-धीरे खुद पर विश्वास भी कम होने लगा था।

जिस BDO ने कहा- ‘तुम्हारा कभी नहीं होगा’, उसी पद पर बना अधिकारी

दीपक की कहानी का सबसे भावुक हिस्सा वह है, जब वह अपने जीवन की एक पुरानी घटना याद करते हुए बताते हैं, एक बार मैं अपने जिले में किसी काम से BDO से मिलने गया था। उन्हें कुछ परेशानी बतानी थी, लेकिन कार्यालय में मौजूद क्लर्क ने मुंह पर दरवाजा बंद कर दिया। वहां से जाने को कहा गया। किसी तरह BDO से मिलने पहुंचा, लेकिन उनसे मिलने भी नहीं दिया गया।

दीपक ने बताया, जब मैंने उनसे कहा कि मैं प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा हूं और एक दिन अधिकारी बनूंगा, तो मुझसे कहा गया- “जाओ, भागो यहां से। तुम्हारा कभी नहीं होगा। BPSC में सिलेक्शन नहीं होगा। यही बात मेरे मन में बैठ गई।

उन्होंने कहा, उस दिन मुझे लगा कि किसी भी अधिकारी को लोगों के साथ हमेशा विनम्र और हम्बल होना चाहिए।

आज दीपक खुद RDO बने हैं। शायद अब उनके पास उन लोगों के लिए एक जवाब है, जिन्होंने कभी कहा था कि उनका चयन नहीं होगा।

भाई को बताया भगवान, 15 साल तक पैसे भेजे

दीपक ने अपने बड़े भाई को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बताया। उन्होंने कहा, मेरा भाई मेरे लिए भगवान है। पिछले 15 साल से उनका भाई आर्थिक मदद करता रहा। कभी यह सवाल नहीं किया कि पैसे कहां खर्च हो रहे हैं, तैयारी क्यों चल रही है और अभी तक चयन क्यों नहीं हुआ।

दीपक ने बताया, वह दरोगा, BSSC और रेलवे जैसी परीक्षाओं में भी असफल हुए। परिवार में उनकी मां ने घर की पूरी जिम्मेदारी संभाली और उन्हें लगातार तैयारी करने का मौका दिया।

मां बोलीं- ‘हमारे राम 15 साल बाद घर लौटे हैं’

दीपक के अधिकारी बनने के बाद उनकी मां सुचिता देवी की आंखों में आंसू थे। ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि 15 साल के इंतजार के बाद मिली खुशी के थे।

उन्होंने कहा, खुशी की कोई सीमा नहीं है। चारों तरफ से खुशियां बरस रही हैं। हमारे घर में यह पहली सरकारी नौकरी है। तीन पीढ़ियां बीत गईं, लेकिन अब तक परिवार में किसी की सरकारी नौकरी नहीं लगी थी।

बेटा 15 साल पटना में रहा, मां-बाप को पता नहीं कैसे रहता

दीपक की मां ने बताया, बेटा 15 साल से पटना में रह रहा था, लेकिन वे पहली बार पटना आई हैं। मुझे सिर्फ इतना पता था कि बेटा पटना में रहता है। वह कैसे रहता है, कहां रहता है, किन परिस्थितियों में रहता है, इन सबकी उन्हें पूरी जानकारी नहीं थी। जब भी दीपक गांव आता था तो घर में मौजूद चावल, दाल, आटा, नमक जैसी चीजें उसके साथ भेज दी जाती थीं। परिवार आर्थिक रूप से जितना कर सकता था, उतना करता रहा।

गांव में पटाखे फोड़े तो पड़ोसियों ने बंद कर लिए दरवाजे

दीपक की नौकरी लगने के बाद गांव में उनका स्वागत हुआ। घर के बाहर पटाखे फोड़े गए। मां ने बताया, कुछ लोगों को समझ ही नहीं आया कि जब न शादी हुई है, न कोई दूसरा समारोह, तो घर के दरवाजे पर इतने पटाखे क्यों फोड़े जा रहे हैं। बाद में जब पता चला कि दीपक अधिकारी बन गए हैं, तो आसपास के लोगों ने अपने-अपने दरवाजे बंद कर लिए। करीब रात 10:30 बजे के बाद लोगों ने अपने घरों के गेट खोले।

पिता बोले- कभी सपना तक नहीं देखा था कि बेटा अधिकारी बनेगा

दीपक के पिता की आंखों में भी खुशी के आंसू थे। उन्होंने कहा कि मैंने जिंदगी में कभी नहीं सोचा था कि बेटा अधिकारी बनेगा। हमेशा बेटे से सिर्फ एक बात कही-“बेटा, कभी हिम्मत मत हारना।” उन्होंने बताया कि बेटे की नौकरी लगने के बाद ही वह 15 साल में पहली बार पटना आए हैं।

दीपक के पिता ने बताया, बेटे को पढ़ाने के लिए परिवार ने हर संभव कोशिश की। पैसे की इतनी दिक्कत थी कि कई बार स्थिति बेहद खराब हो गई। उनके ऊपर अभी भी करीब 6 से 7 लाख रुपये का कर्ज है।

बेटे की पढ़ाई के लिए खेत तक गिरवी रखना पड़ा। पत्नी के जितने गहने थे, वे भी बेचने पड़े। बात खत्म करते हुए दीपक के पिता ने मालिक ने हमें हंसने का मौका दे दिया। जिस घर में बैठकर रोते थे, आज उसी घर में हंसने का मौका मिल गया।